Home Bihar Muzaffarpur मीनापुर विधानसभा में जन सुराज की भूमिका: प्रशांत किशोर की रणनीति और...

मीनापुर विधानसभा में जन सुराज की भूमिका: प्रशांत किशोर की रणनीति और उम्मीदवारों का विश्लेषण

बाजीगर

KKN ब्यूरो। बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी का प्रवेश 2025 विधानसभा चुनावों में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो रहा है। मुजफ्फरपुर जिले की मीनापुर विधानसभा सीट (क्रम संख्या 90) में जन सुराज की भूमिका विशेष रूप से दिलचस्प है, क्योंकि यह क्षेत्र पिछले कई चुनावों में आरजेडी का गढ़ रहा है और यहां की जातीय राजनीति अत्यंत जटिल है।

मीनापुर की राजनीतिक पृष्ठभूमि

मीनापुर विधानसभा सीट वैशाली लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है और यह मुख्यरूप से ग्रामीण क्षेत्र है। 2020 के चुनाव में यहां कुल 2,74,475 मतदाता थे, जिनमें अनुसूचित जाति के (16.95%) मतदाता शामिल है। अति पिछड़ा समाज की हिस्सेदारी करीब 19.7 प्रतिशत है। सवाल उठता है कि जन सुराज इन वोटबैंक में कितना सेंधमारी कर सकेगा। देखने वाली बात ये है कि 2025 में मतदाताओं की संख्या बढ़ कर 2,78,268 हो गई है। वर्तमान में आरजेडी के राजीव कुमार उर्फ मुन्ना यादव इस सीट से विधायक हैं, जिन्होंने 2020 में जेडीयू के मनोज कुमार को 15,512 वोटों से हराया था। 2015 में मुन्ना यादव ने भाजपा के अजय कुमार को 23,940 वोटों के बड़े अंतर से हराया था, जो आरजेडी की मजबूती को दर्शाता है।

जातीय समीकरण और जन सुराज का प्रभाव

मीनापुर की जातीय संरचना में कुशवाहा, सहनी, यादव और वैश्य समुदाय प्रमुख हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, “यहां कुशवाहा और सहनी के साथ यादव वोटरों की संख्या कमोबेश एक जैसी है”। यह समीकरण जन सुराज के लिए अवसर प्रदान करता है, क्योंकि प्रशांत किशोर ने अपनी पदयात्रा के दौरान इन सभी समुदायों तक पहुंचने की कोशिश की है। प्रशांत किशोर पिछले दिनों मीनापुर में एक महती जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था कि “लालच देकर वोट खरीदने वाले आयेंगे, इससे बचना होगा” और लोगों से अपने बच्चों के नाम पर वोट करने की अपील की थी। उन्होंने वादा किया था कि उनकी सरकार बनने पर प्रवासी मजदूरों को फिर से बाहर नहीं जाना पड़ेगा और दिसंबर से ही 10-12 हजार रुपये का रोजगार मिलना शुरू हो जाएगा। प्रशांत किशोर की ये बातें आज भी फिजां में तैर रही है। हालांकि, दावों के साथ अभी कुछ भी कहना जल्दीबाजी हो जायेगा।

संभावित उम्मीदवार और चुनावी संभावनाएं

जन सुराज पार्टी ने अभी तक मीनापुर से अपने संभावित उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है, लेकिन पार्टी की रणनीति के अनुसार, वे जमीनी नेताओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, जन सुराज के रणनीतिकारों ने मीनापुर के लिए उम्मीदवार का चयन कर लिया है। लेकिन, इसकी घोषणा होना अभी बाकी है। इस बीच जन सुराज ने स्थानीय स्तर पर जन संपर्क और पदयात्रा शुरू करके लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का एक अनोखा प्रयास, अभी से शुरू कर दिया है। जन सुराज ने मीनापुर में स्थानीय स्तर पर जन संपर्क और पदयात्रा शुरू करके एक अनोखा प्रयास किया है। अमर शहीद जुब्बा सहनी की प्रतिमा से शुरू हुई छह दिवसीय पदयात्रा में पार्टी ने स्थानीय नेताओं के साथ घर-घर जाकर अपने विजन को समझाने का काम किया है।

जन सुराज को हल्के में लेना खतरनाक:

जन सुराज को हल्के में लेना खतरनाक साबित हो सकता है। मिशाल के तौर पर 2024 के उपचुनावों में जन सुराज की प्रदर्शन से जो संकेत मिल चुका है, उसको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। उपचुनाव में पार्टी 10-22% वोट शेयर हासिल करके सभी को चौका दिया था। इमामगंज में जितेंद्र पासवान को 37,103 वोट (22.46) मिले थे, जो दर्शाता है कि पार्टी में वोट काटने की प्रयाप्त क्षमता है।

किसका होगा सर्वाधिक नुकसान?

राजनीतिक विश्लेषको का मानना है कि “जन सुराज से सबसे ज्यादा नुकसान एनडीए खासकर जेडीयू को हो सकता है”। एक CVoter सर्वे के अनुसार, 20% लोगों का मानना है कि जन सुराज एनडीए को नुकसान करेगी, 18% का कहना है कि महागठबंधन को, और 35% का मानना है कि दोनों को नुकसान होगा।

मीनापुर के संदर्भ में देखें तो:

महागठबंधन को नुकसान: यदि जन सुराज मुस्लिम या यादव उम्मीदवार उतारती है तो आरजेडी के पारंपरिक MY (मुस्लिम-यादव) वोट बैंक में सेंध लग सकती है।

एनडीए को नुकसान: कुशवाहा या वैश्य समुदाय में यदि जन सुराज की पैठ बनती है तो एनडीए के वोट बैंक को नुकसान हो सकता है, क्योंकि 2010 में जेडीयू के दिनेश प्रसाद (कुशवाहा) यहां से चुनाव जीते थे। लेकिन, यदि किसी सहनी को जन सुराज अपना उम्मीदवार बनाती है, तो इसका असर, कमोवेश दोनो ओर हो सकता है।

समग्र प्रभाव: मीनापुर में जन सुराज की उपस्थिति त्रिकोणीय मुकाबला बना सकती है, जैसा कि 2020 में लोजपा की उपस्थिति ने किया था। तब अजय कुमार (लोजपा) को 43,496 वोट मिले थे, जिससे मुकाबला तीन-तरफा हो गया था। इसका लाभ आरजेडी को मिला था।

जन सुराज की रणनीति और चुनौतियां

प्रशांत किशोर की रणनीति जाति-आधारित राजनीति को चुनौती देने पर केंद्रित है। उन्होंने कहा है कि “बिहार में कुछ ही परिवारों का राजनीति पर कब्जा है, जो जाति और परिवार के नाम पर टिकट बांटते हैं”। मीनापुर में उनकी चुनौती यह होगी कि क्या वे इस परंपरागत राजनीति को तोड़ पायेंगे।

जन सुराज की मुख्य चुनौतियां हैं:

  1. संगठनात्मक ढांचा: 243 सीटों पर मजबूत उम्मीदवार खड़े करना
  2. जातीय गणित: बिना किसी जातीय आधार के वोट जुटाना
  3. संसाधन: सभी सीटों पर प्रभावी प्रचार करना, मीनापुर इससे अछूता नहीं रहेगा।

मीनापुर बनेगा राजनीति का प्रयोगशाला:

मीनापुर विधानसभा सीट में जन सुराज की भूमिका निर्णायक हो सकती है। यदि पार्टी यहां मजबूत उम्मीदवार उतारती है तो वह आरजेडी की परंपरागत जीत को चुनौती दे सकती है। हालांकि जन सुराज के जीतने की संभावना कम दिखती है, लेकिन वह वोट काटने की भूमिका निभाकर परिणाम को प्रभावित कर दे तो आश्चर्य नहीं होगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मीनापुर के मतदाता जाति-आधारित राजनीति से ऊपर उठकर विकास और रोजगार के मुद्दों को प्राथमिकता देंगे। प्रशांत किशोर का दांव यही है कि युवा मतदाता और शिक्षित वर्ग परिवर्तन चाहता है, लेकिन मीनापुर जैसी ग्रामीण सीट में यह कितना सफल होगा, यह 2025 का चुनाव ही बताएगा।

जन सुराज पार्टी ने निश्चित रूप से बिहार की राजनीति में एक नया आयाम जोड़ा है। मीनापुर में इसका प्रदर्शन न केवल प्रशांत किशोर की राजनीतिक भविष्य तय करेगा बल्कि बिहार में जातीय राजनीति के भविष्य का रोडमैप भी प्रस्तुत करेगा। यह सीट वास्तव में बिहार की राजनीति की प्रयोगशाला बनने की पूरी संभावना रखती है।

 

 

KKN लाइव WhatsApp पर भी उपलब्ध है, खबरों की खबर के लिए यहां क्लिक करके आप हमारे चैनल को सब्सक्राइब कर सकते हैं।

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version