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बिहार में मुस्लिम वोटरों का बदलता रुख और RJD की चुनौतियां

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KKN ब्यूरो। बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ आ रहा है जहां पारंपरिक रूप से राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के मुख्य समर्थक समुदाय मुस्लिम मतदाता अब पार्टी से अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। आगामी विधानसभा चुनावों में यह बदलाव न केवल RJD बल्कि पूरे बिहार की राजनीतिक तस्वीर को प्रभावित कर सकता है। सीमांचल से निकल कर यह बयार अब बिहार के दूसरे कई अन्य विधानसभा क्षेत्रों में संकेत देने लगा है।

मीनापुर में मुस्लिम नाराजगी के कारण

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मुजफ्फरपुर के मीनापुर विधानसभा क्षेत्र के RJD विधायक राजीव कुमार उर्फ मुन्ना यादव के खिलाफ कुछ मुस्लिम नेताओं ने विरोध के स्वर को बुलंद करना शुरू कर दिया है। पूर्व मुखिया और समाजिक कार्यकता मो. सरदरुल खां मुसलमानो को गोलबंद करने की मुहिम चला रहें हैं। इस मुहिम ने माई समीकरण पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। हालांकि, वो खुद को विधायक मुन्ना यादव का सबसे करीबी दोस्त बता रहें हैं। सदरुल खां की नाराजगी मुस्लिम बाहुल इलाके की उपेक्षा से जुड़ी है। मुसलमानो का एक वर्ग पिछले दिनों प्रमुख के पद से शगुप्ता नाजनी को अविश्वास लगा कर हटाये जाने से भी नाराज है। इस वर्ग के कई लोग इसमें विधायक की भूमिका को संदिग्ध बतातें हुए नाराज चल रहें हैं। दूसरी ओर विधायक मुन्ना यादव इन आरोपो को निराधार बतातें है। बहरहाल, असंतोष के स्वर को कमजोर करने की कोशिश शुरू हो चुकी है। इस कार्य के लिए इलाके के कई कद्दावर मुस्लिम नेताओं को आगे कर दिया गया है। बतातें चलें कि मार्च 2025 में एक इफ्तार पार्टी के दौरान मुन्ना यादव ने दावा किया था कि मुस्लिम समुदाय के लोग उन्हें “मुन्ना यादव” के बजाय “मोहम्मद मुन्ना” कहकर संबोधित करते हैं। यह बयान कई कारणों से चर्चा में रहा। पहला, इसे मुस्लिम समुदाय के साथ छलावा माना गया क्योंकि यह केवल वोट प्राप्त करने के लिए धार्मिक पहचान के साथ खिलवाड़ दिखता है। दूसरा, स्थानीय मुस्लिम समुदाय का एक वर्ग इसे अपनी उपेक्षा पर पर्दा डालने की कोशिश मानता है। मीनापुर में मुस्लिम मतदाताओं के एक वर्ग में शिकायत यह भी है कि विधायक के रूप में मुन्ना यादव के कार्यकाल में विकास कार्यों की धमक मुस्लिम बाहुल इलाको में धीमी रही है।

कांटी विधानसभा में मुस्लिम नेतृत्व पर विवाद

कांटी विधानसभा क्षेत्र में स्थिति और भी जटिल है जहां RJD के मुस्लिम विधायक मोहम्मद इजराइल मंसूरी के नेतृत्व को लेकर यादव समुदाय में नाराजगी दिख रही है। मंसूरी, जो पहले JDU में थे और बाद में RJD में शामिल हुए, 2020 में पहली बार विधानसभा चुनाव जीते थे। कुछ समय के लिए बिहार सरकार में मंत्री भी रह चुकें है। यादव समुदाय की मुख्य आपत्ति यह है कि एक मुस्लिम नेता के नेतृत्व में उनके पारंपरिक राजनीतिक प्रभाव में कमी आई है। कांटी में यादव समुदाय का एक वर्ग महसूस करता है कि मुस्लिम नेतृत्व के कारण उनकी स्थानीय समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। दिलचस्प बात यह है कि मंसूरी की अपनी छवि इलाके में साफ-सुथरा मानी जाती है। हालांकि, 2022 में गया के विष्णुपद मंदिर में प्रवेस को लेकर इजराइल मंसूरी विवादो में आ गये थे। कुछ हिंदू संगठनों ने आपत्ति जताई थी। दूसरा सच ये भी है कि इजराइल मंसूरी का अपने इलाके में हिन्दी-मुस्लिम को साथ लेकर चलने वाली छवि है। मुसलमानो में एक चर्चा है कि उनके समाज के नेतृत्व को कमजोर करने की कोशिश हो रही है। इससे मुस्लिम समाज में असंतोष पनपने लगा है।

बिहार में मुस्लिम मोहभंग के कारण

प्रतिनिधित्व की कमी: 

RJD से मुस्लिम समुदाय की नाराजगी का सबसे बड़ा कारण राजनीतिक प्रतिनिधित्व में असंतुलन है। जबकि बिहार में मुस्लिम आबादी 17.7 प्रतिशत है। RJD द्वारा दिए जाने वाले टिकटों में यह अनुपात बहुत कम है। 2020 के चुनाव में RJD ने 58 यादव उम्मीदवारों को टिकट दिया जबकि केवल 18 मुस्लिम उम्मीदवारों को मौका मिला। प्रशांत किशोर ने इस मुद्दे को उजागर करते हुए RJD को चुनौती दी है कि अगर वे वास्तव में मुस्लिम समुदाय के हितैषी हैं तो कम से कम 40 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देना चाहिए। कही न कही यह बात अब मुसलमानो को चुभने लगा है।

पसमांदा मुसलमानों की उपेक्षा: 

बिहार के मुस्लिम समुदाय का 73% हिस्सा पसमांदा (सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े) मुसलमान हैं। ये समुदाय महसूस करते हैं कि RJD की राजनीति केवल अशराफ (उच्च वर्गीय) मुसलमानों तक सीमित रही है और उनकी विशेष समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया गया। दूसरी ओर BJP इस असंतोष का फायदा उठाने की कोशिश में जुट गई है। हालांकि, बिहार की राजनीति में बीजेपी को इस काम में बहुत कामयाबी मिलने की उम्मीद नगन्य है। लेकिन इतना तय है कि जन सुराज और जेडीयू पसमांदा मुसलमानों को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए विशेष रणनीति बना रही है।

डर की राजनीति: 

मुस्लिम समुदाय के बुद्धिजीवी और युवा वर्ग अब RJD की “डर की राजनीति” से तंग आ गए हैं। पारंपरिक रूप से RJD ने हमेशा से BJP के खतरे को दिखाकर मुस्लिम वोट हासिल करती रही है, लेकिन अब समुदाय के लोग वास्तविक विकास और सशक्तिकरण की मांग करने लगें हैं। हालांकि, बिहार की राजनीति पर करीब से नजर रखने वाले मानते है कि यह दबाव की राजनीति है। आगे चल कर स्थिति सामान्य हो जायेगा और बिहार की राजनीति में माई समीकरण कमोवेश अपना काम करता रहेगा।

सीमांचल में बदलते समीकरण

AIMIM का बढ़ता प्रभाव:

सीमांचल क्षेत्र, जिसमें अररिया, कटिहार, किशनगंज और पूर्णिया जिले शामिल हैं, बिहार की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है। यहां 24 विधानसभा सीटें हैं और मुस्लिम आबादी 47% है। 2020 के चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने इस क्षेत्र में 5 सीटें जीतकर RJD को झटका दिया था। हालांकि बाद में 4 विधायक RJD में शामिल हो गए, लेकिन AIMIM की उपस्थिति ने मुस्लिम राजनीति में एक नया विकल्प पेश कर दिया है। अब 2025 के चुनावों के लिए ओवैसी ने महागठबंधन को 6 सीटें देने का प्रस्ताव दिया है लेकिन RJD इसे स्वीकार करने में झिझक रही है। इससे सीमांचल में मुस्लिम वोट बंटने का खतरा बढ़ गया है। कहा तो यह भी जा रहा है कि इसका असर कमोवेश पूरे बिहार की राजनीति पर पड़ सकता है।

वोटर लिस्ट संशोधन का प्रभाव:

सीमांचल क्षेत्र में वोटर लिस्ट के संशोधन ने भी चिंताएं बढ़ाई हैं। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में मुस्लिम वोटर है। गहन मतदाता पुनरीक्षण के नाम पर कॉग्रेस ने जो आंदोलन चलाया, उसका सर्वाधिक असर सीमांचल में देखने को मिलता है। मुस्लिम समुदाय में अनिश्चितता की भावना बढ़ी है। हालांकि, इसका लाभ महागठबंध को कितना मिलेगा और असदउद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM इसको कितना भुना पायेगी, यह देखना दिलचस्प होगा।

वक्फ बिल विवाद का प्रभाव:

वक्फ संशोधन बिल 2024 ने बिहार की राजनीति में एक नया आयाम जोड़ा है। JDU के इस बिल का समर्थन करने से मुस्लिम समुदाय में नीतीश कुमार के खिलाफ नाराजगी बढ़ी है। JDU के 5 मुस्लिम नेताओं ने पार्टी से इस्तीफा देकर अपनी नाराजगी का पहले ही इजहार कर दिया है। हालांकि यह विवाद मुख्यतः JDU को प्रभावित कर रहा है, लेकिन इसका फायदा RJD को भी पूरी तरह नहीं मिल पा रहा है। क्योंकि, मुस्लिम समुदाय का अब सभी पार्टियों पर से भरोसा उठने लगा है। ऐसे में AIMIM की राजनीति में मुसलमान यदि अपना भविष्य तलासने लगे तो ताज्जुब नहीं होगा।

अन्य प्रभावित विधानसभा क्षेत्र

बिहार में कम से कम 47 ऐसी विधानसभा सीटें हैं जहां मुस्लिम आबादी 50 प्रतिशत या इसके आसपास है। 58 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी 20 प्रतिशत से अधिक है। ऐसे में मुसलमानो के बीच से उठता असंतोष का स्वर आरजेडी के पेशानी पर चिंता की लकीर खड़ी करने लगी है। हालांकि, RJD के रणनीतकारो का मानना है कि समय रहते सब कुछ ठीक हो जायेगा।

प्रभावित क्षेत्रों में शामिल हैं:

  • सीवान जिला: यहां मोहम्मद शहाबुद्दीन की पत्नी हीना शहाब का प्रभाव कम हो रहा है!
  • ढ़ाका विधानसभा: यहां बड़ी संख्या में मुस्लिम वोटरों के नाम काटे गए हैं।
  • अमौर, जोकिहाट: AIMIM का प्रभाव बढ़ रहा है।

चुनावी प्रभाव का विश्लेषण

RJD के लिए संकट:

मुस्लिम-यादव (MY) गठबंधन RJD की राजनीति की रीढ़ रहा है। मुसलमान (17.7%) और यादव (14%) मिलकर बिहार की 32% आबादी बनाते हैं। इस गठबंधन में दरार से RJD की स्थिति कमजोर हो सकती है। 2015 में जब RJD-JDU गठबंधन था, तो 80% मुस्लिम वोट महागठबंधन के पक्ष में गए थे। 2020 में यह घटकर 76% रह गया। 2024 के लोकसभा चुनाव में यह 87% हुआ, लेकिन अब स्थिति फिर से बदल सकती है।

बिहार में मुस्लिम वोट के लिए तीन तरफा मुकाबला

  1. RJD-कांग्रेस गठबंधन – पारंपरिक विकल्प
  2. AIMIM – धार्मिक राजनीति का विकल्प
  3. जन सुराज (प्रशांत किशोर) – विकास केंद्रित विकल्प

BJP की रणनीति

BJP भी इस स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश में है। पार्टी ने “सौगात-ए-मोदी” योजना के तहत गरीब मुसलमानों तक पहुंचने की कोशिश की है। वक्फ बिल के माध्यम से पसमांदा मुसलमानों को आकर्षित करने की रणनीति भी बनाई है।

भविष्य की संभावनाएं

क्या RJD को खामियाजा भुगतना पड़ेगा? वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए RJD को नुकसान हो सकता हैं:

  1. सीमांचल में सीटों का नुकसान: AIMIM 6-10 सीटें जीत सकती है
  2. अन्य क्षेत्रों में मार्जिन कम होना: मुस्लिम वोट का बंटवारा close contests में नुकसानदायक हो सकता है
  3. युवा मुस्लिम वोटरों का रुख: नई पीढ़ी के मुस्लिम मतदाताओं में डर की राजनीति से दूर जाने का आरजेडी को खतरा हैं

समाधान की संभावनाएं

RJD निम्नलिखित कदम उठाकर स्थिति सुधार सकती है:

  1. अधिक मुस्लिम टिकट: कम से कम 30-35 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देना
  2. पसमांदा मुसलमानों पर फोकस: इस वर्ग के लिए विशेष योजनाएं
  3. AIMIM के साथ समझौता: सीमांचल में seat sharing
  4. विकास एजेंडा: डर की राजनीति छोड़कर विकास पर ध्यान देना

मुस्लिम समुदाय की प्राथमिकताएं

बिहार की राजनीति में मुस्लिम समुदाय की बदलती प्राथमिकताएं 2025 के विधानसभा चुनावों के लिए एक निर्णायक कारक साबित हो सकती हैं। मीनापुर में मुन्ना यादव से नाराजगी, कांटी में नेतृत्व विवाद, और सीमांचल में AIMIM का बढ़ता प्रभाव RJD के लिए गंभीर चुनौती है। यह बदलाव केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मामला नहीं है, बल्कि मुस्लिम समुदाय की बदलती आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है। समुदाय अब वास्तविक विकास, बेहतर शिक्षा, रोजगार के अवसर और राजनीतिक सशक्तिकरण चाहता है, न कि केवल डर की राजनीति। अगर RJD इन चुनौतियों का समाधान नहीं निकालती, तो निकट भविष्य में इसे मुस्लिम वोट बैंक का बड़ा हिस्सा खोना पड़ सकता है। वहीं अगर इस आक्रोश का समय रहते समाधान हो जाता है, तो 2025 के चुनावों तक स्थिति सामान्य हो सकती है। हालांकि, वर्तमान ट्रेंड यह बताता है कि बिहार की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत हो रही है जहां पारंपरिक वोट बैंक की राजनीति चुनौती में है और विकास-केंद्रित राजनीति की मांग उठने लगी है।

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