Home Social Buzz जगद्गुरु रामभद्राचार्य: शास्त्रों के मर्मज्ञ, अंधकार से प्रकाश की अनोखी यात्रा

जगद्गुरु रामभद्राचार्य: शास्त्रों के मर्मज्ञ, अंधकार से प्रकाश की अनोखी यात्रा

जगद्गुरु रामभद्राचार्य को रामचरितमानस का अद्वितीय मर्मज्ञ माना जाता है। उनका जीवन अध्यात्म, विद्या और सेवा का प्रतीक है। वह न सिर्फ़ धार्मिक ग्रंथों के ज्ञाता हैं बल्कि उन्होंने समाज के लिए भी कई उल्लेखनीय कार्य किए हैं।

राम मंदिर मामले में उनकी शास्त्रों पर दी गई व्याख्या को अदालत ने महत्व दिया था। यही कारण है कि उनका नाम धार्मिक विद्वानों में विशेष रूप से लिया जाता है।

गिरिधर नाम की कहानी

रामभद्राचार्य का जन्म 14 जनवरी 1950 को मकर संक्रांति के दिन हुआ। उनका पैतृक गांव जौनपुर जिले का शांदीखुर्द है। पिता का नाम पंडित राजदेव मिश्र और माता का नाम शशि देवी मिश्रा था।

परिवार ने उन्हें बचपन में गिरिधर नाम दिया। यह नाम उनके दादा के चचेरे भाई, जो मीराबाई के भक्त थे, उन्होंने रखा। भगवान कृष्ण से गहरी आस्था रखने वाले उस बाबा ने बच्चे को कृष्ण का ही नाम दे दिया।

दो माह की उम्र में दृष्टि चली गई

रामभद्राचार्य का जीवन बचपन से ही संघर्षों से भरा रहा। जन्म के दो महीने बाद उन्हें ट्रेकोमा नामक आंखों की बीमारी हो गई। इसके चलते उनकी आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चली गई।

इस कठिनाई के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। अपने दादा सूर्यबली मिश्र से उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा पाई और आगे चलकर धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन जारी रखा।

अद्भुत स्मरण शक्ति

उनकी स्मरण शक्ति असाधारण बताई जाती है। पाँच वर्ष की उम्र तक उन्होंने संपूर्ण भगवद्गीता संस्कृत सहित कंठस्थ कर ली थी। आठ साल की उम्र तक उन्होंने संत तुलसीदास द्वारा रचित सम्पूर्ण रामचरितमानस यानी लगभग 10,800 छंद याद कर लिए थे।

दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने कभी Braille या किसी अन्य विशेष साधन का प्रयोग नहीं किया। केवल सुनकर और दोहराकर उन्होंने हजारों श्लोक कंठस्थ कर लिए।

वेदों और उपनिषदों का अध्ययन

रामभद्राचार्य ने आगे चलकर वेद, उपनिषद, भागवत पुराण, संस्कृत व्याकरण और तुलसीदास के सभी ग्रंथों का भी गहन अध्ययन किया।

24 जून 1961 को निर्जला एकादशी के दिन उनका उपनयन संस्कार हुआ। उसी अवसर पर उन्हें गायत्री मंत्र की दीक्षा मिली। बाद में अयोध्या के पंडित ईश्वर दास महाराज ने उन्हें श्रीराम मंत्र दिया।

रामचरितमानस के महान व्याख्याता

आज उन्हें रामचरितमानस का सबसे बड़ा विद्वान माना जाता है। उनकी व्याख्याएं गहन और सरल दोनों होती हैं।

राम मंदिर मामले में उन्होंने शास्त्रों के आधार पर अपना पक्ष रखा। अदालत ने भी उनकी व्याख्या को गंभीरता से स्वीकार किया। इससे यह स्पष्ट होता है कि उनके ज्ञान को विद्वान ही नहीं, न्यायालय भी मान्यता देते हैं।

सार्वजनिक जीवन और विवाद

रामभद्राचार्य का सार्वजनिक जीवन कई बार विवादों में भी घिरा। उन्होंने कुछ ब्राह्मण उपजातियों को लेकर बयान दिए, जिन पर बहस छिड़ गई। प्रेमानंद महाराज को लेकर की गई निजी टिप्पणी ने भी विवाद खड़ा किया।

हालांकि इन विवादों के बावजूद उनकी विद्वत्ता और योगदान पर सवाल नहीं उठते। उनकी पहचान आज भी एक महान धर्मगुरु और शिक्षाविद् के रूप में है।

राजनीतिक और धार्मिक संबंध

रामभद्राचार्य के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी अच्छे संबंध बताए जाते हैं। बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री उन्हें अपना गुरु मानते हैं।

इससे स्पष्ट होता है कि वह न केवल शिष्यों के बीच बल्कि बड़े नेताओं के बीच भी सम्मानित हैं।

संस्थाओं की स्थापना

रामभद्राचार्य ने समाज के लिए कई संस्थानों की स्थापना की।

  • 1996 में उन्होंने चित्रकूट में Tulsi School for the Blind की स्थापना की।

  • 2001 में उन्होंने जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय शुरू किया। यह दुनिया का पहला विश्वविद्यालय है जहाँ केवल दिव्यांग विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा मिलती है।

वह इस विश्वविद्यालय के आजीवन कुलपति हैं और इसे दिव्यांग छात्रों की शिक्षा और सशक्तिकरण का केंद्र बना चुके हैं।

साहित्य में योगदान

रामभद्राचार्य केवल धर्मगुरु ही नहीं, बल्कि महान लेखक और कवि भी हैं। संस्कृत और हिंदी साहित्य में उनका योगदान असाधारण है।

साहित्य और धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या के क्षेत्र में उनके काम के लिए उन्हें प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

जगद्गुरु रामभद्राचार्य का जीवन संघर्ष, विद्या और सेवा का अद्भुत संगम है। दो महीने की उम्र में आंखों की रोशनी खो देने के बावजूद उन्होंने वह कर दिखाया जो विरले ही कर पाते हैं।

उन्होंने न केवल ग्रंथों को कंठस्थ किया बल्कि समाज को शिक्षा और सेवा का रास्ता भी दिखाया। विवादों के बावजूद उनका योगदान अविस्मरणीय है।

गिरिधर से जगद्गुरु बनने तक का यह सफर आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा। वह आज भी अध्यात्म और ज्ञान का उज्ज्वल प्रतीक बने हुए हैं।

Read this article in

KKN लाइव WhatsApp पर भी उपलब्ध है, खबरों की खबर के लिए यहां क्लिक करके आप हमारे चैनल को सब्सक्राइब कर सकते हैं।

KKN Public Correspondent Initiative

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version