होमBiharपूर्णिया की बिना हाथों की बेटी ने हौसले से बदली अपनी तकदीर

पूर्णिया की बिना हाथों की बेटी ने हौसले से बदली अपनी तकदीर

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बिहार की धरती ने एक बार फिर यह साबित किया है कि मजबूत इरादों के आगे शारीरिक सीमाएं टिक नहीं पातीं। Purnia जिले के एक छोटे से गांव में जन्मी रूपम कुमारी की कहानी साहस, संघर्ष और आत्मविश्वास की मिसाल है। जन्म से दोनों हाथ न होने के बावजूद उन्होंने कभी खुद को कमजोर नहीं माना। परिस्थितियों से समझौता करने के बजाय उन्होंने उनसे लड़ने का रास्ता चुना। आज रूपम पीएचडी कर रही हैं और जल्द ही उनके नाम के आगे डॉक्टर जुड़ जाएगा।

उनकी यह यात्रा सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। यह उन लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है, जो किसी न किसी चुनौती से जूझ रहे हैं। रूपम ने यह साबित किया है कि असली शक्ति शरीर में नहीं, बल्कि सोच और मेहनत में होती है।

बचपन से ही चुनौतियों से भरी रही राह

रूपम का बचपन आसान नहीं था। बिना हाथों के जन्म लेने के कारण रोजमर्रा के काम भी उनके लिए बड़ी चुनौती बन जाते थे। गांव में सीमित संसाधन और सामाजिक सोच कई बार निराश करती थी। कई लोग उनकी क्षमता पर सवाल उठाते थे।

इन तमाम मुश्किलों के बीच परिवार का साथ उनकी सबसे बड़ी ताकत बना। माता-पिता ने कभी उन्हें कमतर महसूस नहीं होने दिया। इसी सहयोग ने रूपम को हर हाल में आगे बढ़ने की हिम्मत दी।

पैरों से काम करना सीखा, शिक्षा को बनाया हथियार

समय के साथ रूपम ने अपने पैरों से काम करना सीख लिया। उन्होंने ठान लिया कि शिक्षा ही उनका सबसे बड़ा हथियार बनेगी। किताबें पकड़ना और लिखना उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

पैरों से लिखने की शुरुआत बेहद कठिन रही। शुरुआत में अक्षर साफ नहीं बनते थे और लिखने में बहुत समय लगता था। लगातार अभ्यास और धैर्य ने इस कठिनाई को धीरे-धीरे आसान बना दिया।

2009 में मिली पहली बड़ी सफलता

साल 2009 रूपम के जीवन का अहम मोड़ साबित हुआ। उन्होंने दसवीं की परीक्षा सफलतापूर्वक पास की। यह उनकी पहली बड़ी शैक्षणिक सफलता थी। इस उपलब्धि ने उन्हें आगे बढ़ने का नया आत्मविश्वास दिया।

इसके बाद उन्होंने इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की और फिर कॉलेज में दाखिला लिया। हर परीक्षा उनके लिए नई चुनौती लेकर आती थी, लेकिन उनका हौसला हर बार मजबूत होकर सामने आया।

कॉलेज से NET तक का कठिन सफर

कॉलेज के दिनों में रूपम ने उच्च शिक्षा का सपना देखा। उन्होंने National Eligibility Test की तैयारी शुरू की। यह परीक्षा देश की कठिन परीक्षाओं में गिनी जाती है।

कड़ी मेहनत और निरंतर अभ्यास के बाद रूपम ने NET पास कर लिया। यह उपलब्धि अपने आप में असाधारण थी। सामान्य छात्रों के लिए भी यह परीक्षा कठिन मानी जाती है, लेकिन रूपम के लिए यह संघर्ष पर जीत का प्रतीक बन गई।

भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय से पीएचडी

वर्तमान में रूपम कुमारी Bhupendra Narayan Mandal University से पीएचडी कर रही हैं। शोध कार्य पूरा होते ही उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि मिलेगी। इसके साथ ही वह आधिकारिक रूप से डॉक्टर कहलाएंगी।

यह मुकाम सिर्फ उनकी मेहनत का परिणाम नहीं है। यह उन सभी लोगों की जीत है, जो सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों में भी बड़े सपने देखते हैं।

पढ़ाई के साथ बच्चों को पढ़ाया, खुद संभाली जिम्मेदारी

अपनी पढ़ाई और परिवार की आर्थिक मदद के लिए रूपम ने गांव के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। पैरों से लिखते हुए बच्चों को पढ़ाना गांव के लिए भी एक अनोखा दृश्य था।

धीरे-धीरे वह बच्चों के लिए Role Model बन गईं। अभिभावकों और छात्रों ने उनसे Motivation लेना शुरू किया। उनकी मौजूदगी ने गांव में शिक्षा के प्रति सकारात्मक माहौल बनाया।

परिवार और पति का मिला पूरा साथ

रूपम की शादी हो चुकी है। उनके पति एक प्राइवेट टीचर हैं। रूपम बताती हैं कि पति और परिवार का सहयोग उन्हें लगातार आगे बढ़ने की ताकत देता है।

भावनात्मक और मानसिक समर्थन ने उनके Career को नई दिशा दी। परिवार के साथ ने उन्हें हर मुश्किल दौर में संभाले रखा।

सोशल मीडिया पर बनीं प्रेरणा की पहचान

आज रूपम कुमारी की कहानी सोशल मीडिया पर तेजी से साझा की जा रही है। लोग उनके संघर्ष और सफलता से प्रेरणा ले रहे हैं। खासकर दिव्यांग युवाओं के लिए वह उम्मीद की नई रोशनी बनकर सामने आई हैं।

उनका जीवन यह संदेश देता है कि सीमाएं शरीर की नहीं, सोच की होती हैं। अगर इरादे मजबूत हों तो कोई भी बाधा रास्ता नहीं रोक सकती।

हजारों युवाओं के लिए उम्मीद की मिसाल

पूर्णिया की रूपम कुमारी ने अपने संघर्ष से यह साबित कर दिया है कि असंभव कुछ भी नहीं। उनकी यात्रा संघर्ष से सफलता तक की जीवंत कहानी है।

आज वह न सिर्फ बिहार, बल्कि पूरे देश के युवाओं के लिए Inspiration बन चुकी हैं। उनका सफर आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाता है कि आत्मविश्वास और मेहनत के साथ हर सपना पूरा किया जा सकता है।

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