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बिहार में RTI सिस्टम ध्वस्त! 30,000 अपीलें लंबित, हाई कोर्ट सख्त—क्या खत्म हो रही पारदर्शिता?

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KKN ब्यूरो। बिहार में पारदर्शिता की रीढ़ मानी जाने वाली सूचना का अधिकार (RTI) व्यवस्था अब गंभीर संकट में नजर आ रही है। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि Bihar State Information Commission के सामने 30,000 से अधिक दूसरी अपीलें और शिकायतें लंबित हैं। इसका सीधा असर आम नागरिकों के सूचना पाने के अधिकार पर पड़ रहा है, जो अब लगभग ठप होता दिख रहा है। यह चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ जब Patna High Court में दायर जनहित याचिका (CWJC 3089/2026) पर सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश Justice Sangam Kumar Sahoo और न्यायमूर्ति Justice Harish Kumar की खंडपीठ ने इस स्थिति को बेहद गंभीर बताते हुए अगली सुनवाई 18 जून 2026 तय की है।

आंकड़ों ने खोली सिस्टम की पोल

अदालत में पेश दस्तावेजों के मुताबिक, दिसंबर 2024 तक आयोग में 28,291 से अधिक मामले लंबित थे। यह आंकड़ा 28 अप्रैल 2025 को RTI कार्यकर्ता अमरेन्द्र कुमार को दी गई आधिकारिक जानकारी से सामने आया। अब यह संख्या 30 हजार के पार पहुंच चुकी है—जो बताती है कि हालात सुधरने के बजाय और बिगड़ते जा रहे हैं।

RTI एक्टिविस्ट का बड़ा खुलासा

मुजफ्फरपुर के RTI कार्यकर्ता अमरेन्द्र कुमार का कहना है कि मैंने खुद 100 से ज्यादा दूसरी अपीलें दायर की हैं, जिनमें कई गंभीर भ्रष्टाचार के मामले जुड़े हैं। लेकिन वर्षों से ये फाइलें आयोग में धूल खा रही हैं। अगर समय पर सुनवाई हो, तो कई बड़े घोटाले सामने आ सकते हैं। 2015 से सक्रिय अमरेन्द्र कुमार का दावा है कि RTI व्यवस्था की यह सुस्ती भ्रष्टाचार को खुली छूट दे रही है।

हाई कोर्ट में उठी बड़ी मांगें

याचिका में कई सख्त और सिस्टम बदलने वाले सुझाव दिए गए हैं— पहली अपील का निपटारा 45 दिनों में अनिवार्य हो, दूसरी अपील 90 दिनों के भीतर तय हो, लापरवाह अधिकारियों की ACR में नकारात्मक एंट्री हो, 100 दिनों से अधिक देरी पर ₹25,000 तक जुर्माना (RTI Act धारा 20(1)), जुर्माना अधिकारी के वेतन से वसूला जाए और प्रभावित नागरिकों को अंतरिम मुआवजा मिले। याचिका में यह भी कहा गया है कि सूचना में देरी को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 21 के उल्लंघन के रूप में माना जाए।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि इसी तरह का मामला Supreme Court of India में भी लंबित है। हाई कोर्ट ने बिहार सरकार को निर्देश दिया है कि वह सूचना आयुक्तों की संख्या बढ़ाने पर विचार करे।

संरचनात्मक कमी: बड़ी वजह

बिहार में मुख्य सूचना आयुक्त समेत कुल 4 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से एक अभी भी खाली है। ऐसे में 30,000 मामलों का बोझ उठाना किसी भी व्यवस्था के लिए असंभव जैसा है।

लोकतंत्र पर सीधा खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि RTI में यह देरी केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा हमला है। जब नागरिकों को समय पर सूचना नहीं मिलती, तो जवाबदेही खत्म होती है और भ्रष्टाचार को खुला मैदान मिल जाता है।

अब नजर 18 जून पर

हाई कोर्ट ने इस मामले को गंभीर मानते हुए अगली सुनवाई 18 जून 2026 तय की है। साथ ही राज्य सरकार से सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।

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