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रैयतों के पक्ष में थे कई अंग्रेज अधिकारी 

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राजकिशोर प्रसाद
बंगाल के बाद बिहार चंपारण में भी रैयतों ने नील विद्रोह शुरू कर दिया। इस बढ़ते विद्रोह के पक्ष में कई अंग्रेज अधिकारी थे। 1857 की क्रांति को दबाने से अंग्रेजो के मंसूबे और बुलन्द हुये और औपनिवेशिक सत्ता की जड़े और मजबूत करने की मंशा बना ली। देहाती भारतीय रैयतों पर जबरन नील की खेती का दबाव जबरदस्त तरीके से बढ़ाना शुरू किया। रैयतों पर गोरो का जुल्म सितम पर था। उस वक्त कुछ अंग्रेज अधिकारी रैयतों के पक्ष में अपनी आवाज उठायी। इसमें बंगाल के जेसोर व नादिया के तत्कालीन मजिस्ट्रेट मिस्टर टावर ने इसका विरोध करते हुये कहा था कि एक भी नील का पट्टा बिना हिंदुस्तानियो के खून से रंगा विलायत नही पहुंचती। इसपर अंगेजी सरकार बौखला कर जांच कमिटि गठित कर दी। जब एम टावर को कमीशन के समक्ष पेश किया गया तो टावर ने बेबाक कहा कि मेरे जैसे कितने मजिस्ट्रेट यहां आये और निरीह भोले भाले पर कोठीवालो ने जुल्म ढ़ाहे उनके शरीर को भाले से आरपार छेद दिया। बहुत को गायब कर दिया। इस तरह की रक्तपात से होनिवाली नील की खेती का मैं विरोधी हूँ। इस पर कमीशन ने उन्हें पद से हटाकर जेल में डाल दिया। इसी तरह  रिचर्ड टेंपल ने भी रैयत के मित्र थे। जब चंपारण पर जाँच कमिटि बनाने की बात आई तो टेंपल ने इसे ख़ारिज करते हुये कहा कि इससे राज व्यवस्था चोटिल हो जायेगी और असहजता बढेगी। इसी तरह जेपी ग्रैंड ने भी रैयतों को अपनी पसन्द की खेती करने और दबाव पर जबरन नील की खेती करने का विरोध किया। लॉरेंस ने भी अपनी सलाह दी की निलहो को रैयतों के साथ मिलकर चलना चाहिये। 1857 के चंपारण में हुये नील विद्रोह का समर्थन कुछ अंग्रेज अधिकारी किये थे। 1908 में विद्रोह के जाँच अधिकारी डब्लू आर गोर्ले ने अपनी जाँच प्रतिवेदन रैयतों के पक्ष में दी। गांधीजी के चंपारण यात्रा के बाद चंपारण के सर्वे सेटलमेंट अधिकारी स्वीनी ने पहली बार  रैयतों को निडर होकर अपनी बात रखने का प्रशिक्षण दिया। साथ ही एफएल सलाई की अध्यक्षता में गठित जाँच कमिटि अपनी निष्पक्षता दिखाई। इसमें तत्कालीन गवर्नर एडवर्ड ने अपनी अहम भूमिका निभाई। इस पर महात्मा गांधीजी ने खासकर गवर्नर एडवर्ड को धन्यवाद दिया। इतना ही नही रैयतों पर हो रहे जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने वाले सभी गोरे अधिकारियो को गांधीजी ने साभार व्यक्त किया। अब वक्त है जब हम चंपारण शताब्दी वर्ष मना रहे है। उनमें गांधीजी के साथ और भी कई है, जिन्हें याद किये जाने की जारुरत है।

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