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प्रधानमंत्री मोदी के बयान से फिर सुर्खियों में आया 2001 मुजफ्फरपुर का गोलू अपहरण कांड, पिता के जख्म फिर ताजे

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 चौबीस साल बाद भी रतन सिंह के दिल से वह दर्द नहीं गया, जो उनके पांच साल के बेटे गोलू की मौत ने छोड़ा था। “काश मैं पुलिस के पास नहीं गया होता,” वे धीमी आवाज़ में कहते हैं। “शायद मेरा बेटा आज ज़िंदा होता। उसका शरीर पांच टुकड़ों में मिला था। आज भी वह दृश्य याद कर के दिल कांप उठता है।”

साल 2001 में हुए इस दर्दनाक गोलू अपहरण और हत्या कांड ने पूरे बिहार को झकझोर दिया था। यह मामला उस दौर की बदहाल कानून व्यवस्था का प्रतीक बन गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब हाल ही में मुजफ्फरपुर रैली में इस घटना का ज़िक्र किया और राजद सरकार पर हमला बोला, तो इस परिवार के पुराने घाव फिर हरे हो गए।

वह दिन जिसने सब कुछ बदल दिया

20 सितंबर 2001 की सुबह मुजफ्फरपुर में हर दिन की तरह शुरू हुई थी। पंजाब नेशनल बैंक में क्लर्क के पद पर कार्यरत रतन सिंह ने अपने तीन बच्चों — गोलू और उसकी दो बहनों — को रोज़ की तरह रिक्शे से स्कूल भेजा।

रिक्शा जैसे ही जेल रोड पहुंचा, एक सफेद मारुति वैन अचानक रुकी। कुछ हथियारबंद लोग बाहर निकले, गोलू को जबरन उठाया और गाड़ी तेज़ी से लेकर भाग निकले। रिक्शा चालक और दोनों बच्चियों के चीखने की आवाज़ें गूंजती रह गईं।

रतन सिंह और उनकी पत्नी प्रमिला ने तुरंत मिथनपुरा थाना पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई। लेकिन पुलिस की कार्रवाई बेहद सुस्त रही। फिरौती के फोन आने के बावजूद जांच में कोई प्रगति नहीं हुई। परिवार निराशा में डूबा इंतज़ार करता रहा।

पांच दिन बाद मिली दर्दनाक खबर

25 सितंबर को गोलू का शव मधोपुर चौर क्षेत्र में क्षत-विक्षत अवस्था में मिला। उसका चेहरा पहचान में नहीं आ रहा था। “मैंने कपड़ों और कंगन से उसे पहचाना,” रतन सिंह याद करते हैं। “बस हड्डियां बची थीं। मेरा बच्चा चला गया था।”

इस घटना ने पूरे शहर को हिला दिया। अगले दिन यानी 26 सितंबर को मुजफ्फरपुर की सड़कों पर जनता का गुस्सा फूट पड़ा। यह कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि आम लोगों का दर्द था। हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। थानों और सरकारी इमारतों में आग लगा दी गई। पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए गोलियां चलाईं।

इस हिंसा में ग्यारह लोगों की मौत हुई, जिनमें एक दस वर्षीय बच्चा भी शामिल था। दो दिनों तक शहर में कर्फ्यू लगा रहा। हालात तब काबू में आए जब सरकार ने तत्कालीन एसपी नय्यर हसनैन खान की जगह आईपीएस अधिकारी रवींद्र कुमार सिंह को एयरलिफ्ट कर भेजा।

न्याय मिला, लेकिन बहुत देर से

इस मामले में आठ आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। लंबी सुनवाई के बाद 2009 में चार दोषियों — राम शोभित पासवान, सुनील कुमार उर्फ बाबलू, विनोद राय और उदय साह — को उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई।

लेकिन रतन सिंह के लिए यह सज़ा कोई राहत नहीं लाई। “कौन सा न्याय?” वे पूछते हैं। “कोई भी मेरे बेटे को वापस नहीं ला सकता।”

भय और कानूनहीनता का दौर

गोलू की हत्या ने उस दौर के बिहार की सच्चाई उजागर कर दी। 2001 से 2004 के बीच राज्य में 1,500 से अधिक अपहरण के मामले दर्ज हुए। 2004 में ही 400 से ज्यादा घटनाएं हुईं। डॉक्टर, व्यापारी, छात्र — कोई भी सुरक्षित नहीं था।

पत्रकार विभेश त्रिवेदी बताते हैं, “पुलिस की छापेमारी की जानकारी अपराधियों को पहले ही मिल जाती थी। जब तक पुलिस पहुंचती, आरोपी गायब हो जाते थे। यह उस समय की हकीकत थी।”

घर की दीवारों में कैद यादें

आज रतन सिंह के नए घर के सामने उनका पुराना घर खड़ा है — बंद और वीरान। “वहीं रहते थे जब गोलू हमारे साथ था,” वे कहते हैं। “हर दीवार उसकी याद दिलाती थी, इसलिए छोड़ दिया।”

24 साल बीतने के बाद भी यह परिवार उस त्रासदी को नहीं भूल पाया है। जब प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में गोलू का नाम लिया, तो रतन सिंह ने टीवी की ओर देखा और कहा, “लोग भूल गए होंगे, लेकिन मैं नहीं। मैं हर दिन उस दर्द के साथ जीता हूं।”

एक शहर, जो अब भी याद करता है

मुजफ्फरपुर आज भी उस काले अध्याय को नहीं भूला है। गोलू की कहानी सिर्फ एक बच्चे की नहीं थी, बल्कि पूरे समाज की थी, जिसने अन्याय और भय के खिलाफ आवाज़ उठाई थी।

रतन सिंह कहते हैं, “मेरे गोलू की कहानी खून से लिखी गई है, और वह कभी मिट नहीं सकती।”

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