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मुर्गा चोरी के आरोप में पीट-पीट कर हत्या बिहार में कानून का इकबाल

KKN ब्यूरो। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले अन्तर्गत मीनापुर प्रखंड के रामपुरहरि थाना क्षेत्र के कोइली गांव में गुरुवार देर रात भीड़तंत्र की बर्बरता ने एक जिंदगी छीन ली। महज मुर्गा चोरी के आरोप में ग्रामीणों ने 40 वर्षीय संजय सहनी की पेड़ से बांधकर बेरहमी से पिटाई कर दी, जिससे उसकी मौत हो गई। इस घटना से पूरे इलाके में सनसनी फैल गई है।

घटना कैसे हुई

जानकारी के मुताबिक, कोइली गांव निवासी रमेश सहनी मुर्गा फार्म चलाता है। गुरुवार रात उसने संजय सहनी को अपने फार्म से मुर्गा चोरी करते रंगे हाथ पकड़ लिया। आरोप है कि रमेश ने गुस्से में आकर उसे रस्सी से पेड़ से बांध दिया और लाठी-डंडों से पीटना शुरू कर दिया। ग्रामीणों का कहना है कि बीते दिनों भी मुर्गा चोरी की घटनाएं हो चुकी थीं, जिसके बाद रमेश सतर्क था। शुक्रवार सुबह तक जब ग्रामीणों को घटना की जानकारी मिली तो पंचायत बैठी और समझौते की कोशिश हुई। लेकिन इस बीच गंभीर रूप से घायल संजय ने दम तोड़ दिया।

पुलिस की कार्रवाई

घटना की सूचना मिलते ही रामपुरहरि थाने की पुलिस मौके पर पहुंची। थानाध्यक्ष शिवेंद्र नारायण सिंह ने बताया कि मृतक के परिजनों का बयान दर्ज कर एफआईआर की जाएगी। फिलहाल पुलिस ने आरोपित रमेश सहनी को गिरफ्तार कर लिया है और शव को पोस्टमार्टम के बाद परिजनो को सौप दिया गया है। एफएलसी टीम ने घटनास्थल से सभी साक्ष्य इकट्ठा किए हैं।

परिजनों का हाल

संजय सहनी की मौत के बाद उसके घर में कोहराम मचा है। पत्नी पार्वती देवी और मां संध्या देवी का रो-रोकर बुरा हाल है। पिता महेश सहनी सदमे में हैं। संजय के मौत से 12 साल की बेटी माला कुमारी और 6 साल का बेटा मंगल कुमार अचानक अनाथ हो गया। उसको कुछ भी समझ नहीं आ रहा है। हालांकि, इस घटना को लेकर गांव में कई तरह की बातें कही जा रही है।

भीड़तंत्र पर सवाल

यह घटना एक बार फिर बिहार में भीड़तंत्र की हिंसा और गांव की न्याय पंचायत की प्रवृत्ति पर गंभीर सवाल खड़ा करती है। एक मामूली आरोप पर किसी व्यक्ति को बांधकर पीटना और उसकी जान ले लेना न सिर्फ कानून का उल्लंघन है, बल्कि इंसानियत के लिए भी शर्मनाक भी है।

भीड़तंत्र हिंसा के पिछले मामले

देश में पिछले कुछ वर्षों में भीड़तंत्र हिंसा की कई घटनाएं सामने आई हैं:

  • सितंबर 2015, दादरी (उत्तर प्रदेश): गोमांस के शक में अखलाक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई।
  • जून 2017, झारखंड: अलीमुद्दीन अंसारी की हत्या गोमांस के शक में कर दी गई थी।
  • जुलाई 2018, बिहार के नवादा: बच्चा चोरी की अफवाह पर भीड़ ने तीन लोगों की हत्या कर दी।
  • जुलाई 2019, छपरा (बिहार): बच्चा चोरी के शक में तीन लोगों को पीट-पीटकर मार डाला गया।

इन घटनाओं में पुलिस कार्रवाई के बावजूद दोषियों को सजा दिलाने में लंबा वक्त लगता है, जिससे भीड़ को “तात्कालिक न्याय” करने की मानसिकता बल मिलती है।

क्यों बढ़ रही हैं ऐसी घटनाएं

  • कानून पर भरोसे की कमी: लोग पुलिस या अदालत की जगह खुद “न्याय” करने लगते हैं।
  • गांवों में अफवाह और गुस्सा: चोरी, बच्चा-चोरी या सांप्रदायिक अफवाहें भीड़ को भड़काती हैं।
  • धीमी न्याय प्रणाली: मुकदमों में वर्षों तक फैसले न आने से लोग त्वरित समाधान चाहते हैं।
  • सोशल मीडिया का असर: कई बार गलत सूचना तेजी से फैलकर भीड़ जुटा देती है।

सवाल जो उठते हैं

  • क्या किसी व्यक्ति की छोटी चोरी की सजा मौत हो सकती है?
  • जब कानून व्यवस्था मौजूद है, तो गांवों में पंचायत और भीड़ खुद “न्याय” क्यों करती है?
  • क्या सरकार को Mob Lynching कानून अलग से बनाना चाहिए?

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