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क्या दुनिया बायोलॉजिकल वेपन के मुहाने पर खड़ी है?

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सुपर पावरों की गुप्त प्रयोगशालाएं, अमेरिकी फंडिंग और मानव अस्तित्व पर मंडराता नया खतरा

KKN ब्यूरो। कल्पना कीजिए कि तीसरा विश्व युद्ध टैंकों, मिसाइलों और परमाणु बमों से नहीं, बल्कि किसी अदृश्य वायरस से लड़ा जाए। ऐसा वायरस जिसे न आंखें देख सकें, न रडार पकड़ सके और न ही सीमाएं रोक सकें। एक ऐसा हथियार जो कुछ ही हफ्तों में पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य व्यवस्था और सामाजिक ढांचे को ध्वस्त कर दे। सवाल यह है कि क्या दुनिया वास्तव में ऐसे ही किसी बायोलॉजिकल युद्ध के मुहाने पर खड़ी है? कोविड-19 महामारी के बाद यह प्रश्न पहले से कहीं अधिक गंभीर हो चुका है। दुनिया भर के वैज्ञानिक, सुरक्षा विशेषज्ञ और नीति निर्माता लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी (Biotechnology), कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और जीन इंजीनियरिंग का दुरुपयोग भविष्य के सबसे खतरनाक हथियारों को जन्म दे सकता है।

आखिर क्या होता है बायोलॉजिकल वेपन?

बायोलॉजिकल वेपन वह हथियार होता है जिसमें वायरस, बैक्टीरिया, फंगस या उनके विषैले तत्वों (Toxins) का उपयोग करके दुश्मन की आबादी, सेना, कृषि या अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया जाता है। इनकी सबसे खतरनाक विशेषता यह है कि इन्हें पहचानना कठिन होता है। इनका असर सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। कम लागत में बड़े पैमाने पर तबाही मचाई जा सकती है और हमले के बाद जिम्मेदार देश या संगठन की पहचान करना बेहद मुश्किल होता है।

अमेरिका दुनिया भर में जैविक शोध को फंड करता है?

इस प्रश्न का उत्तर है — हां, लेकिन आधिकारिक रूप से रक्षा और स्वास्थ्य अनुसंधान के लिए। अमेरिका दशकों से दुनिया भर की प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक स्वास्थ्य परियोजनाओं में अरबों डॉलर निवेश करता रहा है। इन परियोजनाओं का घोषित उद्देश्य महामारी रोकथाम, वैक्सीन विकास और जैविक खतरों से रक्षा करना है। अमेरिका का विशाल Biodefense Program विभिन्न संस्थानों और प्रयोगशालाओं के माध्यम से संचालित होता है। हालांकि कुछ हथियार नियंत्रण विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि कुछ रक्षा-उन्मुख अनुसंधान और रोगजनकों (Pathogens) पर किए जा रहे प्रयोगों को बाहरी दुनिया “आक्रामक क्षमता” के रूप में भी देख सकती है। यही वह बिंदु है जहां विवाद शुरू होता है।

विवाद की जड़: “गेन ऑफ फंक्शन” रिसर्च

दुनिया में सबसे ज्यादा बहस जिस विषय पर होती है, वह है Gain of Function Research। इस प्रकार के अनुसंधान में वैज्ञानिक वायरस या बैक्टीरिया के गुणों का अध्ययन करते हैं। आलोचकों का तर्क है कि यदि सुरक्षा में चूक हो जाए या तकनीक गलत हाथों में चली जाए, तो अधिक संक्रामक या अधिक घातक रोगजनक पैदा हो सकते हैं। समर्थकों का कहना है कि ऐसे अध्ययन भविष्य की महामारियों को समझने और रोकने में मदद करते हैं। यानी वही तकनीक जो मानवता को बचा सकती है, वही तकनीक मानवता के लिए खतरा भी बन सकती है।

क्या केवल अमेरिका ही ऐसा कर रहा है?

नहीं…। वास्तविकता यह है कि अमेरिका, चीन, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और कई अन्य देश उच्च स्तरीय जैविक अनुसंधान सुविधाएं संचालित करते हैं। समस्या यह नहीं है कि अनुसंधान हो रहा है। समस्या यह है कि दुनिया के पास अभी भी ऐसा कोई मजबूत वैश्विक तंत्र नहीं है जो हर प्रयोगशाला और हर प्रयोग की प्रभावी निगरानी कर सके। विशेषज्ञों का कहना है कि जैविक हथियारों को सत्यापित करना परमाणु हथियारों की तुलना में कहीं अधिक कठिन है क्योंकि वही उपकरण और तकनीक वैक्सीन बनाने और हथियार बनाने दोनों में इस्तेमाल हो सकते हैं।

एआई ने खतरे को और बढ़ा दिया है?

कुछ हालिया शोधों ने चेतावनी दी है कि उन्नत AI मॉडल भविष्य में जैविक हथियार विकसित करने की प्रक्रिया को आसान बना सकते हैं। विशेषज्ञों का तर्क है कि AI तकनीकी जानकारी को व्यवस्थित करने, प्रयोगों की योजना बनाने और जटिल वैज्ञानिक प्रक्रियाओं को समझाने में सक्षम है। इसलिए यदि पर्याप्त सुरक्षा उपाय न हों तो यह जैव-सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां पैदा कर सकता है। हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी जैविक एजेंट को वास्तविक रूप से विकसित करना केवल जानकारी का नहीं, बल्कि प्रयोगशाला, संसाधन, विशेषज्ञता और सुरक्षा प्रणालियों का भी प्रश्न है।

क्या मानव अस्तित्व के लिए यह परमाणु बम से बड़ा खतरा है?

कई सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि दीर्घकालिक दृष्टि से बायोलॉजिकल खतरे परमाणु हथियारों जितने गंभीर हो सकते हैं। कारण स्पष्ट हैं। वायरस सीमाएं नहीं मानते। संक्रमण तेजी से फैल सकता है। वैश्विक व्यापार और यात्रा इसे और तेज बनाते हैं। हमले और प्राकृतिक महामारी के बीच अंतर करना कठिन हो सकता है। जीन इंजीनियरिंग नई चुनौतियां पैदा कर रही है। लेकिन यह कहना कि दुनिया आज निश्चित रूप से किसी जैविक प्रलय के मुहाने पर खड़ी है, एक अतिशयोक्ति होगी। अधिक सटीक निष्कर्ष यह है कि जो तकनीकें चिकित्सा और विज्ञान के लिए क्रांतिकारी अवसर लेकर आई हैं, वही तकनीकें दुरुपयोग होने पर अभूतपूर्व खतरा भी बन सकती हैं।

सबसे बड़ा खतरा कौन?

विशेषज्ञों के अनुसार खतरा केवल किसी एक देश से नहीं है। खतरा है- कमजोर जैव-सुरक्षा व्यवस्था से, गुप्त सैन्य अनुसंधान से, आतंकवादी संगठनों द्वारा दुरुपयोग से, अनियंत्रित AI और सिंथेटिक बायोलॉजी से और अंतरराष्ट्रीय पारदर्शिता की कमी से…।

अदृश्य युद्ध का युग?

20वीं सदी परमाणु हथियारों की सदी थी। 21वीं सदी जैविक और डिजिटल हथियारों की सदी बन सकती है। अमेरिका सहित कई देश जैविक अनुसंधान में भारी निवेश कर रहे हैं, लेकिन उपलब्ध सार्वजनिक प्रमाण यह नहीं दिखाते कि अमेरिका खुले तौर पर जैविक हथियार कार्यक्रमों को वित्तपोषित करता है। हां, उसके रक्षा और जैव-सुरक्षा कार्यक्रमों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस और संदेह अवश्य मौजूद हैं। दुनिया के सामने असली चुनौती किसी एक देश को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि विज्ञान मानवता की रक्षा का साधन बने, उसके विनाश का नहीं। क्योंकि यदि अगला वैश्विक युद्ध अदृश्य हुआ, तो शायद किसी देश की सीमा सुरक्षित नहीं रहेगी।

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