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बिहार में नमामी गंगे, फंसाना बना हकीकत

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संजय कुमार सिंह
पहलेजा घाट। बिहार के छपरा जिला अन्तर्गत आस्था का प्रतीक, पहलेजा घाट…। प्रधानमंत्री के नमानी गंगे प्रोजेक्ट की हकीकत को वयां करने के लिए प्रयाप्त है। दरअसल, मां गंगा के पावन स्थली पहलेजा घाट सदीयों से बिहार वासियों के लिए आस्था का केंद्र रही है।

यहां रोज हजारो लोग मां गंगा के निर्मल धारा में डुबकी लगाकर अपने को पुण्य के भागी समझते रहें हैं। किन्तु, पहलेजा घाट स्थित गंगा मां का तट, वर्तमान में गंदगी के अंबार को अपने में समेटे, पीएम की ड्रिम प्रोजेक्ट को मुंह चिढ़ा रही है। यहां सरकार की उदासीनता स्पष्ट झलक जाएगी। कुरे कचरे व गंदगियो से पटा परा गंगा का तट, यहां आने वाले वालों से मानो कह रही है कि मुझे इस गंदगी से बाहर निकालो। घाट पर कुछ लोग पूजा की सामग्रियों का दुकान खोल रखे हैं। वही लोग कुछ जगहों में घाट की सफाई कराते रहते हैं। दुकानदारों ने बताया कि एक समय यह घाट बालू माफियाओं के कब्जे में रहा करता था। घाट का नामो निशान तक नही है।
जैसे तैसे गंगा स्नान को आए श्रध्दालु स्नान कर पूजा अर्चना करके लौट जाते हैं। स्नान को आए श्रध्दालुओं ने कहा की जब एनडीए की नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनी तो गंगा की सफाई और सौंदर्यीकरण की आस जगी। नमामी गंगे के नाम से कई योजनाएं चलाई गई। सरकार इसके लिए विशेष मंत्रालय का गठन भी की और गंगा की साफ सफाई के लिए कई बड़े कदम भी उठाए गए। जिसका बड़ा उदाहरण वाराणसी काशी स्थित वहां के सैकड़ों घाटों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है। पहलेजा घाट बिहार में कितना प्रसिद्ध है, इसका आकलन सावन में कांवरियों की उमड़ी जन सैलाब को देखकर आंकी जा सकती है। बहरहाल, लोग अब राज्य और केन्द्र की सरकार से सवाल पूछने लगे है कि बिहार में नमामी गंगे कितना सफल हुआ?

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