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बिहार में शराबबंदी: सामाजिक सुधार या भ्रष्टाचार की नई अर्थव्यवस्था?

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क्या शराबबंदी सफल हुई या उसने भ्रष्टाचार को नया ईंधन दिया?

KKN ब्यूरो। एक  अप्रैल 2016 को जब तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू की, तब इसे सामाजिक क्रांति बताया गया था। दावा था कि इससे घरेलू हिंसा घटेगी, गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी और अपराध कम होंगे। लेकिन एक दशक बाद सवाल यह है कि क्या शराबबंदी अपने घोषित उद्देश्यों में सफल हुई या फिर इसने एक समानांतर काला बाजार और भ्रष्टाचार की नई व्यवस्था को जन्म दे दिया? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल के महीनों में सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं और सहयोगी दलों के विधायकों ने भी शराबबंदी कानून की समीक्षा की मांग उठानी शुरू कर दी है।

शराबबंदी के पक्ष में क्या तर्क हैं?

शराबबंदी लागू होने के बाद बिहार सरकार लगातार दावा करती रही है कि लाखों परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है और महिलाओं को घरेलू हिंसा से राहत मिली है। शराबबंदी की मांग भी मुख्यतः महिलाओं के आंदोलनों से निकली थी। कई सामाजिक अध्ययनों में यह संकेत मिला कि ग्रामीण क्षेत्रों में परिवारों की बचत बढ़ी और शराब पर होने वाला खर्च कम हुआ। कुछ शोधों में यह भी पाया गया कि शराबबंदी के बाद हिंसक अपराधों में कमी आई। एक अध्ययन के अनुसार बिहार में हिंसक अपराधों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा और कुछ श्रेणियों के अपराधों में गिरावट दर्ज की गई। यानी सामाजिक दृष्टि से शराबबंदी का एक पक्ष ऐसा भी है जिसे पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।

लेकिन दूसरी तस्वीर क्या कहती है?

यहीं से बहस शुरू होती है। शराबबंदी के बावजूद बिहार में अवैध शराब की तस्करी लगातार जारी है। आए दिन बड़ी मात्रा में शराब की बरामदगी होती है। सीमावर्ती राज्यों से शराब बिहार पहुंचती रहती है और पुलिस लगातार कार्रवाई करती है। हाल ही में पटना की सड़कों और नालियों से बड़ी संख्या में शराब की खाली बोतलें मिलने की घटनाओं ने भी सवाल खड़े किए कि यदि शराब पूरी तरह प्रतिबंधित है तो उसका उपभोग आखिर किस स्तर पर जारी है? पूर्वी चंपारण में जहरीली शराब कांड के बाद 14 अधिकारियों का निलंबन भी यह संकेत देता है कि कानून के क्रियान्वयन में गंभीर खामियां मौजूद हैं।

क्या शराबबंदी ने भ्रष्टाचार को बढ़ाया?

यह सबसे विवादित लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। कई राजनीतिक विश्लेषकों और शोधकर्ताओं का तर्क है कि जब किसी वस्तु की मांग बनी रहती है और उसकी वैध आपूर्ति बंद कर दी जाती है, तो अवैध बाजार पैदा होता है। बिहार में भी यही हुआ। शराब की मांग समाप्त नहीं हुई। आपूर्ति अवैध चैनलों से जारी रही। तस्करों, माफियाओं और स्थानीय नेटवर्क की भूमिका बढ़ी और पुलिस और प्रशासन पर निगरानी का दबाव बढ़ा। कई अध्ययनों में यह आशंका जताई गई कि शराबबंदी लागू कराने में पुलिस बल का बड़ा हिस्सा लग गया, जिससे अन्य अपराधों पर ध्यान कम हुआ। एक शोध में दावा किया गया कि निषेध कानून के बाद पुलिस संसाधनों के विचलन के कारण कुछ श्रेणी के अपराधों में वृद्धि देखी गई। यही वह बिंदु है जहां शराबबंदी और भ्रष्टाचार के बीच संबंध की चर्चा शुरू होती है। हालांकि यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि बिहार में बढ़ते भ्रष्टाचार का एकमात्र कारण शराबबंदी है, लेकिन यह कहना भी मुश्किल है कि शराबबंदी ने भ्रष्टाचार के नए अवसर पैदा नहीं किए है। जब किसी वस्तु का कारोबार भूमिगत हो जाता है, तो अवैध वसूली, संरक्षण शुल्क, तस्करी नेटवर्क और राजनीतिक संरक्षण जैसी समस्याएं जन्म लेने लगती हैं।

आर्थिक नुकसान कितना हुआ?

शराबबंदी से पहले बिहार को आबकारी कर से हजारों करोड़ रुपये का राजस्व मिलता था। शराबबंदी के आलोचकों का कहना है कि राज्य को हर वर्ष हजारों करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ रहा है। हाल में एनडीए के कुछ नेताओं ने भी करीब 3000 करोड़ रुपये वार्षिक नुकसान की बात कही है। आर्थिक अध्ययनों में भी यह उल्लेख मिलता है कि शराबबंदी के कारण राज्य को राजस्व हानि हुई और इसकी भरपाई अन्य स्रोतों से करनी पड़ी है। हालांकि समर्थकों का तर्क है कि सामाजिक लाभों को केवल राजस्व के पैमाने पर नहीं मापा जा सकता।

क्या हाल में किसी मंत्री ने बयान दिया है?

11 जून 2026 को बिहार सरकार के मद्यनिषेध, उत्पाद एवं निबंधन मंत्री मदन सहनी की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक हुई, जिसमें शराबबंदी कानून को और अधिक प्रभावी एवं सुदृढ़ बनाने पर चर्चा की गई। इससे स्पष्ट है कि सरकार फिलहाल कानून को कमजोर करने के बजाय उसके क्रियान्वयन को मजबूत करने के पक्ष में दिखाई देती है। दूसरी ओर, विधानसभा के भीतर और एनडीए के कुछ सहयोगी नेताओं द्वारा शराबबंदी कानून की समीक्षा की मांग भी उठाई जाती रही है।

आखिर समस्या कानून में है या उसके क्रियान्वयन में?

यह बहस का सबसे अहम बिंदु है। यदि शराबबंदी के बावजूद शराब आसानी से उपलब्ध है, जहरीली शराब से मौतें हो रही हैं, तस्करी जारी है और पुलिस और प्रशासन पर सवाल उठ रहे हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि उद्देश्य गलत था। संभव है कि समस्या कानून से अधिक उसके क्रियान्वयन में हो।

शराबबंदी को प्रभावी बनाने के लिए सरकार क्या कर सकती है?

  1. सीमावर्ती क्षेत्रों की डिजिटल निगरानी- नेपाल, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल सीमा पर एआई आधारित निगरानी तंत्र विकसित करना होगा।
  2. पुलिस जवाबदेही तय हो- जहां लगातार शराब बरामद हो रही है, वहां स्थानीय अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जाए।
  3. सामुदायिक निगरानी मॉडल- महिला स्वयं सहायता समूहों और पंचायतों को निगरानी तंत्र का हिस्सा बनाया जाए।
  4. शराब माफिया की आर्थिक रीढ़ तोड़ना- सिर्फ गिरफ्तारी नहीं, बल्कि संपत्ति जब्ती और आर्थिक जांच पर फोकस हो।
  5. स्वतंत्र प्रभाव अध्ययन- हर दो वर्ष पर किसी स्वतंत्र संस्थान से शराबबंदी का सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक ऑडिट कराया जाए।
  6. डेटा सार्वजनिक हो- कितनी गिरफ्तारी हुई, कितनी सजा हुई, कितनी शराब पकड़ी गई और कितने मामलों में अधिकारी दोषी पाए गए – यह सब सार्वजनिक डैशबोर्ड पर उपलब्ध हो।

शराबबंदी का असली इम्तिहान अभी बाकी है

बिहार की शराबबंदी न तो पूरी तरह सफल कही जा सकती है और न ही पूरी तरह विफल। एक तरफ महिलाओं और सामाजिक संगठनों का बड़ा वर्ग इसे सामाजिक सुधार मानता है। दूसरी तरफ अवैध कारोबार, जहरीली शराब से मौतें, राजस्व हानि और भ्रष्टाचार के आरोप इस नीति पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। असल सवाल यह नहीं है कि शराबबंदी रहनी चाहिए या हटनी चाहिए। असल सवाल यह है कि क्या बिहार ऐसा प्रशासनिक ढांचा बना पाया है जो शराबबंदी जैसे कठोर कानून को ईमानदारी से लागू कर सके? यदि जवाब “नहीं” है, तो समस्या शराब नहीं, व्यवस्था है। और यदि व्यवस्था ही कमजोर है, तो शराबबंदी का सपना भी अधूरा ही रहेगा।

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