बिहार में ऑटो और ई-रिक्शा की बढ़ती खरीदारी एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत दे रही है। खासकर कोरोना महामारी के बाद, इन वाहनों की खरीद में भारी वृद्धि देखी गई है, जिससे लोग स्व-रोज़गार के रूप में इनका उपयोग कर रहे हैं। अब तक जितने भी ई-रिक्शा और ऑटो खरीदे गए हैं, उनका बड़ा हिस्सा पिछले पांच वर्षों में ही हुआ है। 2025 तक, बिहार में कुल खरीदी गई ई-रिक्शाओं में 88 प्रतिशत से ज्यादा केवल पांच वर्षों में ही बेचीं गई हैं, जो एक बड़ा संकेत है कि लोग कम वेतन वाली नौकरी छोड़कर इन वाहनों के माध्यम से खुद का रोजगार स्थापित कर रहे हैं।
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बिहार में ई-रिक्शा की बढ़ती खरीदारी
बिहार परिवहन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में अब तक 3,06,544 ई-रिक्शा खरीदी जा चुकी हैं। 2020 में कोरोना महामारी के दौरान केवल 11,854 ई-रिक्शा की खरीदारी हुई थी, जबकि 2021 में यह संख्या बढ़कर 19,744 हो गई। 2022 में महामारी का प्रभाव काफी कम हुआ था, लेकिन लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी छिन चुकी थी, इसके बावजूद उस साल 43,884 ई-रिक्शा की खरीदारी हुई। फिर, 2023 में यह संख्या बढ़कर 69,627 हो गई और 2024 में रिकॉर्ड 76,817 ई-रिक्शा बिके। इस वर्ष 2025 में अब तक 60,743 ई-रिक्शा खरीदी जा चुकी हैं।
इस आंकड़े से साफ है कि बिहार में अब तक खरीदी गई कुल ई-रिक्शाओं में 88 प्रतिशत से ज्यादा की खरीद केवल पिछले पांच वर्षों में हुई है। यह दर्शाता है कि स्व-रोज़गार की दिशा में एक नया बदलाव आ रहा है, जहां लोग अपने भविष्य को बेहतर बनाने के लिए ई-रिक्शा की ओर रुख कर रहे हैं।
ऑटो की खरीदारी में भी बढ़ोतरी
ऑटो की खरीदारी भी कुछ इसी तरह बढ़ी है। अब तक बिहार में 5,23,899 ऑटो पंजीकृत हो चुके हैं। 2020 में 31,219 ऑटो की खरीदारी हुई थी, और 2021 में यह घटकर 19,626 रह गई। 2022 में 22,660, 2023 में 32,006, और 2024 में 36,327 ऑटो खरीदे गए। 2025 में अब तक 41,169 ऑटो की खरीदारी हो चुकी है। इस आंकड़े से यह स्पष्ट होता है कि बिहार में कुल ऑटो खरीदी का 29 प्रतिशत हिस्सा पिछले पांच वर्षों में हुआ है।
यह स्व-रोज़गार का एक और उदाहरण है, जहां लोग अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए ऑटो की दिशा में भी कदम बढ़ा रहे हैं।
महामारी के बाद रोजगार का नया रास्ता
कोरोना महामारी ने कई लोगों को उनके पारंपरिक कामों से हटा दिया और आर्थिक संकट में डाल दिया। खासकर वे लोग जो निजी कंपनियों में कम वेतन पर काम कर रहे थे, वे अब स्व-रोज़गार की दिशा में बढ़ते दिख रहे हैं। ऑटो और ई-रिक्शा के माध्यम से कई लोग अब अपनी रोज़ी-रोटी कमा रहे हैं। इन वाहनों के खरीदी आंकड़े इस बात का संकेत हैं कि लोग एक नई दिशा में अपने कदम बढ़ा रहे हैं।
आलम यह है कि अब यह वाहन सिर्फ शहरों में ही नहीं बल्कि बिहार के गांवों में भी लोकप्रिय हो गए हैं। इसके माध्यम से लोग न केवल अपनी आजीविका कमा रहे हैं बल्कि यह एक सस्ती और पर्यावरण-friendly परिवहन विकल्प भी बन गया है।
कुछ व्यक्तिगत कहानियां
कुंदन, जो पहले लुधियाना में एक निजी कंपनी में काम करते थे, कोरोना के बाद पटना वापस लौट आए। उन्होंने लोन लेकर एक ऑटो खरीदी। अब हर रोज़ वह 1,000 से 1,500 रुपये तक कमा लेते हैं और परिवार के साथ खुशहाल जीवन जी रहे हैं। कुंदन का कहना है कि अब किसी की चाकरी की जरूरत नहीं। उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और अब वे अपनी मेहनत से खुद का व्यवसाय चला रहे हैं।
प्रवीण पहले एक अपार्टमेंट में गार्ड की नौकरी करते थे, जहां वे ओवरटाइम करने पर भी मुश्किल से 10-12 हजार रुपये महीना कमा पाते थे। फिर उन्होंने लोन लेकर एक ई-रिक्शा खरीदी और अब हर रोज़ औसतन ₹1,000 की कमाई कर रहे हैं। प्रवीण अब आराम से अपने परिवार की जिम्मेदारियों को संभाल रहे हैं और उन्हें महसूस होता है कि स्व-रोज़गार में एक स्थिरता है, जो पहले किसी नौकरी में नहीं थी।
बिहार में स्व-रोज़गार का भविष्य
बिहार में ऑटो और ई-रिक्शा की बढ़ती खरीदारी एक सकारात्मक बदलाव का संकेत दे रही है। इन वाहनों से न केवल लोग अपने लिए रोजगार प्राप्त कर रहे हैं, बल्कि यह राज्य के अर्थव्यवस्था में भी योगदान दे रहे हैं। हालांकि, इस क्षेत्र को और अधिक समर्थन की आवश्यकता है। सरकार को चालकों की समस्याओं का समाधान करना चाहिए, ताकि यह सेक्टर और भी अधिक विस्तार पा सके।
ई-रिक्शा और ऑटो की बढ़ती संख्या यह दिखाती है कि लोग अब अधिक से अधिक स्व-रोज़गार की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं, खासकर उन क्षेत्रों में जहां रोजगार के अन्य अवसर सीमित हैं। इन वाहनों की बढ़ती मांग यह साबित करती है कि बिहार में परिवहन और स्व-रोज़गार के क्षेत्र में एक नई दिशा आ रही है।
समाज और सरकार की जिम्मेदारी
इन वाहनों के चालक और स्व-रोज़गार में लगे लोग अब सरकार से उचित समर्थन की उम्मीद रखते हैं। यह समय है कि सरकार इन लोगों के लिए एक मजबूत ढांचा तैयार करे, जिसमें बेहतर सड़क और पार्किंग सुविधाएं, कम ब्याज दर पर लोन की व्यवस्था, और सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जाए।
बिहार में ऑटो और ई-रिक्शा की बढ़ती खरीदारी इस बात का संकेत है कि लोग अब खुद को सशक्त बना रहे हैं। महामारी के बाद इन वाहनों ने न केवल रोज़गार के अवसर दिए हैं, बल्कि लोगों के जीवन स्तर में भी सुधार किया है। यदि सरकार इन क्षेत्रों में और अधिक निवेश करती है, तो आने वाले समय में यह रोजगार का एक प्रमुख स्रोत बन सकता है। इस नए रोजगार मॉडल ने बिहार के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और भविष्य में यह और अधिक लोगों को लाभान्वित करेगा।



