भारत में दहेज का मुद्दा दशकों से महिलाओं की जान लेता आ रहा है। Dowry Death in India की घटनाएं लगातार सामने आती हैं, और 2025 में Nicky Bhati Case ने एक बार फिर समाज को झकझोर दिया।
ग्रेटर नोएडा की निक्की भाटी को उसके पति विपिन भाटी और ससुराल वालों ने कथित रूप से ₹36 लाख की मांग पूरी न होने पर जिंदा जला दिया। आरोपी गिरफ्तार हो चुके हैं, लेकिन यह मामला उस कड़वी सच्चाई को सामने लाता है कि आज भी महिलाएं दहेज के लिए मौत का शिकार बन रही हैं।
दहेज प्रथा और कानून का सफर
भारत में दहेज के खिलाफ कानूनी लड़ाई पुरानी है। 1914 में कोलकाता की स्नेलता मुखोपाध्याय ने आत्महत्या की थी क्योंकि उनके पिता दहेज जुटा नहीं पाए थे।
आजादी के बाद 1961 में Anti-Dowry Law लागू हुआ। लेकिन इस कानून ने हालात में बड़ा बदलाव नहीं किया। 1970 के दशक में दिल्ली की हरदीप कौर, तरविंदर कौर और कंचन चोपड़ा जैसी महिलाओं की मौतों ने आंदोलन को नया रूप दिया।
Bride Burning और आंदोलन की शुरुआत
1970 और 1980 के दशक में “Bride Burning” शब्द ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बदनामी की।
दिल्ली की सड़कों पर “ओम स्वाहा” जैसे नुक्कड़ नाटकों के जरिए महिलाओं के संगठन जागरूकता फैलाने लगे। नारे गूंजते थे—
“फिएट की गाड़ी, बिन्नी का कपड़ा, बाटा के जूते… चाहे लड़की पिस पिस कर मर जाए।”
इन्हीं प्रदर्शनों ने 1983 में IPC Section 498A को जन्म दिया। इस सेक्शन ने दहेज उत्पीड़न को गैर-जमानती अपराध घोषित किया और पति व ससुरालवालों की जिम्मेदारी तय की।
Section 498A Misuse पर उठते सवाल
समय बीतने के साथ 498A पर बहस बदल गई। अब सवाल उठने लगे कि क्या इसका गलत इस्तेमाल हो रहा है।
NCRB के आंकड़ों के अनुसार 2022 में 6,516 Dowry Death in India के केस दर्ज हुए। वहीं 60,577 मामले अदालतों में लंबित हैं। जिन मामलों का ट्रायल पूरा हुआ उनमें केवल 33% में ही सजा हुई।
कम सजा दर ने यह तर्क मजबूत किया कि सेक्शन 498A में कई झूठे केस दर्ज होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार माना कि इसका दुरुपयोग एक “नए कानूनी आतंकवाद” का रूप ले सकता है।
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं की दलील
महिला अधिकार संगठनों का मानना है कि “झूठे केस” की दलील अतिरंजित है।
एडवोकेट प्योली कहती हैं कि 498A के तहत आरोप साबित करना बेहद मुश्किल है। शिकायतकर्ता को यह साबित करना होता है कि ससुराल वाले साथ रहते थे, उत्पीड़न हुआ और सबूत मौजूद हैं।
कई महिलाएं डर, परिवार के दबाव और समाज की वजह से पुलिस तक जाती ही नहीं। ऐसे में कानून के दुरुपयोग का तर्क उन महिलाओं की आवाज़ दबा देता है जिन्हें वास्तव में न्याय चाहिए।
अदालतों की सख्ती
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट्स ने कई बार “Misuse of Section 498A” रोकने के लिए गाइडलाइन बनाई हैं।
-
2017 में फैमिली वेलफेयर कमिटी बनाने और “कूलिंग ऑफ पीरियड” लागू करने का सुझाव आया।
-
2022 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी से पहले दो महीने का समय देने का आदेश दिया।
-
2025 में सुप्रीम कोर्ट ने Shivangi Bansal vs Sahib Bansal मामले में इसे दोहराया।
महिला संगठनों का कहना है कि ऐसी शर्तें कानून को कमजोर कर देती हैं और असली पीड़ितों को न्याय से दूर कर देती हैं।
समाज और कानून की चुनौती
निक्की भाटी की मौत ने यह साफ कर दिया है कि दहेज हत्या का सिलसिला रुका नहीं है। कानून बने, आंदोलन हुए, लेकिन दहेज की मांग अब भी कार, कैश और लग्जरी सामान तक सीमित नहीं है।
जब तक समाज खुद इस प्रथा का विरोध नहीं करेगा, Anti-Dowry Law का असर अधूरा रहेगा।
Dowry Death in India सिर्फ एक अपराध नहीं बल्कि सामाजिक कलंक है। Nicky Bhati Case इस बात का सबूत है कि महिलाएं अब भी दहेज के लालच की भेंट चढ़ रही हैं।
Section 498A Misuse पर बहस ज़रूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि जिन महिलाओं को न्याय चाहिए उन्हें पूरा समर्थन मिले।
आज भी अदालतों और कानून की जटिलताओं के बीच कई महिलाएं अकेली रह जाती हैं। दहेज विरोधी कानून का मकसद तब ही पूरा होगा जब समाज, अदालत और सरकार मिलकर इसे सख्ती से लागू करें और साथ ही महिलाओं को सुरक्षित माहौल दें।
Discover more from
Subscribe to get the latest posts sent to your email.