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प्रशांत किशोर ने बिहार चुनाव हार की जिम्मेदारी ली, एनडीए सरकार को चुनौती दी

प्रशांत किशोर ने बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में अपनी पार्टी जन सुराज की हार की पूरी जिम्मेदारी ली है और नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को छह महीने में अपने वादों को पूरा करने की चुनौती दी है।

18 नवम्बर 2025 को बिहार के पटना में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रशांत किशोर ने पहली बार मीडिया के सामने आकर अपनी पार्टी जन सुराज की बिहार विधानसभा चुनाव में हुई शर्मनाक हार पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि जन सुराज पार्टी को बिहार विधानसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली और पार्टी को मिली हार की पूरी जिम्मेदारी वह खुद लेते हैं।

प्रशांत किशोर: ‘बिहार नहीं छोड़ूंगा’

प्रशांत किशोर ने यह स्पष्ट किया कि वह बिहार छोड़ने का कोई इरादा नहीं रखते। उन्होंने कहा कि वह आगे भी गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करने का काम करेंगे। हालांकि, उन्होंने अपनी पार्टी की हार को लेकर खेद व्यक्त किया और 20 नवम्बर को गांधी आश्रम में सामूहिक मौन उपवास रखने का ऐलान किया। यह उपवास वह हार की जिम्मेदारी लेने के रूप में करेंगे।

प्रशांत किशोर ने यह भी कहा कि वह फिलहाल राजनीति से संन्यास लेने का कोई विचार नहीं रखते। लेकिन उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि अगर अगले छह महीनों में नीतीश कुमार की नेतृत्व वाली एनडीए सरकार अपने वादों को पूरा करती है, तो वह राजनीति से संन्यास ले लेंगे।

हार की जिम्मेदारी और सिस्टम में बदलाव के प्रयास

प्रशांत किशोर ने स्वीकार किया कि बिहार चुनाव में उनकी पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने जन सुराज पार्टी की स्थापना की थी, तो उनका उद्देश्य बिहार में सिस्टम और शासन व्यवस्था में बदलाव लाना था। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि उनका प्रयास सफल नहीं रहा और पार्टी जनता का विश्वास जीतने में असफल रही।

किशोर ने यह स्वीकार किया कि वह बिहार में न तो सत्ता परिवर्तन कर सके और न ही व्यवस्था परिवर्तन ला सके। इसके लिए उन्होंने खुद को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि शायद उन्होंने कहीं न कहीं कोई गलती की होगी, जिसकी वजह से जनता ने उन पर विश्वास नहीं दिखाया।

एनडीए सरकार को चुनौती: क्या वादे पूरे होंगे?

प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार की एनडीए सरकार को उनके चुनावी वादों को पूरा करने की चुनौती दी। उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले नीतीश कुमार सरकार ने 40 हजार करोड़ रुपये की योजनाओं की घोषणा की थी, जिसमें स्वरोजगार योजना के तहत डेढ़ करोड़ महिलाओं के खातों में ₹10,000 भेजने का वादा किया गया था। इसके अलावा, सरकार ने यह भी वादा किया था कि अगले छह महीने में हर परिवार को ₹2 लाख दिए जाएंगे।

प्रशांत किशोर ने कहा कि अब यह जिम्मेदारी एनडीए सरकार की है कि वह वादे के मुताबिक महिलाओं को ₹2 लाख दे, ताकि उनकी गरीबी दूर हो सके। उन्होंने यह चुनौती दी कि अगर सरकार यह वादा पूरा कर देती है, तो वह राजनीति से संन्यास ले लेंगे।

क्या एनडीए सरकार अपने वादे पूरे कर पाएगी?

प्रशांत किशोर ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर एनडीए सरकार अपने वादों को पूरा करने में नाकाम रहती है, तो यह साबित हो जाएगा कि चुनाव के दौरान महिलाओं को ₹10,000 देकर वोट खरीदे गए थे। उनके इस बयान ने बिहार की राजनीति में हलचल मचा दी है और यह सवाल उठने लगा है कि क्या नीतीश कुमार सरकार इन वादों को निभा पाएगी या नहीं।

इस चुनौती के साथ, प्रशांत किशोर ने अपनी राजनीतिक यात्रा को एक नया मोड़ दिया है। यह भी स्पष्ट हो गया है कि वह बिहार में बदलाव लाने के अपने उद्देश्य से पीछे नहीं हटेंगे। साथ ही, यह देखा जाएगा कि अगले छह महीनों में नीतीश कुमार की सरकार कितनी सफल होती है, और क्या वह बिहार की जनता के लिए बेहतर समाधान प्रस्तुत कर पाती है।

राजनीतिक भविष्य और आगे की राह

जन सुराज पार्टी की हार के बावजूद, प्रशांत किशोर ने अपनी राजनीतिक यात्रा को समाप्त करने की बजाय एक नया मोड़ लिया है। उनकी चुनौती ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या एनडीए सरकार अपने चुनावी वादों को पूरा कर पाएगी। यदि सरकार वादों में विफल होती है, तो यह दर्शाता है कि राजनीतिक रणनीतियों के पीछे कितनी सच्चाई और कड़ी मेहनत है।

प्रशांत किशोर का यह बयान बिहार की राजनीति को एक नई दिशा देने वाला हो सकता है। उनके इस चुनौतीपूर्ण कदम ने राज्य के राजनीतिक माहौल को और भी गर्म कर दिया है। बिहार की जनता और राजनीतिक विश्लेषक अब यह देखेंगे कि एनडीए सरकार छह महीने में क्या कदम उठाती है और क्या वह अपने वादों को पूरा कर पाती है।

क्या प्रशांत किशोर राजनीति से संन्यास लेंगे?

प्रशांत किशोर ने स्पष्ट किया है कि अगर नीतीश कुमार सरकार अपने वादों को पूरा करती है, तो वह राजनीति से संन्यास ले लेंगे। यह एक बड़ा राजनीतिक कदम हो सकता है और बिहार की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत कर सकता है।

प्रशांत किशोर की यह चुनौती बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है। उनके द्वारा उठाए गए कदम ने राज्य की राजनीति को और अधिक उथल-पुथल में डाल दिया है। अब यह देखना होगा कि अगले छह महीने में क्या होता है और क्या प्रशांत किशोर का संन्यास होगा या वे फिर से अपनी पार्टी और विचारधारा के साथ बिहार की राजनीति में सक्रिय रहेंगे।

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