Home Education & Jobs हिंदी सिर्फ एक भाषा नहीं, भारत की चलती-फिरती कहानी है

हिंदी सिर्फ एक भाषा नहीं, भारत की चलती-फिरती कहानी है

हिंदी दिवस पर विशेष: क्या आप जानते हैं कि हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ नहीं, ‘राजभाषा’ कहा जाता है? देवनागरी हिंदी की लिपि है। हिंदी की कहानी संस्कृत से शुरू होकर फारसी, अरबी, तुर्की और अंग्रेजी तक पहुंचती है। 14 सितंबर को हम हिंदी दिवस मनाते हैं। मंच सजते हैं, भाषण होते हैं, कविताएं पढ़ी जाती हैं और हिंदी के सम्मान में बड़े-बड़े शब्द बोले जाते हैं। लेकिन क्या हम उस हिंदी को सचमुच जानते हैं, जिसे बचाने और बढ़ाने की कसमें खाते हैं? क्या आपको मालूम है कि भारत के संविधान में हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ कहा ही नहीं गया है? क्या आपको पता है कि ‘हिंदी’ नाम के पीछे ‘हिंद’ और ‘हिंदुस्तान’ की कहानी छिपी है? क्या यह भी जानते हैं कि आज जिस हिंदी को हम देवनागरी में लिखते हैं, उसकी मानक शक्ल बहुत पुरानी नहीं है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि हिंदी और उर्दू की बोलचाल की साझा जमीन इतनी गहरी है कि दोनों को समझने के लिए कभी-कभी लिपि हटाकर सिर्फ आवाज सुनना काफी होता है? हिंदी की कहानी दरअसल किसी एक जाति, धर्म, प्रदेश या सत्ता की कहानी नहीं है। यह भारत की सदियों लंबी मुलाकातों, टकरावों, मेल-मिलाप और बदलती जरूरतों की कहानी है।

14 सितंबर आखिर हिंदी दिवस क्यों बना?

KKN ब्यूरो। कहानी शुरू होती है 14 सितंबर 1949 से। संविधान सभा ने इसी दिन देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। बाद में संविधान लागू होने पर अनुच्छेद 343 में यह व्यवस्था संवैधानिक रूप ले गई। भारत सरकार का राजभाषा विभाग भी 14 सितंबर 1949 के इसी निर्णय को हिंदी दिवस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि मानता है। लेकिन हिंदी दिवस उसी साल से शुरू नहीं हो गया। 1953 से 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई। इसका उद्देश्य हिंदी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देना था। यहीं एक दिलचस्प संवैधानिक तथ्य सामने आता है। हिंदी भारत की ‘राष्ट्रभाषा’ नहीं है। संविधान हिंदी को संघ की राजभाषा कहता है। अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी और उसकी लिपि देवनागरी है। संविधान ने अंग्रेजी के प्रयोग को भी जारी रखने की व्यवस्था की। इसलिए हिंदी को राष्ट्रभाषा कहना भावनात्मक तौर पर आम हो सकता है, लेकिन संवैधानिक रूप से सही शब्द ‘राजभाषा’ है। यह अंतर छोटा दिखाई देता है, लेकिन इसके पीछे आजाद भारत की भाषा-बहुलता और उस दौर के कठिन राजनीतिक समझौते की पूरी कहानी छिपी है।

हिंदी का नाम ‘हिंद’ से आया, लेकिन भाषा की यात्रा उससे कहीं पुरानी है

अब आते हैं उस सवाल पर जिसे सुनकर कई लोग ठिठक सकते हैं— ‘हिंदी’ शब्द आया कहां से? ‘हिंदी’ का संबंध ‘हिंद’ से जोड़ा जाता है। ऐतिहासिक रूप से ‘हिंद’ शब्द सिंधु नदी और उससे जुड़े भूगोल के लिए इस्तेमाल होने वाले नामों की परंपरा से जुड़ा है। आगे चलकर ‘हिंद’ से बने शब्दों का इस्तेमाल भारत और यहां के लोगों तथा भाषाओं के संदर्भ में अलग-अलग रूपों में हुआ। यानी ‘हिंदी’ को केवल किसी एक प्राचीन ग्रंथ में जन्मी भाषा मान लेना इसकी वास्तविक यात्रा को बहुत छोटा कर देता है। आधुनिक हिंदी इंडो-आर्यन भाषाई परिवार का हिस्सा है। इसके विकास की कहानी मध्यकालीन उत्तर भारतीय बोलियों और संपर्क भाषाओं से गुजरती हुई आधुनिक मानक हिंदी तक पहुंचती है। यहां एक नाम बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है— खड़ी बोली। आधुनिक मानक हिंदी का आधार मुख्यतः दिल्ली और उसके आसपास विकसित खड़ी बोली से जुड़ा है। यही भाषाई आधार आगे चलकर हिंदी और उर्दू के मानकीकृत रूपों की साझा जमीन बना।

हिंदी अकेली नहीं बनी—उसने बहुत कुछ उधार लिया

हिंदी की खूबसूरती शायद इसी में है कि उसने अपने दरवाजे कभी पूरी तरह बंद नहीं किए। उसके शब्द-संसार में संस्कृत की छाया है। लेकिन सिर्फ संस्कृत नहीं। फारसी आई तो शब्द आए—दुनिया, दरवाजा, बाजार, रंग, खबर, आदमी जैसे असंख्य शब्द। अरबी से भी शब्द आए। तुर्की और दूसरी भाषाओं का प्रभाव भी पड़ा। बाद में अंग्रेजी आई तो हिंदी ने उससे भी शब्द उठा लिए। आज कोई व्यक्ति सहजता से कहता है— “मेरी ट्रेन लेट है, मोबाइल की बैटरी खत्म है, ऑफिस की मीटिंग है।” यह कैसा भाषाई संसार है? एक ही वाक्य में भारतीय भाषाई परंपरा, अंग्रेजी और आधुनिक तकनीकी शब्द साथ खड़े हैं। यही हिंदी की असली ताकत है। हिंदी शुद्धता की बंद कोठरी में नहीं, इस्तेमाल की खुली सड़क पर विकसित हुई है।

हिंदी और उर्दू—दो भाषाएं या एक साझा धड़कन?

यह शायद हिंदी से जुड़ी सबसे दिलचस्प पहेलियों में से एक है। अगर कोई कहे— “आप कहाँ जा रहे हैं?” और दूसरा कहे— “मैं बाज़ार जा रहा हूँ।” तो बोलचाल सुनने वाला यह नहीं पूछता कि यह हिंदी है या उर्दू। फर्क ज्यादा स्पष्ट तब होता है जब दोनों भाषाओं के औपचारिक और साहित्यिक रूप सामने आते हैं। आधुनिक मानक हिंदी देवनागरी में लिखी जाती है और संस्कृत से अधिक शब्दावली ग्रहण करती है, जबकि उर्दू फारसी-अरबी लिपि और फारसी-अरबी शब्दावली से अधिक जुड़ी है। लेकिन दोनों की बोलचाल की साझा जड़ें इतनी गहरी हैं कि भाषाविज्ञान में इनके व्यापक साझा आधार को हिंदुस्तानी के संदर्भ में समझा जाता है। यानी— लिपियां अलग हो सकती हैं, साहित्यिक रजिस्टर अलग हो सकते हैं, लेकिन बोलचाल की जमीन लंबे समय तक साझा रही है। इसीलिए हिंदी फिल्म का संवाद भारत से पाकिस्तान तक समझा जाता है और उर्दू की शायरी का बड़ा हिस्सा हिंदी भाषी समाज में सहजता से सुना और समझा जाता है।

देवनागरी की सबसे दिलचस्प बात—यह सिर्फ हिंदी की लिपि नहीं

हिंदी की पहचान अक्सर देवनागरी से की जाती है। लेकिन देवनागरी सिर्फ हिंदी के लिए नहीं बनी। आज देवनागरी का इस्तेमाल मराठी, नेपाली और कई अन्य भाषाओं को लिखने में भी होता है। यूनिकोड के आधिकारिक दस्तावेज में देवनागरी के प्रयोग वाली अनेक भारतीय और नेपाली भाषाओं की सूची दी गई है। इसकी जड़ें इससे भी पीछे जाती हैं। देवनागरी भारतीय लिपियों की उस लंबी परंपरा का हिस्सा है जिसका ऐतिहासिक संबंध ब्राह्मी से जोड़ा जाता है। यूनिकोड भी देवनागरी और अन्य भारतीय लिपियों के बीच इस ऐतिहासिक संबंध का उल्लेख करता है। आज आपके मोबाइल पर लिखा— “नमस्ते” दरअसल हजारों वर्षों की भारतीय लिपि-परंपरा की आधुनिक डिजिटल यात्रा का हिस्सा है।

मोबाइल की स्क्रीन पर हिंदी का एक और चमत्कार

कभी हिंदी टाइप करने के लिए विशेष फॉन्ट, टाइपराइटर या जटिल कंप्यूटर व्यवस्था की जरूरत पड़ती थी। आज आप मोबाइल खोलते हैं और बोलते हैं— “कल सुबह 8 बजे मुझे याद दिलाना।” कुछ ही सेकंड में वह हिंदी में लिख जाता है। इस बदलाव के पीछे सिर्फ तकनीक नहीं है। यूनिकोड ने अलग-अलग डिजिटल प्रणालियों में देवनागरी अक्षरों को मानकीकृत रूप से संभालने का रास्ता बनाया। यूनिकोड में देवनागरी का अलग आधिकारिक ब्लॉक U+0900 से U+097F तक है। देवनागरी में अपने अंक भी हैं—०१२३४५६७८९—जिन्हें यूनिकोड ‘Devanagari digits’ के रूप में सूचीबद्ध करता है। यानी हिंदी सिर्फ कागज से मोबाइल तक नहीं पहुंची। वह डिजिटल कोड में भी दर्ज हो चुकी है।

हिंदी कितने लोगों की भाषा है?

2011 की जनगणना के भाषा संबंधी आंकड़े बताते हैं कि हिंदी भारत की सबसे बड़ी भाषाई श्रेणी है। जनगणना के भाषा एटलस के अनुसार देश की आबादी का लगभग 43.63% हिस्सा हिंदी को अपनी मातृभाषा के रूप में दर्ज करता है। लेकिन यहां भी एक सावधानी जरूरी है। जनगणना में ‘हिंदी’ के अंतर्गत कई मातृभाषाओं को भाषाई वर्गीकरण के स्तर पर जोड़ा जाता है। इसलिए 43.63% को यह कहना कि इतने प्रतिशत लोग केवल मानक हिंदी ही बोलते हैं, सही नहीं होगा। यही भारत की भाषाई विविधता का अद्भुत पक्ष है। भोजपुरी बोलने वाला व्यक्ति हिंदी भी बोल सकता है। मैथिली बोलने वाला हिंदी में लिख सकता है। राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, अवधी, ब्रज या हरियाणवी बोलने वाला भी हिंदी के व्यापक भाषाई संसार का हिस्सा हो सकता है। हिंदी का विस्तार उसकी एकरूपता से नहीं, उसकी ग्रहणशीलता से हुआ है।

क्या हिंदी सिर्फ समारोह की भाषा बन रही है?

यहीं से हिंदी दिवस की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होती है। एक दिन हम हिंदी पर गर्व करते हैं। दूसरे दिन वही व्यक्ति अपने बच्चे से कहता है—“अच्छी नौकरी चाहिए तो अंग्रेजी जरूरी है।” कॉलेज में विज्ञान पढ़ना हो—अंग्रेजी। कानून पढ़ना हो—अंग्रेजी का दबदबा। तकनीक समझनी हो—अंग्रेजी। उच्च शिक्षा में शोध करना हो—अंग्रेजी का व्यापक प्रभाव। तो फिर हिंदी का भविष्य क्या है? सिर्फ कविता, कहानी और भाषण? शायद नहीं। हिंदी को अगर आने वाली पीढ़ियों की भाषा बने रहना है तो उसे विज्ञान की भाषा, तकनीक की भाषा, इंटरनेट की भाषा, शोध की भाषा, कानून की भाषा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भाषा भी बनना होगा। भारत सरकार का राजभाषा विभाग आज मशीन-सहायित अनुवाद, ई-शब्दकोश और ऑनलाइन हिंदी प्रशिक्षण जैसे डिजिटल साधनों पर काम कर रहा है। यानी चुनौती सिर्फ यह नहीं कि हिंदी कितने लोग बोलते हैं। चुनौती यह है कि हिंदी में कितने लोग ज्ञान पैदा करते हैं।

सबसे बड़ी खूबी— यह बदलती रहती है

हिंदी को बचाने की चिंता करने वाले अक्सर कहते हैं कि अंग्रेजी हिंदी को निगल रही है। लेकिन इतिहास कुछ और कहानी कहता है। हिंदी ने संस्कृत से लिया। प्राकृत और अपभ्रंश की परंपराओं से आगे बढ़ी। क्षेत्रीय बोलियों से समृद्ध हुई। फारसी और अरबी से शब्द लिए। उर्दू के साथ साझा भाषाई जमीन बनाई। अंग्रेजी से हजारों शब्द अपनाए और अब इंटरनेट से नए शब्द ले रही है। भाषा अगर जीवित है तो बदलेगी। जो भाषा बदलना बंद कर देती है, वह संग्रहालय की वस्तु बन जाती है। इसलिए हिंदी को बचाने का अर्थ उसे पुराने शब्दों की अलमारी में बंद करना नहीं है। उसे जीवित, सहज, वैज्ञानिक, तकनीकी और सृजनशील बनाए रखना है।

हिंदी दिवस का असली अर्थ क्या है?

हिंदी दिवस पर सबसे जरूरी सवाल यह नहीं है कि— “हिंदी हमारी शान है या नहीं?” यह सवाल तो बहुत आसान है। असल सवाल है— क्या हमारी हिंदी इतनी सक्षम है कि आने वाली पीढ़ी उसमें अपना भविष्य लिख सके? क्या वह किसान के खेत की भाषा के साथ-साथ वैज्ञानिक की प्रयोगशाला की भाषा बन सकती है? क्या वह गांव की चौपाल के साथ-साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के एल्गोरिद्म से संवाद कर सकती है? क्या उसमें कानून समझाया जा सकता है? क्या उसमें विश्वस्तरीय शोध लिखा जा सकता है? क्या उसमें नई तकनीक का ज्ञान पैदा किया जा सकता है? अगर जवाब हां है, तो हिंदी का भविष्य सुरक्षित है। क्योंकि हिंदी की असली ताकत उसके अतीत में नहीं, हर नए समय को अपने भीतर जगह देने की उसकी क्षमता में है। शायद इसी वजह से हिंदी की कहानी अभी पूरी नहीं हुई। वह आज भी लिखी जा रही है—हर मोबाइल स्क्रीन पर, हर गांव की चौपाल में, हर कविता में, हर खबर में और उन करोड़ों आवाजों में जो बिना किसी समारोह के रोज हिंदी बोलती हैं। यही हिंदी की असली जिंदगी है।

मुख्य स्रोत: भारत सरकार का राजभाषा विभाग, संविधान का आधिकारिक पाठ, भारत की जनगणना 2011 और Unicode Consortium.

KKN लाइव WhatsApp पर भी उपलब्ध है, खबरों की खबर के लिए यहां क्लिक करके आप हमारे चैनल को सब्सक्राइब कर सकते हैं।

KKN Public Correspondent Initiative


Discover more from

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Previous articleमीनापुर की जुड़वा बहनों ने CSIR-NET में लहराया परचम, शनाया को ऑल इंडिया 92वीं रैंक
कौशलेन्द्र झा, KKN Live की संपादकीय टीम का नेतृत्व करते हैं और हिन्दुस्तान (हिन्दी दैनिक) में नियमित रूप से लेखन करते हैं। बिहार विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों से अधिक का अनुभव अर्जित किया है। वे प्रातःकमल और ईटीवी बिहार-झारखंड सहित कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। सामाजिक सरोकारों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है—वे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संघ (भारत) के बिहार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और “मानवाधिकार मीडिया रत्न” सम्मान से सम्मानित किए गए हैं। पत्रकारिता में उनकी गहरी समझ और सामाजिक अनुभव उनकी विश्लेषणात्मक लेखन शैली को विशिष्ट बनाते हैं

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version