छोटी दीवाली, जिसे नरक चतुर्दशी, रूप चौदस या काली चौदस के नाम से भी जाना जाता है, भारत में पांच दिन की भव्य दीपावली महापर्व की शुरुआत करती है। यह तिथि 19 अक्टूबर 2025 को पड़ रही है, और यह दिन आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दिन की पूजा और रीति-रिवाज शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि का कारण बनते हैं। यह पर्व अच्छाई की बुराई पर विजय की याद दिलाता है और अंधकार पर प्रकाश की जीत का प्रतीक है।
Article Contents
छोटी दीवाली के पीछे की पवित्र कथा
छोटी दीवाली मनाने की परंपरा प्राचीन हिंदू पुराणों से जुड़ी हुई है, खासकर भगवान श्री कृष्ण और राक्षस राजा नरकासुर के बीच के युद्ध से। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, नरकासुर एक शक्तिशाली राक्षस था जिसने स्वर्ग और पृथ्वी पर आतंक मचाया था। उसने 16,000 कन्याओं को बंदी बना लिया था और कई दिव्य खजाने लूटे थे, जिनमें भगवान वरुण का छाता, माता अदिति के कुंडल और मणि पर्वत जैसी चीजें शामिल थीं।
जब देवता, जिनमें भगवान इंद्र भी शामिल थे, नरकासुर को हराने में असमर्थ रहे, तो उन्होंने भगवान श्री कृष्ण से मदद मांगी। भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा (जो भूदेवी का अवतार थीं और नरकासुर की मां भी थीं) के साथ मिलकर राक्षस के साथ भयंकर युद्ध किया। नरकासुर को भगवान ब्रह्मा से एक वरदान प्राप्त था कि कोई पुरुष उसे मार नहीं सकता, केवल एक महिला ही उसकी मृत्यु का कारण बनेगी। युद्ध के दौरान जब भगवान कृष्ण थोड़े घायल हो गए, तब सत्यभामा ने आखिरी बाण से नरकासुर को मार डाला।
नरकासुर की मृत्यु के बाद उसने भगवान कृष्ण से माफी मांगी और कहा कि उसकी मृत्यु को घृणा से नहीं, बल्कि प्रकाश और खुशी के साथ मनाया जाए। भगवान कृष्ण ने उसकी इच्छा पूरी की, और यही कारण बना नरक चतुर्दशी को विजय के दिन के रूप में मनाने की। इस विजय के बाद भगवान कृष्ण ने उन 16,000 बंदी महिलाओं को मुक्त किया और समाज के अपमान से बचाने के लिए उनसे विवाह कर लिया। इसी दौरान भगवान कृष्ण ने राक्षस के खून से शुद्ध होने के लिए अभ्यंग स्नान किया, जो कि इस दिन की पूजा का मुख्य भाग बन गया।
आध्यात्मिक महत्व और प्रतीकात्मकता
नरक चतुर्दशी केवल एक मिथकीय विजय का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह जीवन से नकारात्मकता, गुस्से, अहंकार और अज्ञानता को दूर करने का पर्व भी है। यह दिन आत्मचिंतन और शुद्धता के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है, ताकि भक्त मुख्य दीवाली के दौरान दिव्य आशीर्वाद का स्वागत कर सकें।
इस दिन का एक और महत्व है भगवान यमराज की पूजा, जो मृत्यु के देवता माने जाते हैं, और अनियंत्रित मृत्यु से बचाव के लिए उनकी पूजा की जाती है। पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत में इस दिन को ‘भूत चतुर्दशी’ के रूप में मनाया जाता है, जहां परिवार अपने पूर्वजों की आत्माओं को सम्मान देने के लिए 14 दीप जलाते हैं और उनके मार्गदर्शन के लिए रोशनी का आयोजन करते हैं।
छोटी दीवाली 2025 के लिए शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, चतुर्दशी तिथि 19 अक्टूबर 2025 को दोपहर 1:51 बजे से शुरू होकर 20 अक्टूबर 2025 को 3:44 बजे तक समाप्त होगी। इस दिन पूजा के लिए विशेष मुहूर्त इस प्रकार हैं:
-
अभ्यंग स्नान मुहूर्त: 5:12 AM से 6:25 AM तक (20 अक्टूबर 2025)
-
ब्रह्म मुहूर्त: 4:44 AM से 5:34 AM तक
-
सांध्य पूजा मुहूर्त: 5:47 PM से 9:00 PM तक (19 अक्टूबर 2025)
पवित्र अभ्यंग स्नान विधि
नरक चतुर्दशी का सबसे महत्वपूर्ण संस्कार अभ्यंग स्नान है, जो ब्रह्म मुहूर्त के दौरान सूर्योदय से पहले किया जाता है। यह प्राचीन आयुर्वेदिक प्रथा है, जिसे पवित्र तेल स्नान के रूप में किया जाता है, और इसे सालभर की नकारात्मक ऊर्जा और पापों को धोने के लिए माना जाता है।
छोटी दीवाली पूजा विधि
सुबह की पूजा:
-
अभ्यंग स्नान के बाद ताजे और स्वच्छ कपड़े पहनें, खासकर पीले, लाल या संतरी रंग के कपड़े पहनें
-
घर को अच्छी तरह से साफ करें, विशेष रूप से दक्षिण दिशा को, जो यमराज से जुड़ी मानी जाती है
-
गंगा जल का छिड़काव करके घर को शुद्ध करें
पूजा सामग्री (समग्री):
-
तिल या सरसों तेल
-
मिट्टी के दीपक (दीया)
-
रुई की बत्तियाँ
-
ताजे फूल (विशेष रूप से लाल फूल भगवान कृष्ण के लिए)
-
अगरबत्तियाँ और कपूर
-
हल्दी पाउडर और कुमकुम
-
कच्चा चावल (अक्षत)
-
फल और मिठाइयाँ
-
सुपारी और पत्ते
-
कलश (पवित्र घड़ा)
-
लाल कपड़ा
-
पवित्र धागा (कलावा/मोली)
-
हवन सामग्री (यदि हवन कर रहे हैं)
सांध्य पूजा विधि:
-
पूजा स्थल को साफ करें और वहां रंगोली बनाएं
-
भगवान गणेश, देवी लक्ष्मी, भगवान कृष्ण, भगवान कुबेर और देवी सरस्वती की मूर्तियों या तस्वीरों को एक चांदी के बर्तन में रखें
-
गणेश पूजा से शुरुआत करें, फिर कृष्ण पूजा और लक्ष्मी पूजा करें
-
अगर संभव हो तो देवी काली और भगवान कुबेर की पूजा भी करें
यम दीप का आयोजन:
-
यमराज की पूजा के लिए विशेष दीपक जलाना, जिसे यम दीप कहा जाता है
-
इस दीपक को दक्षिण दिशा की ओर घर के मुख्य द्वार पर रखें
14 दीपकों की परंपरा:
छोटी दीवाली के दिन 14 दीपक जलाने की परंपरा है, जो हिंदू ब्रह्मांड के 14 लोकों का प्रतीक माने जाते हैं। ये दीपक घर के विभिन्न हिस्सों में जलाए जाते हैं, जिससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और नकारात्मकता का नाश होता है।
व्रत और विशेष मंत्र
-
शुद्धिकरण मंत्र: “ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्ववस्थां गतोऽपि वा | यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः”
-
यमराज के 14 नाम: “ॐ यमाय नमः | ॐ धर्मराजाय नमः | ॐ मृत्यवे नमः | …”
छोटी दीवाली के आध्यात्मिक लाभ
इस दिन की पूजा से कई आध्यात्मिक लाभ होते हैं, जैसे कि नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा, शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार, और भगवान लक्ष्मी के आशीर्वाद से वित्तीय समृद्धि।
छोटी दीवाली मुख्य दीवाली से पहले एक शुद्धिकरण का अवसर है, जो हमें यह याद दिलाती है कि हमें पहले अपनी आंतरिक अंधकार को दूर करना चाहिए, ताकि हम प्रकाश और समृद्धि का स्वागत कर सकें। यह पर्व न केवल पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करता है, बल्कि यह आध्यात्मिक शुद्धता और परिवार के साथ संबंधों को भी मजबूत करता है।
आपकी छोटी दीवाली इस बार शुभ हो और यह दीपों की रोशनी आपके जीवन से सभी अंधकार को दूर करे।



