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क्या अमेरिका भारत का भरोसेमंद साझेदार है?

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दोस्त, साझेदार या सिर्फ अपने हितों का प्रहरी?

KKN ब्यूरो। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई स्थायी दोस्त नहीं होता, केवल स्थायी हित होते हैं। यह कथन जितना ब्रिटेन पर लागू होता है, उतना ही अमेरिका पर भी। आज भारत और अमेरिका रणनीतिक साझेदार हैं। दोनों QUAD में साथ हैं, रक्षा सहयोग बढ़ रहा है, तकनीकी और व्यापारिक संबंध मजबूत हो रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या अमेरिका वास्तव में भारत का भरोसेमंद साझेदार है? इतिहास के पन्ने पलटें तो तस्वीर इतनी सरल नहीं दिखती।

1971: जब अमेरिका पाकिस्तान के साथ खड़ा हो गया

भारत के दृष्टिकोण से अमेरिका पर अविश्वास की सबसे बड़ी वजह 1971 का बांग्लादेश युद्ध है। जब पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में लाखों लोगों पर अत्याचार हो रहे थे और भारत पर शरणार्थियों का भारी दबाव था, तब अमेरिका की निक्सन सरकार पाकिस्तान के सैन्य शासक याह्या खान के साथ खड़ी दिखाई दी। युद्ध के दौरान अमेरिका ने अपना सातवां बेड़ा (Seventh Fleet) बंगाल की खाड़ी की ओर भेजा था, जिसे भारत पर दबाव बनाने की कोशिश के रूप में देखा गया। भारत को उस समय सोवियत संघ के साथ हुई मित्रता संधि ने रणनीतिक सुरक्षा प्रदान की। भारत के रणनीतिक समुदाय में आज भी 1971 का प्रसंग अमेरिका की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न के रूप में याद किया जाता है।

1974 और 1998: परमाणु परीक्षण और अमेरिकी प्रतिबंध

भारत ने 1974 में पहला परमाणु परीक्षण किया। इसके बाद पश्चिमी देशों ने तकनीकी सहयोग सीमित कर दिया। फिर 1998 में पोखरण-II के बाद अमेरिका ने भारत पर आर्थिक और तकनीकी प्रतिबंध लगा दिए। अमेरिकी कानून के तहत भारत को दंडित किया गया, वित्तीय सहायता और तकनीकी निर्यात पर रोक लगाई गई। दिलचस्प बात यह है कि जिस भारत को 1998 में प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा, उसी भारत के साथ 2008 में अमेरिका ने असैन्य परमाणु समझौता किया। यह बदलाव एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है—क्या अमेरिका सिद्धांतों के आधार पर निर्णय लेता है या परिस्थितियों और हितों के आधार पर?

तकनीक और रक्षा क्षेत्र में भी अविश्वास की विरासत

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम और कई वैज्ञानिक संस्थानों को वर्षों तक अमेरिकी प्रतिबंधों और तकनीकी नियंत्रण का सामना करना पड़ा। ISRO से जुड़ी संस्थाओं पर भी प्रतिबंध लगाए गए थे, जिन्हें बाद में हटाया गया। भारत के कई वैज्ञानिक मानते हैं कि यदि अमेरिका ने तकनीकी प्रतिबंध न लगाए होते तो भारत का अंतरिक्ष और रक्षा कार्यक्रम और तेज़ी से आगे बढ़ सकता था।

केवल भारत ही नहीं: अमेरिका ने और किन सहयोगियों को निराश किया?

यदि कोई यह मानता है कि अमेरिका ने केवल भारत के साथ ऐसा व्यवहार किया है, तो इतिहास कुछ और कहता है।

दक्षिण वियतनाम: युद्ध के बाद पीछे हट गया अमेरिकावियतनाम युद्ध के दौरान अमेरिका ने दक्षिण वियतनाम का व्यापक समर्थन किया। लेकिन अमेरिकी वापसी के बाद दक्षिण वियतनाम कुछ ही वर्षों में ढह गया। कई विश्लेषक इसे अमेरिका द्वारा अपने सहयोगी को अधर में छोड़ देने का उदाहरण मानते हैं।

अफगानिस्तान: 20 साल बाद अचानक वापसी2021 में अमेरिका ने अफगानिस्तान से वापसी की। इसके बाद तालिबान ने तेजी से सत्ता पर कब्जा कर लिया। कई अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में यह स्वीकार किया गया कि वापसी अव्यवस्थित रही और हजारों स्थानीय सहयोगी असुरक्षित स्थिति में छोड़ दिए गए। अमेरिकी सहयोगी देशों ने भी इस प्रक्रिया पर असंतोष व्यक्त किया।

कुर्द लड़ाके: उपयोग के बाद उपेक्षा? सीरिया में ISIS के खिलाफ लड़ाई में कुर्द लड़ाकों ने अमेरिका का महत्वपूर्ण साथ दिया। लेकिन 2019 में अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद तुर्की की सैन्य कार्रवाई का सामना कुर्दों को अकेले करना पड़ा। कई शोध और विश्लेषण इसे अमेरिकी नीति की अविश्वसनीयता के उदाहरण के रूप में देखते हैं।

आखिर अमेरिका ऐसा क्यों करता है?

इसका उत्तर अमेरिकी विदेश नीति के मूल सिद्धांत में छिपा है। अमेरिका का पहला उद्देश्य अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है। यदि किसी सहयोगी का महत्व कम हो जाए, या परिस्थितियां बदल जाएं, तो अमेरिकी नीति भी बदल सकती है।

  • 1970 के दशक में पाकिस्तान चीन तक पहुंचने का माध्यम था।
  • 1990 के दशक में परमाणु अप्रसार अमेरिका की प्राथमिकता थी।
  • 2000 के बाद चीन के उभार ने भारत को अमेरिका के लिए रणनीतिक साझेदार बना दिया। यानी साझेदारी बनी रही, लेकिन कारण बदलते रहे।

क्या भारत को अमेरिका पर भरोसा करना चाहिए?

यह प्रश्न “हां” या “नहीं” में नहीं सिमटता। भारत के लिए अमेरिका आज: महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार है। तकनीकी सहयोगी है। चीन के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ रणनीतिक सहयोगी है। निवेश और व्यापार का बड़ा स्रोत है। लेकिन साथ ही भारत को यह भी समझना होगा कि अमेरिका की नीतियां अमेरिकी हितों से संचालित होती हैं, भारतीय हितों से नहीं।

भारत के लिए सबसे बड़ा सबक

भारत को अमेरिका-विरोध या अमेरिका-समर्थन की अतियों से बचना होगा। 1971, 1998 और तकनीकी प्रतिबंधों का इतिहास बताता है कि अमेरिका हमेशा भारत के पक्ष में नहीं खड़ा रहा। वहीं 2008 का परमाणु समझौता, QUAD और रक्षा सहयोग यह भी दिखाते हैं कि अमेरिका भारत के लिए अवसरों का बड़ा स्रोत है। इसलिए भारत के लिए सबसे सुरक्षित रास्ता वही है जिसे विदेश मंत्री एस. जयशंकर अक्सर “मल्टी-अलाइनमेंट” की नीति कहते हैं—अमेरिका से सहयोग, रूस से संबंध, यूरोप से व्यापार और वैश्विक दक्षिण के साथ नेतृत्व।

दोस्ती नहीं, हितों का खेल

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका न तो किसी का स्थायी मित्र है और न स्थायी शत्रु। यही बात भारत पर भी लागू होती है। इतिहास बताता है कि अमेरिका ने कई बार भारत के खिलाफ कदम उठाए, कई सहयोगियों को निराश किया और अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार नीतियां बदलीं। लेकिन यह भी सच है कि आज भारत-अमेरिका संबंध अपने सबसे संवेदनशील दौर में हैं। असल सवाल यह नहीं है कि “क्या अमेरिका भरोसेमंद है?” असल सवाल यह है कि क्या भारत इतना शक्तिशाली बन चुका है कि किसी भी देश की बदलती नीतियों से उसका राष्ट्रीय हित प्रभावित न हो? यही 21वीं सदी के भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक परीक्षा है।

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