Home KKN Special पुल के अभाव में अभिशाप बन चुका है बूढ़ी गंडक

पुल के अभाव में अभिशाप बन चुका है बूढ़ी गंडक

सैकड़ों लोगों का घर नदी के इस पार है और जमीन उस पार

बिहार के मीनापुर प्रखंड अन्तर्गत चांदपरना पंचायत को बूढ़ी गंडक ने दो भागों में बांट कर लोगो के लिए दुश्वारियां पैदा कर दी है। नतीजा, दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने में भी यहां के लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। यह सिलसिला सदियों से चला आ रहा है। हाल यह है कि नदी पर एक अदद पुल नही होने से पंचायत वासी एक-दूसरे के सुख-दुख में भी शामिल नहीं हो पाते हैं।
कृषि कार्य में आय रोज आती है मुश्किलें
आलम ये है कि हरिशचन्द्र सहनी का घर नदी के पूर्वी किनारे पर छितरपट्टी गांव में है और उनकी जमीन नदी के पश्चिमी किनारे पर कोन्हमा गांव में है। अब कृषि कार्य के लिए उन्हें रोज नौका से नदी पार करना पड़ता है। हरिशचन्द्र अकेले नहीं है। बल्कि, जयनन्दन प्रसाद और साहेबजान अंसारी सहित करीब 40 ऐसे परिवार हैं, जिनका घर पूर्वी किनारे पर है और जमीन पश्चिमी किनारे पर। ऐसे में लोग आए दिन नौका से नदी पार करने का जोखिम उठा रहे हैं।
मुख्यालय से कटे होने का है पीड़ा
दूसरी ओर प्रखंड मुख्यालय से मात्र सात किलोमीटर की दूरी पर बसा कोन्हमा गांव के लोगों को अपने पंचायत मुख्यालय आने के लिए कांटी होते हुए करीब 40 किलोमीटर व रघई होते हुए करीब 25 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। कोन्हमा के महेश सहनी, अच्छेलाल सहनी और जयमंगल सहनी बतातें हैं कि मीनापुर अस्पताल करीब होने के बावजूद गांव के लोगों को स्वास्थ्य सुविधा के लिए कांटी जाना पड़ता है। मालूम हो कि कोन्हमा की आबादी करीब 800 है और बूढ़ी गंडक नदी पर एक अदद पुल नहीं होने से एक ही पंचायत में रहने वाले दोनों पार के लोग जरूरत पड़ने पर भी एक दूसरे के सुख दुख का हिस्सा नहीं बन पाते हैं।
नदी को पार करने का जोखिम
चांदपरना के राजनन्दन सहनी बताते हैं कि नदी को नौका से पार करना किसी जोखिम से कम नहीं है। एक तो यह कि नदी पार करने के एवज में प्रति खेप दस रुपये नौका वाले को देना पड़ता है और दूसरा यह कि छोटी नौका पर अधिक लोग के सवार हो जाने से नाव पलटने का भी खतरा बना रहता है। बताया कि पिछले साल ही नौका पलटने से कई लोग नदी में फंस गए थे। हालांकि, स्थानीय लोगों की सूझबूझ से सभी की जान बच गई थी। इसी प्रकार वर्ष 2009 में भी चांदपरना घाट पर नौका पलट गई थी। राजनंदन बताते हैं कि बाढ़ के तीन महीने यह खतरा और भी बढ़ जाता है। लिहाजा, यहां के लोग नदी पर पुल बनाने के लिए अब आंदोलन की राह पकड़ ली है।

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