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प्रधानमंत्री मोदी का मॉरीशस दौरा: बिहार विधानसभा चुनाव से पहले बिहारियों से जुड़ने की एक रणनीति

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KKN गुरुग्राम डेस्क | इस साल के अंत में बिहार में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया मॉरीशस दौरा कई तरह से चर्चा में है। पीएम मोदी ने अपने इस दौरे के दौरान भाषण की शुरुआत भोजपुरी में की, जिससे बिहार के राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई। उनके इस कदम को बिहार विधानसभा चुनाव से जोड़ा गया है, क्योंकि भोजपुरी भाषी समुदाय बिहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस दौरे के दौरान मॉरीशस में बसे बिहार के प्रवासी समुदाय से अपनी नजदीकी बढ़ाने का प्रयास किया और उनके बीच अपनी लोकप्रियता को और मजबूत किया।

मॉरीशस में पीएम मोदी की भोजपुरी में बात करना: बिहारियों से सीधा कनेक्शन

प्रधानमंत्री मोदी का भोजपुरी में भाषण देने का निर्णय राजनीतिक दृष्टिकोण से बहुत मायने रखता है। यह कदम खासतौर पर बिहार के चुनावी परिप्रेक्ष्य में अहम है, क्योंकि बिहार में बड़ी संख्या में लोग भोजपुरी बोलते हैं। जब मोदी ने अपनी बात भोजपुरी में शुरू की, तो यह साफ तौर पर बिहार के वोटरों के साथ उनके संबंधों को मजबूत करने की कोशिश थी। यह विशेष रूप से बिहार विधानसभा चुनाव के संदर्भ में देखा जा रहा है, क्योंकि इस राज्य में भोजपुरी भाषा का गहरा प्रभाव है।

मॉरीशस को अक्सर “मिनी बिहार” कहा जाता है, क्योंकि यहां की आबादी का एक बड़ा हिस्सा भारतीय मूल का है, खासकर बिहार से आए हुए लोग। 1834 में बिहार से बड़ी संख्या में लोग गिरमिटिया मजदूरों के रूप में मॉरीशस गए थे। आज, इन लोगों के वंशजों की संख्या यहां की कुल जनसंख्या का बड़ा हिस्सा है, और लगभग 50% लोग भोजपुरी बोलते हैं। पीएम मोदी ने इस समुदाय से जुड़ने के लिए मखाना भेंट किया, जो बिहार का प्रसिद्ध उत्पाद है और राज्य की पहचान में शामिल है।

मॉरीशस में बिहार की संस्कृति का उल्लेख

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण के दौरान बिहार की भाषा, संस्कृति और खानपान का भी उल्लेख किया। जब मोदी पोर्ट लुइस में पहुंचे, तो वहां की महिलाओं ने पारंपरिक भोजपुरी गीत गाकर उनका स्वागत किया। यह गीत “गवई” कहलाता है, जिसे आमतौर पर खुशियों के अवसरों पर गाया जाता है, जैसे शादी-ब्याह। यह गीत यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा भी है। इस गीत के बोल कुछ इस प्रकार थे: “राजा के सोभे ला माथे मौरिया, कृष्ण के सोभे ला हाथे बांसुरी।” यह गीत बिहार के सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाता है और मोदी के लिए एक बड़ा संकेत था कि वह अपनी जड़ों से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

मॉरीशस: बिहार के प्रवासी समुदाय का गढ़

मॉरीशस में 12 लाख की आबादी में से लगभग 70% लोग भारतीय मूल के हैं, और इनमें से 50% से ज्यादा लोग भोजपुरी बोलते हैं। यह संख्या बिहार के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इन लोगों के राजनीतिक रुझान बिहार के आगामी चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। बिहार में भोजपुरी भाषा 10 जिलों में बोली जाती है, जिनमें 73 विधानसभा सीटें आती हैं। इसलिए, प्रधानमंत्री मोदी का भोजपुरी में बात करना और बिहार की संस्कृति का उल्लेख करना, चुनावी दृष्टि से एक प्रभावी कदम है।

मखाना और मल्लाह समुदाय: एक और चुनावी जुड़ाव

मोदी ने मॉरीशस के प्रधानमंत्री को मखाना (जो बिहार का प्रमुख उत्पाद है) भेंट किया। इस कदम को बिहार विधानसभा चुनाव से भी जोड़ा जा रहा है। पिछले महीने, मोदी सरकार ने केंद्रीय बजट में मखाना बोर्ड बनाने का ऐलान किया था, जो मल्लाह समुदाय, यानी मछुआरों और नाविकों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से था। मखाना बिहार में एक महत्वपूर्ण फसल है और इसका व्यापार बिहार के मल्लाह समुदाय से जुड़ा हुआ है, जो राज्य में एक बड़ा वोट बैंक है। इस तरह की पहल मोदी सरकार की चुनावी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।

नालंदा विश्वविद्यालय का उल्लेख: बिहार के शिक्षा और संस्कृति को बढ़ावा

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण के दौरान नालंदा विश्वविद्यालय का भी उल्लेख किया। नालंदा विश्वविद्यालय बिहार की ऐतिहासिक धरोहर है और पिछले साल मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने राजगीर में इसके नए परिसर का उद्घाटन किया था। नालंदा विश्वविद्यालय का पुनर्निर्माण मोदी सरकार की प्रमुख योजनाओं में से एक है और इसे बिहार की सांस्कृतिक और शैक्षिक धरोहर के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह कदम बिहार के शैक्षिक विकास की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है और चुनावी दृष्टिकोण से यह मोदी सरकार की रणनीति का अहम हिस्सा है।

बिहार के प्रवासी भारतीयों से मोदी का जुड़ाव

प्रधानमंत्री मोदी का यह पहला प्रयास नहीं है जब उन्होंने बिहार के प्रवासी भारतीयों से जुड़ने की कोशिश की है। इससे पहले, उन्होंने गुयाना, फिजी, त्रिनिदाद, टोबैगो, सूरीनाम और सेशेल्स में बसे बिहार मूल के भारतीयों से संपर्क बढ़ाने की कोशिश की थी। जब मोदी पिछले साल गुयाना गए थे, तो उन्होंने वहां के राष्ट्रपति इरफान अली को मधुबनी पेंटिंग भेंट की थी, जो बिहार की कला का प्रतीक है। इसके अलावा, मोदी ने इंडियन अराइवल मॉन्यूमेंट भी देखा था, जो 1838 में भारतीय गिरमिटिया मजदूरों के पहले जहाज के गुयाना पहुंचने की याद में बनाया गया था।

प्रवासी भारतीय दिवस: मोदी की विदेश यात्रा का महत्व

इस साल की शुरुआत में, त्रिनिदाद और टोबैगो की राष्ट्रपति क्रिस्टीन कंगलू प्रवासी भारतीय दिवस की मुख्य अतिथि थीं। यह कार्यक्रम भारतीय सरकार द्वारा हर साल आयोजित किया जाता है, जिसका उद्देश्य दुनिया भर में फैले भारतीयों को सम्मानित करना है। मोदी के विदेश दौरे और प्रवासी भारतीयों से जुड़ने की यह प्रक्रिया, बिहार के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रवासी भारतीयों का बिहार से गहरा जुड़ाव है।

बिहार चुनाव से पहले मोदी की विदेश यात्राओं का राजनीतिक महत्व

प्रधानमंत्री मोदी की मॉरीशस, गुयाना और अन्य देशों की यात्राओं का राजनीतिक महत्व न केवल विदेश नीति के दृष्टिकोण से है, बल्कि यह बिहार के आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर भी उनकी रणनीति का हिस्सा है। इन यात्राओं के दौरान बिहार की सांस्कृतिक पहचान, भाषा, और परंपराओं को प्राथमिकता देने से यह साफ संकेत मिलता है कि मोदी बिहार के लोगों से अपनी गहरी सांस्कृतिक और सामाजिक जुड़ाव को दर्शाने के प्रयास में हैं। यह कदम उनकी पार्टी बीजेपी के लिए बिहार में राजनीतिक समर्थन जुटाने की दिशा में अहम हो सकता है।

प्रधानमंत्री मोदी का मॉरीशस दौरा और भोजपुरी में भाषण, उनके बिहार चुनाव के लिए रणनीतिक दृष्टिकोण का हिस्सा है। मखाना जैसे स्थानीय उत्पादों का प्रमोशन, बिहार के इतिहास और संस्कृति का संदर्भ, और प्रवासी भारतीयों के साथ जुड़ाव यह सब बिहार विधानसभा चुनावों को लेकर उनकी स्पष्ट योजना को दर्शाते हैं। इस बार बिहार में चुनावी मुकाबला काफी रोचक होने की संभावना है, और मोदी की इन रणनीतियों से यह साफ होता है कि वह राज्य के वोटरों से जुड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।

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