बिहार के छपरा से सामने आई यह खबर किसी चमत्कार से कम नहीं है। वर्ष 2008 में जिस बेटे को परिवार ने मृत मान लिया था और हिंदू रीति-रिवाज से उसका अंतिम संस्कार तक कर दिया था, वही बेटा 18 साल बाद एक युवा के रूप में अपने माता-पिता और भाई के सामने जीवित खड़ा मिला। यह भावुक पुनर्मिलन छपरा स्थित सेवा कुटीर परिसर में हुआ, जहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं।
सामाजिक सुरक्षा विभाग के तत्वावधान में संचालित सेवा कुटीर में जब रोशन कुमार अपने परिजनों से मिला, तो वर्षों की पीड़ा एक ही पल में फूट पड़ी। रोशन अपने माता-पिता से लिपटकर फफक-फफक कर रोने लगा। बेटे को जीवित सामने देखकर माता-पिता खुद को संभाल नहीं पाए। वर्षों से दबा हुआ दर्द और अचानक मिली खुशी ने माहौल को बेहद भावुक बना दिया।
वर्ष 2008 में अचानक लापता हो गया था रोशन
रोशन कुमार मुजफ्फरपुर जिले के गायघाट प्रखंड अंतर्गत लक्ष्मण नगर निवासी विश्वनाथ साह और रामपरी देवी का पुत्र है। परिजनों के अनुसार, मैट्रिक परीक्षा के बाद रोशन गलत संगत में पड़ गया था। इसी दौरान वह कुछ दोस्तों के साथ दिल्ली जाने के लिए घर से निकला। सफर के दौरान वह ट्रेन में अपने साथियों से बिछड़ गया।
बौद्धिक रूप से कमजोर होने के कारण रोशन घर लौटने का रास्ता नहीं खोज सका। इधर, परिवार को उसके लापता होने की जानकारी मिली तो मानो जमीन खिसक गई। माता-पिता ने बेटे को ढूंढने के लिए हर संभव प्रयास किया। रिश्तेदारों से लेकर अधिकारियों तक सभी से संपर्क किया गया, लेकिन कहीं से कोई सुराग नहीं मिला।
उस समय विश्वनाथ साह सरकारी सेवा में कार्यरत थे। उन्होंने अपनी नौकरी और संसाधनों का पूरा उपयोग किया, लेकिन महीनों की तलाश के बाद भी रोशन का कोई पता नहीं चला। धीरे-धीरे उम्मीद टूटती चली गई और अंततः परिवार ने रोशन को मृत मान लिया। भारी मन से हिंदू रीति के अनुसार उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया।
छपरा में भटकता मिला रोशन, सेवा कुटीर ने दिया सहारा
परिवार को यह नहीं पता था कि रोशन जिंदा है और संघर्ष भरी जिंदगी जी रहा है। वह छपरा में इधर-उधर भटकता हुआ पाया गया। उसकी हालत देखकर सेवा कुटीर से जुड़े संवेदनशील लोगों ने उसे अपने संरक्षण में ले लिया। मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए रोशन की देखभाल शुरू की गई।
इसके बाद उसे भोजपुर जिले के कोईलवर स्थित मानसिक चिकित्सालय में इलाज के लिए भेजा गया। वहां डॉक्टरों की निगरानी में उसका उपचार हुआ। इलाज के बाद उसकी नियमित काउंसलिंग कराई गई, जिससे उसकी स्थिति में धीरे-धीरे सुधार होने लगा।
काउंसलिंग के दौरान रोशन ने अपने गांव, घर और पिता का नाम बताया। यह जानकारी उसके अतीत से जुड़ने की पहली मजबूत कड़ी बनी। यहीं से एक नई उम्मीद ने जन्म लिया।
प्रशासन और सेवा कुटीर की संयुक्त कोशिशें रंग लाईं
रोशन से मिली जानकारी के आधार पर सेवा कुटीर, जिला प्रशासन और सामाजिक सुरक्षा कोषांग के अधिकारियों और कर्मचारियों ने मिलकर खोज अभियान शुरू किया। यह प्रक्रिया आसान नहीं थी। कई स्रोतों से जानकारी जुटाई गई और हर पहलू की गंभीरता से जांच की गई।
यह प्रयास धैर्य और संवेदना के साथ आगे बढ़ाया गया। कई बार निराशा हाथ लगी, लेकिन उम्मीद बनी रही। अंततः वर्षों बाद परिजनों का पता चल गया। जब रोशन के परिवार को यह सूचना दी गई कि उनका बेटा जीवित है, तो पहले तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ।
सेवा कुटीर में हुआ ऐतिहासिक पुनर्मिलन
सेवा कुटीर परिसर में हुए इस पुनर्मिलन का दृश्य बेहद भावुक था। जैसे ही रोशन अपने माता-पिता और भाई के सामने आया, भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा। वर्षों से जिस बेटे को खो चुके थे, उसे अपनी आंखों के सामने देखकर माता-पिता की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।
मां बार-बार बेटे का चेहरा छूकर खुद को यकीन दिलाने की कोशिश कर रही थी। पिता भावुक होकर चुपचाप खड़े रहे। वहां मौजूद हर व्यक्ति इस दृश्य को देखकर भावुक हो उठा। यह पल न केवल परिवार के लिए, बल्कि समाज के लिए भी बेहद प्रेरणादायक था।
माता-पिता ने जताया आभार, कहा सबसे बड़ी खुशी
अपने बेटे को जीवित पाकर माता-पिता ने सेवा कुटीर सारण और जिला प्रशासन के प्रति गहरा आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह उनके जीवन की सबसे बड़ी खुशी है। वर्षों से जो उम्मीद अधूरी थी, वह आज पूरी हो गई।
परिजनों ने बताया कि हर त्योहार, हर खुशी के मौके पर रोशन की कमी खलती थी। अब ऐसा लग रहा है जैसे जीवन फिर से पूरा हो गया हो। यह पल उनके लिए किसी नए जीवन की शुरुआत जैसा है।
सामाजिक सरोकार और संवेदना की मिसाल
इस मौके पर जिला सामाजिक सुरक्षा कोषांग के सहायक निदेशक राहुल कुमार, गृह अधीक्षक राकेश रंजन सिंह, क्षेत्र समन्वयक अरुण कुमार, परामर्शदाता रजनीश कुमार सहित अन्य अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित थे। सभी ने इस पुनर्मिलन को सामाजिक सरोकार और मानवीय जिम्मेदारी का बेहतरीन उदाहरण बताया।
अधिकारियों ने कहा कि यह केवल एक प्रशासनिक सफलता नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि जब व्यवस्था संवेदनशील बनती है, तो वह सिर्फ कागजी काम नहीं करती, बल्कि टूटे हुए रिश्तों को भी जोड़ने का काम करती है।
उम्मीद, भरोसा और इंसानियत की जीत
रोशन कुमार की यह कहानी बताती है कि उम्मीद कभी नहीं छोड़नी चाहिए। यह घटना साबित करती है कि इंसानियत, धैर्य और सामूहिक प्रयास से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। वर्षों की पीड़ा के बाद एक परिवार को फिर से खुशियां मिली हैं।
छपरा की यह घटना न सिर्फ एक परिवार की जिंदगी बदलने वाली है, बल्कि समाज के लिए भी एक मजबूत संदेश है। जब संवेदना और जिम्मेदारी साथ चलती हैं, तो बिछड़े लोग भी अपने अपनों से दोबारा मिल सकते हैं।
