बिहार विधानसभा चुनाव का माहौल तेजी से गरमा रहा है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे सीट शेयरिंग पर राजनीतिक खींचतान भी गहराती जा रही है। एनडीए हो या महागठबंधन, दोनों ही खेमों में सीट बंटवारे पर अभी तक अंतिम सहमति नहीं बन पाई है। इस बीच कांग्रेस ने अपने स्तर पर चुनावी तैयारियां तेज कर दी हैं। पार्टी के दिग्गज नेता लगातार बैठकों और जिलों के दौरों के जरिए कार्यकर्ताओं से जुड़ रहे हैं।
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कांग्रेस की 76 सीटों पर तैयारी
सूत्रों की मानें तो बिहार कांग्रेस ने 76 विधानसभा सीटों पर अपनी तैयारी शुरू कर दी है। इनमें से 38 सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान बहुत जल्द किया जाएगा। खास बात यह है कि कांग्रेस इसके लिए RJD की मंजूरी का इंतजार नहीं करने वाली। दिल्ली में आज होने वाली बैठक में बिहार कांग्रेस के कई बड़े नेता शामिल होंगे और अपनी रणनीति पार्टी नेतृत्व के सामने रखेंगे। इससे साफ है कि कांग्रेस अब उम्मीदवार चयन में दूसरों पर निर्भर नहीं रहना चाहती।
सीट शेयरिंग की जटिलता
बिहार की राजनीति में सीट शेयरिंग हमेशा से ही पेचीदा मसला रहा है। इस बार कांग्रेस चाहती है कि उसे मजबूत और कमजोर दोनों तरह की सीटों का संतुलन मिले। पार्टी का तर्क है कि 2020 में जीती गई 19 सीटें और वे सीटें जहां वह 5 हजार वोटों से हार गई थी, उसे मिलनी चाहिए। कुल मिलाकर कांग्रेस करीब 70 सीटों पर दावा कर रही है। दूसरी ओर RJD 2020 में 144 सीटों पर चुनाव लड़कर 75 सीटें जीत चुकी है और अभी भी लगभग 90 सीटों पर उसकी पकड़ मजबूत मानी जाती है।
मुख्यमंत्री चेहरे पर असहमति
महागठबंधन में इस बार मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर भी मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। कांग्रेस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल Tejashwi Yadav को सीएम चेहरा घोषित नहीं किया जाएगा। यह फैसला जनता के भरोसे छोड़ा जाएगा। कांग्रेस की इस नीति से RJD खेमे में नाराजगी की खबरें हैं, क्योंकि RJD कार्यकर्ता और नेता उम्मीद कर रहे थे कि महागठबंधन की ओर से Tejashwi को औपचारिक रूप से नेतृत्व दिया जाएगा।
राहुल गांधी का अभियान और असर
कांग्रेस अपने नेता Rahul Gandhi की हाल ही में निकली ‘Voter Adhikar Yatra’ को बड़ी उपलब्धि मान रही है। पार्टी का दावा है कि इस यात्रा से बिहार में उसका जनाधार मजबूत हुआ है, खासकर युवाओं और नए वोटरों के बीच। इसी आत्मविश्वास के चलते कांग्रेस अब सीटों के साथ-साथ डिप्टी सीएम पद की भी मांग कर रही है। दूसरी तरफ Tejashwi Yadav भी ‘Bihar Adhikar Yatra’ पर निकले हैं, जिसे कांग्रेस की सक्रियता का जवाब माना जा रहा है।
महागठबंधन में बढ़ती मुश्किलें
महागठबंधन केवल कांग्रेस और RJD तक सीमित नहीं है। इसमें CPI, CPM, CPI-ML जैसी वामपंथी पार्टियां, JMM, Pashupati Kumar Paras की RLJP और Mukesh Sahani की VIP भी शामिल हैं। हर दल अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने में लगा है। CPI-ML ने 2020 में 19 सीटों पर चुनाव लड़कर 12 सीटें जीती थीं और इस बार वह ज्यादा सीटों पर दावा कर रही है। इससे महागठबंधन के भीतर सीटों का बंटवारा और पेचीदा होता जा रहा है।
सीटों के संतुलन का सवाल
महागठबंधन नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती सीटों का संतुलित बंटवारा करना है। कांग्रेस उन सीटों को चाहती है जहां पिछली बार वह थोड़े अंतर से हारी थी। RJD अपने पारंपरिक गढ़ों को छोड़ने को तैयार नहीं है। वामपंथी दल अपने कार्यकर्ताओं और जमीनी पकड़ के आधार पर ज्यादा सीटें चाहते हैं। JMM झारखंड सीमा से सटे इलाकों पर नज़र गड़ाए है, जबकि RLJP और VIP उन इलाकों में सीटें मांग रहे हैं जहां उनकी जातीय और सामाजिक पकड़ है। हर दल को संतुष्ट करना और एकजुट चेहरा दिखाना महागठबंधन के लिए कठिन हो गया है।
NDA की चुप्पी और कांग्रेस की सक्रियता
जहां महागठबंधन आंतरिक खींचतान से जूझ रहा है, वहीं NDA खेमे में भी सीट शेयरिंग को लेकर तस्वीर साफ नहीं हुई है। BJP, JDU और HAM जैसी पार्टियां अभी भी बातचीत में लगी हैं। इस देरी का फायदा कांग्रेस उठाने की कोशिश कर रही है। पार्टी का कहना है कि जल्दी उम्मीदवार घोषित करने से ग्राउंड लेवल पर प्रचार और संगठन को मजबूती मिलती है। यही कारण है कि कांग्रेस ने अपनी लिस्ट पर काम शुरू कर दिया है।
कांग्रेस और RJD के बीच बढ़ता तनाव
कांग्रेस और RJD के बीच अंदरूनी तनाव अब सबके सामने आ चुका है। RJD मानती है कि कांग्रेस कमजोर पार्टनर है और उसे सीमित सीटों पर ही चुनाव लड़ना चाहिए। जबकि कांग्रेस यह मान रही है कि Rahul Gandhi की सक्रियता और उसका जनाधार पार्टी को ज्यादा हिस्सेदारी दिलाने का हकदार बनाता है। उम्मीदवारों की तैयारी कांग्रेस का यह संदेश है कि वह महज सहायक दल बनकर नहीं रहना चाहती।
जनता की धारणा और चुनावी रणनीति
अंततः किसी भी गठबंधन की सफलता जनता की धारणा पर निर्भर करती है। लगातार मतभेद और सीट बंटवारे की खबरें मतदाताओं को भ्रमित कर सकती हैं। कांग्रेस को उम्मीद है कि जनता आधारित मुद्दों पर फोकस और सीएम चेहरे की घोषणा टालने की रणनीति लोगों को पसंद आएगी। वहीं RJD का मानना है कि Tejashwi Yadav की लोकप्रियता गठबंधन को बढ़त दिलाएगी। दोनों पार्टियां अपनी-अपनी बात जनता तक पहुंचाने के लिए यात्राओं और जनसभाओं का सहारा ले रही हैं।
बिहार विधानसभा चुनाव NDA और महागठबंधन के बीच ही नहीं, बल्कि गठबंधन के अंदरूनी समीकरणों के बीच भी संघर्ष का मैदान बन चुका है। कांग्रेस के सामने चुनौती है कि वह अपने जनाधार को बढ़ाए और सहयोगियों को नाराज़ किए बिना अपनी हिस्सेदारी मजबूत करे। RJD को भी नेतृत्व स्थापित करते हुए सहयोगियों को संतुष्ट करना होगा। आखिरकार, सीट शेयरिंग का फॉर्मूला ही तय करेगा कि कौन-सा दल कितनी मजबूती के साथ मैदान में उतरता है और क्या महागठबंधन NDA के खिलाफ एकजुट चेहरा दिखा पाएगा।



