KKN ब्यूरो। मुजफ्फरपुर की मीनापुर विधानसभा सीट का चांदपरना पुल आज सिर्फ एक अधूरे सपने की कहानी नहीं, बल्कि बिहार की सियासत में एक ऐसा मुद्दा बन चुका है, जो 2025 के विधानसभा चुनाव में सत्ता के समीकरण बदलने की ताकत रखता है। दो दशक से चली आ रही इस मांग ने न सिर्फ 40 हजार से अधिक लोगों की जिंदगी को प्रभावित किया है, बल्कि सरकार और पुल निगम विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान लगाए हैं।
कब से उठ रही है मांग
बूढ़ी गंडक नदी पर चांदपरना घाट पर पुल निर्माण की मांग पिछले 20 साल से लगातार उठ रही है। चांदपरना पंचायत और बहादुरपुर के बीच प्रस्तावित इस पुल के लिए स्थानीय लोग निरंतर संघर्ष कर रहे हैं। 2019 में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया जब पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया। उन्होंने घोषणा की कि “बूढ़ी गंडक नदी पर मीनापुर के चांदपरना घाट पर पुल निर्माण को लेकर गांधीवादी तरीके से संघर्षपूर्ण आंदोलन चलाया जाएगा”।
विधायक मुन्ना यादव: विधानसभा में गूंजा मुद्दा
आरजेडी के वर्तमान विधायक राजीव कुमार उर्फ मुन्ना यादव ने इस मुद्दे को राज्यव्यापी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने बिहार विधानसभा में पूरक सवाल उठाते हुए कहा, “चार बार डीपीआर तैयार हो चुका है, उसमें चाहत कर अध्यक्ष महोदय समय सीमा बता”।
राजनंदन साहनी: 30 साल का एकल संघर्ष
श्रमिक कल्याण संघ के अध्यक्ष राजनंदन साहनी पिछले 30 साल से इस पुल के लिए अकेले लड़ाई लड़ रहे हैं। 2024 के दिसंबर माह में उन्होंने जिलाधिकारी को ज्ञापन देकर जिला योजना चयन समिति में पारित प्रस्ताव पर कार्य शुरू करने की मांग की। इससे पहले राजनंदन सहनी पुल की मांग को लेकर धरना, प्रदर्शन और अनशन करते रहें हैं।
सरकार और पुल निगम की कार्रवाई
- सर्वे पूरा: 2025 फरवरी में बिहार राज्य पुल निर्माण निगम ने चांदपरना घाट पर सर्वे पूरा किया। लगभग 300 मीटर लंबा पुल प्रस्तावित बताया गया।
- तकनीकी जांच: मिट्टी और स्वायल टेस्ट की प्रक्रिया बताई गई, लेकिन निर्माण आदेश (NIT/टेंडर) अभी तक जारी नहीं हुआ।
- प्रस्ताव और DPR: स्थानीय स्तर पर जिला योजना समिति से प्रस्ताव पास होने और DPR की तैयारी का जिक्र मिलता है। हालांकि फंड आवंटन या कैबिनेट मंजूरी की आधिकारिक पुष्टि अब तक नहीं हुई।
बार-बार बनते रहे DPR, लेकिन काम क्यों रुका?
एक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इस पुल के लिए अब तक चार बार DPR (Detailed Project Report) तैयार हो चुका है, लेकिन फिर भी पुल का निर्माण शुरू नहीं हो सका। मंत्री अशोक चौधरी ने विधानसभा में एक सवाल के जवाब में कहा था कि डीपीआर तैयार है। कार्रवाई की जाएगी।
2025 में मिली नई उम्मीद
फरवरी 2025 में एक सकारात्मक घटनाक्रम सामने आया जब बिहार राज्य पुल निगम ने चांदपरना घाट पर 300 मीटर लंबे पुल के लिए सर्वे का काम पूरा कर लिया। पुल निगम के पदाधिकारी दिलीप कुमार पांडेय ने बताया कि “नदी पर 300 मीटर लंबा पुल बनेगा और अगले सप्ताह स्वायल जांच की जाएगी”।
बारिश में 20 किमी का चक्कर
मीनापुर प्रखंड के बूढ़ी गंडक नदी के किनारे चांदपरना के समीप दोनों ओर लगभग 40 हजार की आबादी को अपनी रोजमर्रा के लिए नदी पार करना होता है। इन लोगों के लिए नाव ही आवागमन का एकमात्र सहारा है। सबसे बड़ी समस्या बाढ़ और बरसात के मौसम में होती है, जब प्रखंड मुख्यालय से महज छह किलोमीटर दूर के गांवों के लोगों को लगभग 20 किमी की दूरी तय करनी होती है। पुल निर्माण से चांदपरना और समीप के दो दर्जन से अधिक गांवों की आबादी को लाभ मिलेगा। इनमें मुख्यत: कृषि पर निर्भर परिवार निवास करते हैं जो बाढ़ के समय पूरी तरह से अलग-थलग पड़ जाते हैं।
पुल बनने से किसे लाभ होगा?
यह पुल केवल एक ढांचा नहीं, बल्कि हजारों लोगों के लिए जीवन रेखा साबित होगा।
- लाभार्थी गाँव: दो दर्जन से अधिक गाँवों की आबादी सीधे जुड़ जाएगी।
- कुल आबादी: अनुमान है कि लगभग 40 हजार से अधिक लोग इससे सीधे लाभान्वित होंगे।
- फ़ायदे:
- बच्चों के लिए स्कूल-कॉलेज पहुँचना आसान।
- आपातकाल में एंबुलेंस और अस्पताल तक सीधी पहुँच।
- किसान और मज़दूर अपने उत्पाद (विशेषकर लीची और सब्ज़ियाँ) आसानी से बाज़ार ले जा सकेंगे।
- बाढ़ और नाव हादसों से मुक्ति।
2025 विधानसभा चुनाव में चांदपरना पुल की अहमियत
बिहार के राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, चांदपरना पुल 2025 के विधानसभा चुनाव में एक निर्णायक मुद्दा बन सकता है। मीनापुर सीट पर पिछले दो चुनावों में आरजेडी की जीत के बावजूद, इस बार पुल का मुद्दा मतदाताओं के निर्णय को प्रभावित कर सकता है। यह पुल महागठबंधन और एनडीए दोनो के लिए मुश्किल खड़ा करने वाला है। चुनाव दर चुनाव मिलने वाले आश्वासन से लोग तंग आ चुकें है। असंतोष का आलम से है कि अब यह आक्रोश की परिणति लेने लगा है। लोग खुद को ठगी का शिकार होना, महसूस करने लगे है।
राज्यव्यापी समस्या
चांदपरना पुल की समस्या अकेली नहीं है। बिहार राज्य पुल निर्माण निगम की एक ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में 40 ऐसे पुल हैं जो खतरनाक स्थिति में हैं। इससे पता चलता है कि पुल निर्माण और रखरखाव की समस्या राज्यव्यापी मुद्दा बन जाये तो किसी को अश्चर्य नहीं होगा। राज्य सरकार के पास पुल निर्माण के लिए पर्याप्त बजट है – 2025 तक कुल 4,415 पुलों के निर्माण की प्रशासनिक स्वीकृति दी जा चुकी है, जिनमें से 2,551 पुल पूरे हो चुके हैं। लेकिन इसमें चांदपरना शामिल नहीं है।
आगे का रास्ता: क्या होगा समाधान?
- DPR की त्वरित स्वीकृति: चूंकि सर्वे पूरा हो चुका है, अब DPR को जल्द मंजूरी मिलनी चाहिए
- पर्यावरण क्लियरेंस: नदी पर पुल के लिए पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया तेज करनी होगी
- बजट आवंटन: राज्य बजट में इस पुल के लिए विशेष प्राविधान करना होगा
चुभते सवाल और उनके जवाब
- पुल का DPR और फंडिंग कब फाइनल होगा?
– अभी तक कैबिनेट स्तर पर मंजूरी और फंड आवंटन की कोई ठोस जानकारी सार्वजनिक नहीं हुई है। - काम शुरू होने की तारीख क्यों नहीं बताई जा रही?
– सर्वे और स्वायल टेस्ट हो चुके हैं, लेकिन टेंडर प्रक्रिया (NIT) जारी न होने तक निर्माण शुरू नहीं हो सकता है। - पुल की अनुमानित लागत क्या होगी?
– स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार पुल लगभग 300 मीटर लंबा होगा। लागत का आकलन DPR में दर्ज है, पर आधिकारिक दस्तावेज़ सार्वजनिक नहीं है। - बाढ़ और कटाव से पुल की सुरक्षा कैसे होगी?
– बूढ़ी गंडक कटाव-प्रवण है। इसलिए पुल के डिज़ाइन में पायलिंग और कटाव-रोधी उपाय अनिवार्य होने चाहिए। - जवाबदेही किसकी है?
– तकनीकी रूप से बिहार राज्य पुल निर्माण निगम और जिला प्रशासन जिम्मेदार हैं। फंड और मंजूरी राज्य सरकार के कैबिनेट स्तर पर तय होगी।
दीर्घकालिक योजना
मीनापुर क्षेत्र के समग्र विकास के लिए केवल चांदपरना पुल ही पर्याप्त नहीं। यहाँ बाढ़ नियंत्रण, सड़क संपर्क सुधार, और कृषि आधारभूत ढांचे में निवेश की आवश्यकता है। चांदपरना पुल केवल कंक्रीट और लोहे का ढांचा नहीं, बल्कि मीनापुर की हजारों आबादी के जीवन से जुड़ा सवाल है। दो दशक पुरानी मांग आज भी अधूरी है। सर्वे और तकनीकी जांच पूरी हो चुकी है, लेकिन निर्माण कब होगा, यह अब भी अनुत्तरित सवाल है। यही वजह है कि 2025 का विधानसभा चुनाव इस पुल के बिना पर लड़ा जाये, तो आश्चर्य नहीं होगा।
सियासत से ऊपर उठकर सोचने की जरूरत
चांदपरना पुल का मुद्दा केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि बिहार की समग्र विकास नीति और प्राथमिकताओं का आईना है। 20 साल के संघर्ष के बाद भी यदि यह पुल नहीं बन सका है, तो इससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य की नीति निर्माण प्रक्रिया में कहीं न कहीं गंभीर खामियां हैं।
2025 के विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण कारक होगा। मतदाता अब केवल वादों से संतुष्ट नहीं होंगे, बल्कि ठोस परिणाम की मांग करेंगे। जो भी राजनीतिक दल इस मुद्दे को गंभीरता से लेकर व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करेगा, वह मीनापुर की जनता का भरोसा जीत सकता है।
सवाल उठता है कि आखिर कब तक चांदपरना के लोग नाव के भरोसे रहेंगे? यह प्रश्न केवल मीनापुर के 40 हजार लोगों का नहीं, बल्कि पूरे बिहार के विकास के सपने देखने वालों का है। समय आ गया है कि इस सवाल का जवाब सिर्फ बयानबाजी में नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई दे।