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सुप्रीम कोर्ट ने बिहार की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट पर नहीं लगाई रोक, आधार और वोटर ID को मान्यता देने का मौखिक निर्देश

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बिहार में 1 अगस्त 2025 को जारी होने वाली ड्राफ्ट वोटर लिस्ट पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने चुनाव आयोग को मौखिक रूप से निर्देश दिया है कि वह स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के दौरान आधार कार्ड और वोटर फोटो पहचान पत्र (EPIC) को वैध दस्तावेज के रूप में स्वीकार करे। साथ ही कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया केवल नाम हटाने की बजाय, सही मतदाताओं को सूची में जोड़ने पर केंद्रित होनी चाहिए। इस मुद्दे पर अब मंगलवार को औपचारिक बहस की तारीख तय की जाएगी।

दस्तावेजों की वैधता पर कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत की अगुआई में बेंच ने कहा कि दुनिया का कोई भी कागज़ जाली बनाया जा सकता है, चाहे वह आधिकारिक दस्तावेज ही क्यों न हो। यह टिप्पणी तब आई जब चुनाव आयोग ने पहले अदालत को बताया था कि आधार, EPIC और राशन कार्ड जैसे दस्तावेज पूरी तरह भरोसेमंद नहीं हैं क्योंकि उन्हें फर्जी बनाया जा सकता है। कोर्ट ने यह आपत्ति खारिज कर दी और कहा कि अगर इसी आधार पर दस्तावेजों को अस्वीकार करना है, तो किसी भी कागज़ की कोई अहमियत नहीं बचेगी।

इसके बाद अदालत ने आयोग से सीधा सवाल किया कि क्या वह आधार और वोटर आईडी को मान्यता देने के लिए तैयार है। जवाब में आयोग ने कहा कि वोटर आईडी कार्ड पहले से ही पंजीकरण फॉर्म पर छपा होता है और उसमें आधार नंबर भरना भी अनिवार्य है, इसलिए उसे इन दोनों दस्तावेजों से कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि, राशन कार्ड को लेकर उसने फिर से आपत्ति जताई और उसकी प्रमाणिकता पर सवाल उठाए।

राजनीतिक विरोध और SIR पर प्रदर्शन

SIR प्रक्रिया को लेकर बिहार सहित देश भर में राजनीतिक विरोध तेज हो गया है। सोमवार सुबह संसद परिसर में विपक्षी सांसदों ने इस प्रक्रिया को रोकने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन में प्रियंका गांधी भी शामिल हुईं। विपक्षी दलों का आरोप है कि चुनाव आयोग भाजपा के इशारे पर काम कर रहा है और मतदाता सूची से नाम हटाने की कोशिश कर रहा है। बिहार में महागठबंधन ने इस मुद्दे पर बंद भी आयोजित किया था, जिसमें राहुल गांधी की भी भागीदारी रही।

हालांकि, चुनाव आयोग ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है और कहा है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष ढंग से चल रही है। आयोग ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर दिए गए बयानों के खिलाफ लगातार खंडन जारी किया है।

SIR में अब तक क्या हुआ, आयोग ने क्या आंकड़े जारी किए

चुनाव आयोग ने रविवार को बताया कि बिहार में कुल 7.89 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में से 7.24 करोड़ लोगों ने गणना फॉर्म भरकर जमा किया है, जो कि 91.69 प्रतिशत की उच्च सहभागिता दर को दर्शाता है। इस प्रक्रिया में कई अहम आंकड़े सामने आए हैं।

करीब 22 लाख मृत मतदाताओं की पहचान हुई है, जो कुल मतदाताओं का लगभग 2.83 प्रतिशत है। इसके अलावा 36 लाख ऐसे मतदाता मिले हैं जो बिहार छोड़कर दूसरे राज्यों में बस चुके हैं, जो 4.59 प्रतिशत बनता है। लगभग 7 लाख मतदाता ऐसे पाए गए जो एक से अधिक मतदान केंद्रों पर दर्ज थे, जो कि 0.89 प्रतिशत का आंकड़ा है। आयोग का कहना है कि यह सारी जानकारी मतदाता सूची को अधिक सटीक और अद्यतन बनाने में मदद करेगी। आयोग ने इस अभियान को पूरी तरह सफल बताया है।

1 अगस्त के बाद क्या होगा?

1 अगस्त 2025 को जब ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी होगी, तो इसके बाद आपत्ति और दावे की प्रक्रिया शुरू होगी। जिन नागरिकों के नाम सूची में नहीं हैं या जिनके नाम में कोई त्रुटि है, वे निर्धारित फॉर्म भरकर सुधार या नाम जोड़ने की मांग कर सकेंगे। अंतिम सूची आपत्तियों के समाधान और सही सुधारों के बाद जारी की जाएगी।

कोर्ट द्वारा आधार और EPIC को मान्यता देने का निर्देश इस प्रक्रिया को अधिक विश्वसनीय बना सकता है। इससे मनमाने ढंग से नाम हटाने की संभावनाएं घटेंगी और नागरिकों को अपने नाम दर्ज कराने का सही मौका मिलेगा।

कानूनी विवाद और आगे की राह

इस मामले की कानूनी बहस दस्तावेजों की वैधता और मतदाता की पहचान को लेकर केंद्रित है। जबकि चुनाव आयोग अब भी यह कहता है कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं हो सकता, सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा टिप्पणी व्यावहारिक लचीलेपन का संकेत देती है। मंगलवार को जब औपचारिक बहस की तारीख तय होगी, तब सभी पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर मिलेगा।

फिलहाल, कोर्ट ने ड्राफ्ट लिस्ट पर रोक लगाने से इनकार कर चुनाव आयोग को खुली छूट दे दी है कि वह SIR प्रक्रिया को आगे बढ़ा सके। यह फैसला आयोग को कानूनी समर्थन प्रदान करता है और इससे उसकी प्रक्रिया को बल मिलता है।

सुप्रीम कोर्ट के रुख का व्यापक प्रभाव

सुप्रीम कोर्ट का यह रुख आने वाले चुनावों, खासकर बिहार में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों पर गहरा प्रभाव डाल सकता है। जिस तरह से अदालत ने दस्तावेजों की वैधता, मतदाता अधिकार और राजनीतिक निष्पक्षता के बीच संतुलन साधने की कोशिश की है, वह आगे चलकर देशभर में मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रियाओं के लिए एक अहम मिसाल बन सकता है।

आधार को नागरिकता का दस्तावेज मानने से इनकार करते हुए भी, अदालत ने इसे एक उपयोगी पहचान पत्र के रूप में स्वीकार करने की सहमति जताई है। यह रुख संविधानिक सीमाओं को बनाए रखते हुए प्रशासनिक कार्यों को सुचारू रूप से आगे बढ़ाने की दिशा में एक संतुलित कदम है।

बिहार की मतदाता सूची संशोधन को लेकर चल रहा यह पूरा घटनाक्रम भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं के सामने आने वाली चुनौतियों को उजागर करता है। जैसे-जैसे ड्राफ्ट लिस्ट जारी होगी और दावा-आपत्ति की प्रक्रिया शुरू होगी, यह देखा जाएगा कि आयोग और न्यायपालिका किस हद तक नागरिकों के मताधिकार की सुरक्षा सुनिश्चित कर पाते हैं।

अगली सुनवाई से यह भी स्पष्ट होगा कि दस्तावेजों की वैधता और मतदाता पहचान को लेकर भविष्य में कौन-से मानक स्थापित किए जाएंगे। तब तक देश की निगाहें 1 अगस्त पर टिकी रहेंगी, जब यह तय होगा कि लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची में बने रहते हैं या नहीं।

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