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पढ़ाई महंगी, नौकरी और परीक्षा पर भरोसा भी संकट में

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कैंपस से सड़क तक बढ़ती बेचैनी सिर्फ बेरोजगारी की कहानी नहीं; यह उस पीढ़ी का असंतोष है जिसने शिक्षा को उम्मीद समझा, लेकिन व्यवस्था ने उसे फीस, प्रतियोगिता, पेपर लीक और अनिश्चित भविष्य की कतार में खड़ा कर दिया

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जिस पीढ़ी के हाथ में किताब होनी चाहिए, उसके हाथ में तख्तियां क्यों हैं?

KKN ब्यूरो। एक तस्वीर देखिए। सड़क पर युवाओं की भीड़ है। हाथों में तख्तियां हैं। चेहरों पर नाराजगी है। किसी के हाथ में शिक्षक बनने की मांग है। कोई परीक्षा की पारदर्शिता मांग रहा है। कोई नौकरी चाहता है। कोई महंगी शिक्षा के खिलाफ आवाज उठा रहा है। दूसरी तरफ सत्ता है। सत्ता के पास आश्वासन हैं। योजनाएं हैं। आंकड़े हैं और हर संकट के बाद एक जांच का वादा भी है। लेकिन इन दोनों के बीच एक चीज तेजी से गायब होती दिखाई दे रही है—भरोसा। यही इस कहानी का सबसे गंभीर पहलू है। भारत में युवाओं का असंतोष अब किसी एक परीक्षा, एक राज्य या एक सरकार तक सीमित नहीं है। कभी शिक्षक भर्ती को लेकर सड़कें भरती हैं। कभी प्रतियोगी परीक्षा के प्रश्नपत्र पर सवाल उठते हैं। कभी परिणाम में देरी युवाओं को आंदोलित करती है। कभी नौकरी की उम्र निकलने का भय उन्हें बेचैन करता है और कभी सबसे योग्य छात्र भी यह सोचने को मजबूर हो जाता है कि— क्या मेहनत सचमुच पर्याप्त है? यही सवाल किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सबसे खतरनाक सवालों में से एक है। क्योंकि जब किसी युवा को यह भरोसा नहीं रहता कि उसकी मेहनत उसे उसकी मंजिल तक पहुंचाएगी, तब उसका आक्रोश केवल व्यक्तिगत नहीं रहता। वह सामाजिक असंतोष में बदलने लगता है।

शिक्षा से रोजगार तक—हर पड़ाव पर बढ़ती परीक्षा

भारत की युवा आबादी को लंबे समय से देश की सबसे बड़ी ताकत बताया जाता रहा है। लेकिन जनसांख्यिकीय लाभांश अपने आप आर्थिक लाभांश नहीं बनता। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए। कौशल चाहिए। उचित रोजगार चाहिए और सबसे जरूरी—व्यवस्था पर भरोसा चाहिए। युवा अगर वर्षों पढ़ाई करता है, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है, परिवार की आय का बड़ा हिस्सा कोचिंग और रहने-खाने पर खर्च करता है, फिर परीक्षा में बैठता है और अंततः पेपर लीक या भर्ती विवाद के कारण पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठ जाता है, तो नुकसान केवल एक परीक्षा का नहीं होता। उसके साथ महीनों या वर्षों की मेहनत जुड़ी होती है। उसके परिवार की उम्मीद जुड़ी होती है। कई बार उसकी उम्र जुड़ी होती है और सबसे बढ़कर—उसका भविष्य जुड़ा होता है। इसीलिए पेपर लीक को सिर्फ परीक्षा व्यवस्था की तकनीकी खामी समझना भूल होगी। यह युवा भरोसे पर हमला है।

पेपर लीक: असली नुकसान प्रश्नपत्र का नहीं, विश्वास का है

हाल के वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर बार-बार उठते विवादों ने एक गंभीर सवाल खड़ा किया है। आखिर प्रश्नपत्र परीक्षा केंद्र तक पहुंचने से पहले ही बाहर कैसे पहुंच जाता है? कहां टूटती है सुरक्षा की पहली कड़ी? किस स्तर पर मानवीय हस्तक्षेप होता है? डिजिटल व्यवस्था के बावजूद गोपनीय सामग्री बाहर कैसे निकलती है? अगर किसी परीक्षा में लाखों अभ्यर्थी शामिल हों, तो एक छोटी-सी गड़बड़ी का असर कितनी जिंदगियों पर पड़ता है? इन सवालों का जवाब सिर्फ पुलिस जांच से नहीं मिलेगा। इसके लिए पूरी परीक्षा प्रणाली का ऑडिट जरूरी है। प्रश्नपत्र तैयार करने वाले विशेषज्ञों से लेकर प्रिंटिंग प्रेस तक। प्रिंटिंग प्रेस से सुरक्षित पैकेजिंग तक। वहां से परिवहन तक। स्ट्रांग रूम से परीक्षा केंद्र तक और परीक्षा केंद्र से उत्तर पुस्तिका के मूल्यांकन तक। जहां भी इंसान है, वहां सुरक्षा की एक संभावित दरार है। इसलिए आधुनिक परीक्षा व्यवस्था को केवल कागज और ताले से नहीं, बल्कि मल्टी-लेयर सिक्योरिटी सिस्टम से संचालित करना होगा।

नौकरी के लिए पढ़ रहा युवा, नौकरी से पहले बूढ़ा हो रहा है

एक और संकट है—भर्ती प्रक्रिया की लंबाई। किसी सरकारी नौकरी की अधिसूचना निकलती है। आवेदन शुरू होता है। परीक्षा की तारीख आती है। फिर तारीख बदलती है। कभी तकनीकी कारण। कभी प्रशासनिक कारण। कभी न्यायिक विवाद। कभी प्रश्नपत्र पर विवाद। फिर परीक्षा। फिर परिणाम। फिर काउंसलिंग। फिर दस्तावेज सत्यापन और कई बार नियुक्ति तक पहुंचते-पहुंचते वर्षों का समय गुजर जाता है। इस बीच अभ्यर्थी की उम्र बढ़ती रहती है। लेकिन सरकारी कैलेंडर की गति उसी अनुपात में नहीं बढ़ती। युवा के सामने तब सिर्फ बेरोजगारी नहीं होती। उसके सामने उम्र की खिड़की बंद होने का भय भी होता है। यही कारण है कि भर्ती परीक्षाओं में देरी कई बार आंदोलन को जन्म देती है। क्योंकि अभ्यर्थी के लिए एक वर्ष केवल कैलेंडर का एक पन्ना नहीं है। वह नौकरी के एक और अवसर का खो जाना हो सकता है।

शिक्षा है, लेकिन क्या शिक्षा रोजगार तक पहुंचा रही है?

भारत में उच्च शिक्षा का विस्तार हुआ है। कॉलेज बढ़े हैं। विश्वविद्यालय बढ़े हैं। व्यावसायिक पाठ्यक्रम बढ़े हैं। मेडिकल और इंजीनियरिंग सीटें बढ़ी हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या शिक्षा और रोजगार के बीच की दूरी उसी अनुपात में कम हुई है? उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित सामग्री में अगस्त 2023 के संदर्भ में बताया गया है कि 25 वर्ष से कम आयु के 39 प्रतिशत युवा स्नातक बेरोजगार थे। यह आंकड़ा उस विरोधाभास को रेखांकित करता है जिसमें डिग्री बढ़ रही है, लेकिन रोजगार का रास्ता उसी अनुपात में चौड़ा नहीं हो रहा। यही वह जगह है जहां शिक्षा नीति को केवल नामांकन और डिग्री की संख्या से आगे देखना होगा। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कितने युवा कॉलेज पहुंचे। सवाल यह होना चाहिए कि— कॉलेज से निकलने के बाद कितने युवा सम्मानजनक रोजगार तक पहुंचे?

डॉक्टर बनने का सपना और फीस की दीवार

इस संकट का एक चेहरा मेडिकल शिक्षा भी है। देश में मेडिकल सीटों की संख्या बढ़ी है। लेकिन सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों के बीच फीस का अंतर आज भी एक बड़ा सवाल है। उपलब्ध सामग्री में राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि देश में कुल 1,36,939 स्नातक मेडिकल सीटें उपलब्ध थीं। इनमें 63,296 सीटें सरकारी संस्थानों में और 73,643 सीटें निजी संस्थानों में थीं। यानी कुल सीटों में निजी संस्थानों की हिस्सेदारी कम नहीं है। लेकिन निजी मेडिकल शिक्षा की फीस सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार के लिए बड़ी बाधा बन सकती है। सामग्री में निजी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की फीस एक करोड़ रुपये तक पहुंचने का उल्लेख है। यहां सवाल प्रतिभा का नहीं है। सवाल आर्थिक क्षमता का है। एक प्रतिभाशाली छात्र मेडिकल प्रवेश परीक्षा में सफल हो सकता है। लेकिन यदि उसे महंगी निजी सीट और सीमित सरकारी सीटों के बीच चुनाव करना पड़े, तो उसकी प्रतिभा के सामने परिवार की आर्थिक क्षमता खड़ी हो जाती है। क्या डॉक्टर बनने का सपना अब सिर्फ मेधावी होने से पूरा होगा, या आर्थिक रूप से सक्षम होना भी जरूरी है?

सरकारी मेडिकल सीटें बढ़ाने की जरूरत क्यों?

अगर देश को हर साल बड़ी संख्या में डॉक्टरों की जरूरत है, तो केवल निजी मेडिकल कॉलेजों का विस्तार समाधान नहीं हो सकता। क्योंकि स्वास्थ्य सेवा सिर्फ शहरों का विषय नहीं है। भारत के गांवों को डॉक्टर चाहिए। छोटे शहरों को विशेषज्ञ चाहिए। जिला अस्पतालों को प्रशिक्षित मानव संसाधन चाहिए। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को चिकित्सक चाहिए। लेकिन यदि मेडिकल शिक्षा की कीमत इतनी बढ़ जाए कि सामान्य परिवार का छात्र उससे बाहर हो जाए, तो चिकित्सा क्षेत्र का सामाजिक प्रतिनिधित्व भी प्रभावित हो सकता है। इसीलिए सरकारी मेडिकल कॉलेजों और सीटों की संख्या बढ़ाना केवल शिक्षा नीति का प्रश्न नहीं है। यह सामाजिक न्याय का प्रश्न भी है।

स्कूल की तस्वीर भी कम बेचैन करने वाली नहीं

उच्च शिक्षा से पहले स्कूल की बुनियाद आती है और अगर बुनियाद कमजोर हो तो पूरी इमारत पर सवाल खड़ा होता है। ग्रामीण और सरकारी विद्यालयों में शिक्षक उपलब्धता, आधारभूत संरचना और शिक्षण गुणवत्ता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। उपलब्ध सामग्री में सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी और भवन जैसी बुनियादी सुविधाओं की समस्या का उल्लेख है। कुछ विद्यालयों में कक्षाओं के साथ शिक्षकों की उपलब्धता का असंतुलन भी सवाल पैदा करता है। यहां समस्या केवल शिक्षक की संख्या नहीं है। समस्या यह भी है कि— क्या शिक्षक नियमित रूप से कक्षा में पहुंचता है? क्या विद्यार्थी को पर्याप्त शिक्षण समय मिलता है? क्या विद्यालय परीक्षा की तैयारी के बजाय सीखने की संस्कृति पैदा कर रहा है? क्या ग्रामीण बच्चे और निजी विद्यालयों के बच्चे समान प्रतिस्पर्धा के मैदान पर खड़े हैं? अगर जवाब नहीं है, तो प्रतियोगी परीक्षा के समय असमानता अचानक पैदा नहीं होती। उसकी नींव स्कूल के दिनों में ही पड़ चुकी होती है।

कोचिंग की अर्थव्यवस्था ने शिक्षा को कितना बदल दिया?

भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी एक समानांतर अर्थव्यवस्था बन चुकी है। शहरों में कोचिंग संस्थान हैं। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म हैं। टेस्ट सीरीज हैं। स्टडी मैटेरियल है। हॉस्टल हैं। लाइब्रेरी हैं और इन सबके बीच एक पूरा बाजार है, जिसकी कीमत अंततः छात्र और उसका परिवार चुकाता है। समस्या यह नहीं कि कोचिंग है। समस्या तब पैदा होती है जब सरकारी शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षा के बीच की दूरी इतनी बढ़ जाए कि छात्र को नौकरी पाने के लिए अलग से शिक्षा खरीदनी पड़े। तब आर्थिक रूप से कमजोर छात्र के सामने एक और दीवार खड़ी हो जाती है। जिसके पास संसाधन हैं, वह बेहतर तैयारी कर सकता है। जिसके पास संसाधन नहीं हैं, वह अक्सर प्रतिभा के बावजूद पीछे रह जाता है।

यह आक्रोश सिर्फ नौकरी का नहीं है

यही इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है। सड़क पर उतरने वाला युवा केवल नौकरी नहीं मांग रहा। वह कह रहा है— मेरी मेहनत की कीमत तय हो। मेरी परीक्षा निष्पक्ष हो। मेरी डिग्री की उपयोगिता हो। मेरी उम्र बर्बाद न हो। मेरी फीस मेरे परिवार को तबाह न करे और सरकार के वादे कागज से निकलकर जमीन पर आएं। युवा आक्रोश का यही नया चरित्र है। यह केवल आर्थिक असंतोष नहीं है। यह अवसर की असमानता के खिलाफ प्रतिक्रिया भी है।

सरकारें क्या कर सकती हैं?

सबसे पहला कदम होना चाहिए—परीक्षा प्रणाली का पूर्ण पुनर्गठन। पेपर सेटिंग से लेकर रिजल्ट तक प्रत्येक स्तर पर जवाबदेही तय हो। प्रश्नपत्र की सुरक्षा के लिए ऐसी तकनीक अपनाई जाए जिसमें किसी एक व्यक्ति के पास पूरी प्रक्रिया का नियंत्रण न हो। दूसरा कदम—राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर भर्ती कैलेंडर को बाध्यकारी बनाया जाए। परीक्षा की तारीख घोषित हो तो उसे बिना ठोस कारण के बदला न जाए। तीसरा—पेपर लीक या भर्ती अनियमितता की स्थिति में समयबद्ध जांच हो। मामला वर्षों तक लंबित रहना युवा के साथ दूसरा अन्याय है। चौथा—सरकारी शिक्षण संस्थानों की क्षमता बढ़ाई जाए। खासकर मेडिकल और तकनीकी शिक्षा में। पांचवां—डिग्री और रोजगार के बीच बेहतर तालमेल बनाया जाए। विश्वविद्यालयों में केवल डिग्री देने की जगह उद्योग और स्थानीय अर्थव्यवस्था की जरूरत के अनुसार कौशल विकसित किया जाए।

सबसे बड़ा सुधार: भरोसा वापस लाना होगा

सरकार आंकड़े दे सकती है। नई योजनाएं घोषित कर सकती है। नए कॉलेज खोल सकती है। सीटें बढ़ा सकती है। भर्ती निकाल सकती है। लेकिन अगर युवा को व्यवस्था पर भरोसा नहीं रहा तो ये सारी उपलब्धियां आधी रह जाएंगी। क्योंकि लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं चलता। लोकतंत्र उम्मीद से चलता है और युवा उस उम्मीद का सबसे बड़ा वाहक है। जिस दिन युवा को लगेगा कि मेहनत का कोई अर्थ नहीं, परीक्षा निष्पक्ष नहीं, नौकरी समय पर नहीं और शिक्षा उसकी पहुंच से बाहर है—उस दिन असंतोष का दायरा किसी एक भर्ती बोर्ड या विश्वविद्यालय की सीमा में नहीं रहेगा।

आक्रोश को अवसर में बदलना होगा

भारत के सामने आज एक ऐतिहासिक अवसर है। एक विशाल युवा आबादी देश की सबसे बड़ी उत्पादक शक्ति बन सकती है। लेकिन इसके लिए उसे केवल भाषण नहीं चाहिए। उसे अवसर चाहिए। उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए। उसे सस्ती और सुलभ उच्च शिक्षा चाहिए। उसे समय पर परीक्षा चाहिए। उसे पारदर्शी भर्ती चाहिए। उसे रोजगार चाहिए और उससे भी ज्यादा— उसे यह भरोसा चाहिए कि उसकी मेहनत बिकाऊ नहीं है। अगर यह भरोसा कायम रहा तो आज सड़क पर दिखाई दे रहा आक्रोश कल राष्ट्र निर्माण की ऊर्जा बन सकता है। लेकिन अगर इसे लगातार नजरअंदाज किया गया, तो यही आक्रोश धीरे-धीरे व्यवस्था से मोहभंग में बदल सकता है और किसी भी लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा खतरा शायद ही कोई हो।

आक्रोश से उबलती यह पीढ़ी आखिर चाहती क्या है?

सिर्फ नौकरी? शायद नहीं। सिर्फ फीस कम? शायद नहीं। सिर्फ पेपर लीक पर कार्रवाई? शायद नहीं। इसके पीछे एक बड़ा सवाल है— क्या भारत अपने युवाओं को वह भविष्य दे पा रहा है, जिसका सपना उसे दिखाया गया था? क्योंकि जिस देश की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी हो, वहां अगर वही युवा परीक्षा केंद्र से सड़क तक न्याय मांगता दिखाई दे, तो उसे केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानना भूल होगी। वह नीति की घंटी है। वह व्यवस्था के दरवाजे पर दस्तक है और शायद सबसे बड़ा सवाल यही है— जिस पीढ़ी को भारत का भविष्य कहा जा रहा है, उसके वर्तमान को सुरक्षित करने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? असली परीक्षा सरकार की है—युवा की नहीं।

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