बिना क़ानून की डिग्री, राजनीति और न्यायपालिका पर उठे सबसे बड़े सवाल

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KKN ब्यूरो। भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका की स्वतंत्रता एक मूल स्तंभ मानी जाती है। लेकिन इतिहास के पन्नों में एक ऐसा अध्याय भी दर्ज है, जिसने बार-बार यह सवाल खड़ा किया— क्या भारत में कभी कोई ऐसा व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट का जज बना, जिसकी पहचान एक सक्रिय राजनीतिक नेता के रूप में रही हो? और इससे भी बड़ा प्रश्न— क्या उस व्यक्ति के पास विधिवत कानून की डिग्री तक नहीं थी? यह रिपोर्ट इसी विवादास्पद और संवेदनशील मुद्दे की परतें खोलती है।
मामला किससे जुड़ा है?
भारत के न्यायिक इतिहास में यह बहस मुख्य रूप से जस्टिस बहारुल इस्लाम के नाम से जुड़ती है। उनका राजनीतिक और प्रशासनिक अतीत राजनीति के गलियारे से होकर आता है। यही पृष्ठभूमि आगे चलकर उनके न्यायिक मनोनयन को विवादों के केंद्र में ले आई।
- वे असम के मुख्यमंत्री रह चुके थे
- कांग्रेस पार्टी से राज्यसभा सांसद भी रहे
- सक्रिय राजनीति में लंबा समय बिताया
क्या उनके पास कानून की डिग्री नहीं थी?
यही इस पूरे प्रकरण का सबसे संवेदनशील और विवादास्पद पहलू है। आलोचकों का दावा रहा कि जस्टिस बहारुल इस्लाम के पास पारंपरिक अर्थों में कोई विधिवत LL.B. डिग्री नहीं थी! हालांकि वे कानूनी मामलों से जुड़े रहे, लेकिन औपचारिक विश्वविद्यालय-स्तरीय विधि शिक्षा को लेकर हमेशा प्रश्नचिह्न बना रहा। उस समय संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत प्रतिष्ठित न्यायिक अनुभव को पात्रता का आधार माना गया, न कि केवल डिग्री को! यानी, तकनीकी रूप से मनोनयन संभव था, लेकिन नैतिक और संस्थागत स्तर पर बहस तीखी हो गई।
यह घटना कब की है?
1980 में जस्टिस बहारुल इस्लाम को भारत का सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। उस समय भारत की प्रधानमंत्री थीं श्रीमति इंदिरा गांधी! कहतें हैं श्रीमति गांधी का कार्यकाल न्यायपालिका-कार्यपालिका टकराव, आपातकाल की स्मृतियाँ, और न्यायिक नियुक्तियों में हस्तक्षेप के आरोपों से जुड़ा रहा है।
क्या यह मनोनयन राजनीति से प्रेरित था?
अधिकांश संवैधानिक विशेषज्ञों की राय में इसमें राजनीतिक तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
- नियुक्त व्यक्ति का सीधा राजनीतिक अतीत
- कांग्रेस से वैचारिक और संगठनात्मक निकटता
- न्यायपालिका में कार्यपालिका के प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश
यह मनोनयन ऐसे समय हुआ जब सरकार और अदालतों के बीच विश्वास की खाई पहले से मौजूद थी।
इससे देश को कितना नुकसान हुआ?
- न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल
जनता के बीच यह धारणा बनी कि जज भी राजनीतिक निष्ठाओं से प्रभावित हो सकते हैं।
- संस्थागत विश्वास को आघात
सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्था की नैतिक साख कमजोर हुई
- भविष्य के लिए खतरनाक मिसाल
यह संदेश गया कि राजनीतिक नजदीकी, योग्यता से ऊपर हो सकती है!
- बाद में कोलेजियम सिस्टम की मांग
ऐसे ही विवादों ने आगे चलकर न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका की भूमिका सीमित करने और कोलेजियम प्रणाली को मजबूत करने की जमीन तैयार की!
क्या ऐसा फिर कभी हुआ?
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में सीधे सक्रिय राजनीति से आए व्यक्ति का मनोनयन नहीं हुआ! कई जज सेवानिवृत्ति के बाद राजनीति में गए, लेकिन पहले नेता, फिर जज—ऐसा उदाहरण दोहराया नहीं गया!
इतिहास से सबक
यह प्रकरण भारतीय लोकतंत्र को यह सिखाता है कि— संवैधानिक संस्थाएँ केवल नियमों से नहीं, भरोसे से चलती हैं! तकनीकी वैधता पर्याप्त नहीं, नैतिक वैधता उससे भी बड़ी होती है! न्यायपालिका में राजनीति की परछाईं भी लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो सकती है!



