Home KKN Special टू नेशन थ्योरी: विभाजन की वैचारिक नींव और उसका सच

टू नेशन थ्योरी: विभाजन की वैचारिक नींव और उसका सच

धर्म के आधार पर एक राष्ट्र की परिकल्पना से लेकर भारत के बंटवारे तक

KKN ब्यूरो। टू नेशन थ्योरी (Two-Nation Theory) भारत के विभाजन की वैचारिक नींव मानी जाती है। इसके अनुसार, भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले हिंदू और मुस्लिम दो अलग-अलग “कौमें” हैं, जिनकी धार्मिक मान्यताएं, सांस्कृतिक परंपराएं, और सामाजिक ढांचे इतने भिन्न हैं कि वे एक राष्ट्र के रूप में साथ नहीं रह सकते।
1947 में पाकिस्तान के निर्माण का औपचारिक आधार यही थ्योरी बनी। लेकिन इस विचार की शुरुआत और इसके पीछे की राजनीति का सच कहीं अधिक जटिल है।

सबसे पहले किसने रखी थी टू नेशन थ्योरी?

अक्सर यह समझा जाता है कि टू नेशन थ्योरी के जनक मोहम्मद अली जिन्ना थे, लेकिन ऐतिहासिक रूप से यह विचार सबसे पहले सर सैयद अहमद खान ने 19वीं सदी में रखा था।

सर सैयद अहमद खान और शुरुआती विचार

  • 1883 के अलीगढ़ में एक भाषण में उन्होंने कहा कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र हैं, जिनका मिलन सिर्फ कुछ मामलों में हो सकता है, लेकिन एक राजनीतिक ढांचे में रहना मुश्किल है।
  • उनका तर्क था कि दोनों के धर्म, भाषा, भोजन, रीति-रिवाज, इतिहास और नायक अलग हैं।
  • उन्होंने हिंदुओं की बहुसंख्यक राजनीति से मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए खतरे की चेतावनी दी।

मुस्लिम लीग और राजनीति का रंग

  • 1906 में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग का गठन हुआ।
  • मुस्लिम लीग ने धीरे-धीरे इस विचार को राजनीतिक एजेंडा बना लिया, ताकि मुस्लिम समुदाय के लिए अलग प्रतिनिधित्व और बाद में अलग राष्ट्र की मांग को वैध ठहराया जा सके।

मोहम्मद इक़बाल का योगदान

  • 1930 में इलाहाबाद अधिवेशन में अल्लामा इक़बाल ने मुसलमानों के लिए उत्तर-पश्चिम भारत में एक अलग राज्य का विचार रखा।
  • उन्होंने कहा कि “मुसलमान एक अलग राष्ट्र हैं और उन्हें अपना राजनीतिक ढांचा मिलना चाहिए।”

मोहम्मद अली जिन्ना और औपचारिक घोषणा

  • 1940 में लाहौर प्रस्ताव (जिसे बाद में पाकिस्तान रिज़ोल्यूशन कहा गया) के तहत मुस्लिम लीग ने पहली बार आधिकारिक तौर पर कहा कि मुसलमानों के लिए अलग देश बनाया जाए।
  • जिन्ना ने कहा:

“हिंदू और मुसलमान दो अलग सभ्यताएं हैं। इनका एक ही राज्य में रहना न तो न्यायसंगत है और न ही संभव।”

ऐतिहासिक सह-अस्तित्व की अनदेखी

  • इस थ्योरी ने यह नजरअंदाज किया कि हिंदू और मुसलमान सदियों से भारत में साथ रहते आए थे, सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ, साझा भाषा और परंपराएं बनीं।
  • मुग़ल दरबार से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन तक, दोनों समुदायों ने कई बार कंधे से कंधा मिलाकर काम किया।

औपनिवेशिक राजनीति की भूमिका

  • अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो” नीति ने इस विचार को हवा दी।
  • 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधार के तहत मुसलमानों को अलग निर्वाचन क्षेत्र दिए गए, जिससे राजनीतिक विभाजन गहराया।

स्वतंत्रता संग्राम और विरोध

  • महात्मा गांधी, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे नेता टू नेशन थ्योरी के प्रबल विरोधी थे।
  • उनका मानना था कि यह सिद्धांत भारत की साझा विरासत और गंगा-जमुनी तहज़ीब के खिलाफ है।
  • 1947 में पाकिस्तान का निर्माण हुआ, लेकिन टू नेशन थ्योरी की वास्तविकता जल्द ही चुनौती में पड़ गई।
  • पाकिस्तान बनने के 24 साल बाद, 1971 में बांग्लादेश के निर्माण ने दिखा दिया कि केवल धर्म राष्ट्र की एकता का आधार नहीं हो सकता।
  • बांग्लादेश का अलग होना इस थ्योरी के व्यावहारिक विफलता का प्रमाण माना गया।

विभाजन की त्रासदी का रास्ता खुला

टू नेशन थ्योरी एक ऐसा विचार था जिसने भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की दिशा बदल दी। यह सिद्धांत एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल हुआ, जिसने साम्प्रदायिक खाई को गहरा किया और अंततः विभाजन की त्रासदी का रास्ता खोला।
आज, इतिहासकार मानते हैं कि अगर औपनिवेशिक नीतियों, सांप्रदायिक राजनीति और नेताओं की कट्टर बयानबाजी को रोका जाता, तो शायद यह थ्योरी कभी जमीन पर न उतरती।

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कौशलेन्द्र झा, KKN Live की संपादकीय टीम का नेतृत्व करते हैं और हिन्दुस्तान (हिन्दी दैनिक) में नियमित रूप से लेखन करते हैं। बिहार विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों से अधिक का अनुभव अर्जित किया है। वे प्रातःकमल और ईटीवी बिहार-झारखंड सहित कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। सामाजिक सरोकारों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है—वे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संघ (भारत) के बिहार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और “मानवाधिकार मीडिया रत्न” सम्मान से सम्मानित किए गए हैं। पत्रकारिता में उनकी गहरी समझ और सामाजिक अनुभव उनकी विश्लेषणात्मक लेखन शैली को विशिष्ट बनाते हैं

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