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डायबिटीज लाइलाज है या इलाज का तरीका पुराना पड़ चुका है?

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भारत में 101 मिलियन लोगों को डायबिटीज, 136 मिलियन प्री-डायबिटीज की जद में; दुनिया की नई रिसर्च कहती है कि कुछ टाइप-2 मरीजों में बीमारी ‘रिमिशन’ में जा सकती है, मगर इसे चमत्कारी इलाज समझना सबसे बड़ी भूल होगी

KKN ब्यूरो। भारत में डायबिटीज अब सिर्फ अमीरों की बीमारी नहीं रही। यह शहर से गांव, बुजुर्ग से युवा और संपन्न तबके से निम्न आय वर्ग तक फैल चुकी है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि इतने लोग डायबिटीज की गिरफ्त में क्यों आ रहे हैं? बड़ा सवाल यह है कि जब दुनिया में वैज्ञानिक शोध यह साबित कर चुका है कि कुछ टाइप-2 डायबिटीज मरीजों में रक्त शर्करा लंबे समय तक सामान्य स्तर पर लौट सकती है, तो भारत में इस संभावना पर इलाज की मुख्यधारा में उतनी गंभीरता से बात क्यों नहीं होती? लेकिन यहां एक बेहद जरूरी फर्क समझना होगा। डायबिटीज का ‘पूरी तरह इलाज’ और ‘रिमिशन’ एक ही बात नहीं है। इस फर्क को समझे बिना इस बीमारी की पूरी कहानी समझना संभव नहीं।

भारत में डायबिटीज का आंकड़ा डराने वाला क्यों है?

2023 में प्रकाशित आईसीएमआर-इंडियाब अध्ययन ने भारत की डायबिटीज तस्वीर को नए सिरे से सामने रखा। 31 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 113,000 से अधिक लोगों के अध्ययन के आधार पर अनुमान लगाया गया कि भारत में लगभग 101 मिलियन लोग डायबिटीज से प्रभावित हैं, जबकि करीब 136 मिलियन लोग प्री-डायबिटीज की अवस्था में हैं। डायबिटीज की अनुमानित व्यापकता 11.4% थी। यानी बीमारी सिर्फ उन 101 मिलियन लोगों तक सीमित नहीं है। 136 मिलियन लोगों का एक विशाल समूह उस मोड़ पर खड़ा है, जहां जीवनशैली और समय रहते हस्तक्षेप से बीमारी को टाला जा सकता है। आईसीएमआर के अध्ययन में मोटापा, पेट के आसपास जमा चर्बी और दूसरे चयापचय संबंधी जोखिमों का भी बड़ा बोझ सामने आया। 2021 के अनुमान में लगभग 254 मिलियन लोगों में सामान्य मोटापा और 351 मिलियन में पेट के आसपास मोटापा पाया गया। यहीं से बीमारी की पहली बड़ी कड़ी जुड़ती है। डायबिटीज का सबसे बड़ा कारण सिर्फ चीनी खाना नहीं है। इसके पीछे शरीर में अतिरिक्त वसा, इंसुलिन प्रतिरोध, शारीरिक निष्क्रियता, अस्वास्थ्यकर भोजन, आनुवंशिक प्रवृत्ति और बढ़ती उम्र समेत कई कारक काम करते हैं। अमेरिकी डायबिटीज संघ के अनुसार टाइप-2 डायबिटीज में अतिरिक्त वजन और मोटापा इंसुलिन प्रतिरोध के महत्वपूर्ण कारण हैं, हालांकि बिना मोटापे के दिखने वाले व्यक्ति में भी पेट और शरीर के भीतर जमा अतिरिक्त वसा चयापचय जोखिम बढ़ा सकती है।

क्या डायबिटीज सचमुच ठीक हो सकती है?

विज्ञान ने पिछले कुछ वर्षों में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखा है। पहले टाइप-2 डायबिटीज को लगभग अनिवार्य रूप से जीवनभर चलने वाली बीमारी मानकर उपचार किया जाता था। आज वैज्ञानिक समुदाय अधिक सूक्ष्म तस्वीर देखता है। अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने ‘रिमिशन’ शब्द को स्वीकार किया है। इसका अर्थ है—एचबीए1सी यानी तीन महीने की औसत रक्त शर्करा का स्तर 6.5% से नीचे आ जाए और कम-से-कम 3 महीने तक ग्लूकोज घटाने वाली दवाओं के बिना उसी सीमा में बना रहे।  लेकिन इसे ‘इलाज’ या ‘क्योर’ नहीं कहा जाता। क्यों? क्योंकि अगर व्यक्ति फिर से पर्याप्त वजन बढ़ा ले, तो रक्त शर्करा दोबारा डायबिटीज की सीमा में जा सकती है। अमेरिकी राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान का शोध-संबंधी मंच भी स्पष्ट करता है कि टाइप-2 डायबिटीज में वजन वापस बढ़ने के साथ बीमारी लौट सकती है; इसलिए विशेषज्ञ ‘रिमिशन’ शब्द को अधिक उपयुक्त मानते हैं। अर्थात— डायबिटीज कुछ लोगों में पीछे हट सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि शरीर हमेशा के लिए बीमारी से मुक्त हो गया।

दुनिया में इसका प्रमाण क्या है?

सबसे चर्चित उदाहरण ब्रिटेन का डायरेक्ट अध्ययन है। इसमें अपेक्षाकृत शुरुआती टाइप-2 डायबिटीज वाले लोगों को चिकित्सकीय निगरानी में बहुत कम कैलोरी वाला आहार देकर वजन कम कराया गया और फिर भोजन को नियंत्रित ढंग से वापस सामान्य किया गया। परिणाम ने चिकित्सा जगत का ध्यान खींचा। जिन लोगों ने पर्याप्त और स्थायी वजन कम किया, उनमें डायबिटीज रिमिशन की संभावना काफी अधिक थी। बाद के विश्लेषण में पाया गया कि जिन प्रतिभागियों ने कम-से-कम 10 किलोग्राम वजन घटाया और उसे बनाए रखा, उनमें रिमिशन की दर काफी ऊंची रही। नए वैज्ञानिक निष्कर्ष भी इसी दिशा में बढ़ रहे हैं। 2025 के अमेरिकी डायबिटीज संघ के मानकों में कहा गया है कि 10% से अधिक स्थायी वजन घटाने से टाइप-2 डायबिटीज में बीमारी की दिशा बदलने और रिमिशन की संभावना बढ़ सकती है। मेटाबॉलिक सर्जरी से भी कई मरीजों में रिमिशन हासिल किया जा सकता है। यह कोई सोशल मीडिया का दावा नहीं है। इसके पीछे क्लीनिकल रिसर्च है।

भारत में डायबिटीज ‘लाइलाज’ क्यों है?

भारत में टाइप-2 डायबिटीज को लाइलाज इसलिए नहीं कहा जाना चाहिए कि किसी मरीज में रिमिशन संभव नहीं है। समस्या यह है कि हर मरीज रिमिशन के लिए उपयुक्त नहीं होता। बीमारी कितने वर्षों से है? अग्न्याशय की इंसुलिन बनाने की क्षमता कितनी बची है? मरीज का वजन कितना है? वह कितना वजन सुरक्षित तरीके से कम कर सकता है? क्या वह जीवनशैली में स्थायी बदलाव कर सकता है? क्या उसे पहले से इंसुलिन की जरूरत पड़ रही है? इन सवालों के जवाब रिमिशन की संभावना बदल देते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार कम अवधि की टाइप-2 डायबिटीज और पर्याप्त वजन घटाना रिमिशन की संभावना बढ़ाने वाले प्रमुख कारक हैं। लंबे समय से चली आ रही बीमारी में अग्न्याशय की बीटा कोशिकाओं की कार्यक्षमता अधिक प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि किसी 3 साल पुराने डायबिटीज मरीज और 20 साल से डायबिटीज झेल रहे मरीज को एक ही तराजू पर रखकर रिमिशन का दावा करना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा।

बीमारी से पहले की अवस्था को गंभीरता से न लेना

136 मिलियन प्री-डायबिटीज वाले देश के लिए सबसे बड़ा अवसर शायद इलाज नहीं, रोकथाम है। प्री-डायबिटीज वह अवस्था है जहां रक्त शर्करा सामान्य से अधिक है, लेकिन डायबिटीज की सीमा तक नहीं पहुंची। यही वह खिड़की है जिसमें वजन नियंत्रण, भोजन में सुधार और नियमित शारीरिक गतिविधि बीमारी को टाल सकती है। अमेरिकी डायबिटीज संघ के दिशानिर्देशों में भी वजन घटाने और शारीरिक सक्रियता को टाइप-2 डायबिटीज की रोकथाम और उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। लेकिन भारत की जीवनशैली तेजी से बदल रही है। चलना कम। बैठना ज्यादा। पैकेटबंद और अति-प्रसंस्कृत भोजन की उपलब्धता ज्यादा। काम का तनाव ज्यादा। नींद और दिनचर्या में अव्यवस्था और इसके साथ पेट के आसपास जमा चर्बी। यह संयोजन डायबिटीज के लिए उपजाऊ जमीन तैयार करता है।

क्या सिर्फ वजन कम करने से डायबिटीज चली जाएगी?

वजन कम करना हर मरीज के लिए समान परिणाम नहीं देता। कुछ मरीजों में रिमिशन संभव हो सकता है, कुछ में दवाओं की जरूरत कम हो सकती है और कुछ में बीमारी नियंत्रण में आ सकती है लेकिन दवाएं जारी रखनी पड़ सकती हैं। 2025 के अमेरिकी डायबिटीज संघ के मानकों में भी वजन प्रबंधन को व्यक्ति की चिकित्सा स्थिति, जीवन परिस्थितियों और जरूरत के अनुसार तय करने की बात कही गई है। बहुत कम कैलोरी वाला आहार या दवा अचानक बंद करना स्वयं जोखिमपूर्ण हो सकता है। इसलिए डायबिटीज रिमिशन कोई घरेलू नुस्खा नहीं, चिकित्सकीय निगरानी में किया जाने वाला उपचार लक्ष्य है।

टाइप-1 डायबिटीज का क्या?

टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज एक जैसी बीमारी नहीं हैं। टाइप-1 में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली इंसुलिन बनाने वाली बीटा कोशिकाओं को नष्ट कर देती है। अमेरिकी राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान के अनुसार टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित व्यक्ति को जीवनभर यह बीमारी रहती है; वर्तमान में इसे ठीक करने वाला सामान्य उपचार उपलब्ध नहीं है। अग्न्याशय या आइलेट प्रत्यारोपण कुछ लोगों में इंसुलिन उत्पादन बहाल कर सकता है, लेकिन उसे भी पूर्ण इलाज नहीं माना जाता। इसलिए जब कोई कहता है— “डायबिटीज पूरी तरह ठीक हो जाती है” तो सवाल होना चाहिए— कौन-सी डायबिटीज? किस मरीज में? किस उपचार से? कितने समय के लिए?

भारत को अब ‘शुगर कंट्रोल’ से आगे जाना होगा

भारत में डायबिटीज के इलाज की बहस लंबे समय तक रक्त शर्करा को नियंत्रित करने और दवा बढ़ाने के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन विज्ञान का नया संदेश कुछ अलग है। बीमारी को सिर्फ नियंत्रित मत कीजिए—जहां संभव हो, उसकी जड़ पर प्रहार कीजिए। वजन। पेट की चर्बी। शारीरिक निष्क्रियता। भोजन। नींद। तनाव और सबसे महत्वपूर्ण—बीमारी की शुरुआत के शुरुआती वर्षों में हस्तक्षेप। अमेरिकी डायबिटीज संघ के 2025 मानकों में भी 10% से अधिक स्थायी वजन घटाने को कई मरीजों में रिमिशन की संभावना बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण लक्ष्य माना गया है। नए शोध में दक्षिण एशियाई लोगों में भी वजन घटाने के बाद टाइप-2 डायबिटीज रिमिशन के प्रमाण सामने आए हैं। इसका मतलब यह नहीं कि भारत डायबिटीज को कल से खत्म कर देगा। लेकिन इसका अर्थ इतना जरूर है कि— “डायबिटीज हो गई, अब जिंदगी भर बस दवा खानी है”—यह सोच अब अधूरी साबित होने वाली है।

असली लड़ाई शुगर से नहीं, उस व्यवस्था से है जो बीमारी पैदा करती है

भारत के सामने 101 मिलियन डायबिटीज मरीज और 136 मिलियन प्री-डायबिटीज लोगों का अनुमान है। यह सिर्फ स्वास्थ्य विभाग का आंकड़ा नहीं। यह आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य का आईना है। दुनिया की चिकित्सा विज्ञान ने यह साबित कर दिया है कि चुने हुए टाइप-2 डायबिटीज मरीजों में रिमिशन संभव है। लेकिन यह भी उतनी ही मजबूती से साबित है कि रिमिशन कोई स्थायी इलाज की गारंटी नहीं और हर मरीज में संभव नहीं। इसलिए भारत को दो मोर्चों पर एक साथ लड़ना होगा। पहला—जिन्हें डायबिटीज हो चुकी है, उन्हें आधुनिक, व्यक्ति-केंद्रित और प्रमाण-आधारित उपचार मिले। दूसरा—उन 136 मिलियन लोगों को डायबिटीज की तरफ बढ़ने से रोकने की राष्ट्रीय रणनीति बने जो अभी प्री-डायबिटीज की अवस्था में हैं। क्योंकि भविष्य की सबसे बड़ी सफलता यह नहीं होगी कि कितने लोगों की शुगर दवा से नियंत्रित हुई। सफलता तब होगी, जब लाखों लोग डायबिटीज की दहलीज तक पहुंचने से पहले ही वापस लौट जाएं।

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