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जगदीप धनखड़ के इस्तीफे पर गरमाई सियासत, कांग्रेस नेता उदित राज ने उठाया ‘जाट फैक्टर’ का मुद्दा

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देश के उपराष्ट्रपति पद से जगदीप धनखड़ के अचानक इस्तीफे ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। भले ही उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए पद छोड़ा हो, लेकिन विपक्ष इस कदम के पीछे गहरी सियासी रणनीति देख रहा है। खासकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद उदित राज ने इस मुद्दे पर ‘जाट फैक्टर’ का जिक्र कर पूरे मामले को एक नई दिशा दे दी है।

उदित राज का कहना है कि भाजपा को अब जाट नेताओं पर भरोसा नहीं रहा। उन्होंने पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का उदाहरण देते हुए कहा कि भाजपा ने पहले उन्हें दरकिनार किया और अब वही रवैया जगदीप धनखड़ के साथ अपनाया गया है।

उन्होंने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि “धनखड़ जी सत्यपाल मलिक के बाद दूसरे बड़े जाट नेता हैं जिनका सफाया भाजपा ने कर दिया है। शायद भाजपा को जाट नेताओं पर विश्वास नहीं है।” उदित राज का यह भी कहना है कि भाजपा को हरियाणा में नॉन-जाट फॉर्मूला बहुत फायदेमंद साबित हुआ, इसलिए अब वह जाट नेताओं को आगे नहीं लाना चाहती।

हरियाणा मॉडल की देशभर में छाप


भाजपा की रणनीति की बात करें तो हरियाणा में नॉन-जाट नेतृत्व का फार्मूला काफी हद तक सफल रहा। 2014 में मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने परंपरागत राजनीति से हटकर दांव खेला था। इसी मॉडल को अब राष्ट्रीय राजनीति में भी लागू करने की कोशिश के संकेत मिल रहे हैं।

उदित राज का दावा है कि भाजपा अब केवल जाट वोट चाहती है, लेकिन नेतृत्व की जिम्मेदारी उन्हें नहीं देना चाहती। उनका कहना है कि यह रवैया पार्टी के भीतर जाट समुदाय के नेताओं को हाशिये पर धकेलने का प्रयास है।

विपक्ष का बदलता रुख


जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद एक दिलचस्प स्थिति यह भी सामने आई है कि जिन विपक्षी सांसदों ने कभी उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की बात कही थी, वही अब उनके समर्थन में बयान दे रहे हैं। कई सांसदों ने इस बात पर अफसोस जताया है कि एक ‘किसानपुत्र’ को सम्मानजनक विदाई नहीं दी जा रही है।

राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और कांग्रेस नेता जयराम रमेश का धनखड़ से पहले कई बार टकराव हुआ था। लेकिन अब वही नेता उनके इस्तीफे पर दुख प्रकट कर रहे हैं और उनके निर्णय पर पुनर्विचार करने की अपील कर रहे हैं।

धनखड़ की भूमिका और आलोचना


राज्यसभा में सभापति के रूप में जगदीप धनखड़ की भूमिका को लेकर विपक्ष कई बार सवाल खड़े कर चुका है। विपक्ष का आरोप था कि वे सदन की कार्यवाही निष्पक्ष रूप से नहीं चला रहे थे। जयराम रमेश ने तो यहां तक कहा था कि उपराष्ट्रपति को एक अंपायर की तरह न्यूट्रल रहना चाहिए, न कि किसी पक्ष की ओर झुकाव दिखाना चाहिए।

धनखड़ का कार्यकाल कई बार तीखे राजनीतिक संघर्षों का गवाह रहा। कांग्रेस समेत कई दलों ने उन पर पक्षपात का आरोप लगाया, लेकिन आज उन्हीं नेताओं का रुख नरम हो गया है, जो उनकी आलोचना में सबसे आगे थे।

बीजेपी का मौन और आगामी समीकरण


धनखड़ के इस्तीफे पर भाजपा की ओर से अब तक कोई विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं आई है। पार्टी ने केवल इतना कहा है कि वह उनके स्वास्थ्य के लिए शुभकामनाएं देती है और उनके योगदान को सराहती है।

हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल एक औपचारिक वक्तव्य है। अंदरखाने कई समीकरण बन रहे हैं, क्योंकि अब भाजपा को नया उपराष्ट्रपति चुनना होगा। संसद का मानसून सत्र चल रहा है और ऐसे में यह खाली पद विधायी प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।

सत्यपाल मलिक से तुलना का अर्थ


उदित राज ने जिस तरह से सत्यपाल मलिक और जगदीप धनखड़ की तुलना की है, उसका बड़ा राजनीतिक अर्थ निकाला जा रहा है। सत्यपाल मलिक, जो जम्मू-कश्मीर सहित कई राज्यों के राज्यपाल रह चुके हैं, ने भाजपा नेतृत्व के खिलाफ खुलकर बयान दिए थे।

अब धनखड़ का नाम उसी पंक्ति में लिया जा रहा है, यह भाजपा की अंदरूनी राजनीति और जातीय समीकरणों को उजागर करता है। पार्टी की कोशिश यही होगी कि वह इस विवाद को ज्यादा हवा न दे और जल्द से जल्द नए चेहरे की घोषणा कर सियासी तापमान को नीचे लाए।

राजनीति में जाति का गणित फिर चर्चा में


धनखड़ के इस्तीफे के बाद जाट राजनीति एक बार फिर केंद्र में आ गई है। राजस्थान, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट समुदाय भाजपा के लिए अहम रहा है। लेकिन अब इन इलाकों में भाजपा के प्रति नाराजगी की लहर भी दिख रही है।

खासकर पश्चिमी यूपी में किसान आंदोलन के बाद जाटों में भाजपा के खिलाफ असंतोष उभरा है। ऐसे में धनखड़ जैसे कद्दावर जाट नेता का इस्तीफा भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।

नया उपराष्ट्रपति: कौन होगा अगला चेहरा?


अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जगदीप धनखड़ के स्थान पर अगला उपराष्ट्रपति कौन होगा। चर्चाएं हैं कि भाजपा पूर्वोत्तर या पूर्व भारत से किसी वरिष्ठ नेता या महिला चेहरा को आगे ला सकती है ताकि सामाजिक संतुलन बना रहे।

यदि पार्टी फिर से जाट नेता को मौका देती है, तो यह संकेत जाएगा कि धनखड़ का इस्तीफा केवल स्वास्थ्य कारणों से था। लेकिन यदि किसी अन्य वर्ग से उपराष्ट्रपति चुना गया तो ‘जाट फैक्टर’ की बहस और तेज हो सकती है।

धनखड़ की विरासत: किसान पुत्र से उपराष्ट्रपति तक


राजस्थान के एक छोटे किसान परिवार से निकलकर देश के उपराष्ट्रपति पद तक पहुंचना जगदीप धनखड़ के लिए एक उपलब्धि रही है। अपने कार्यकाल में उन्होंने कई बार खुद को किसान पुत्र बताया और ग्रामीण भारत की बात की।

उनका कार्यकाल विवादों से भी घिरा रहा, लेकिन अब जब वे इस्तीफा दे चुके हैं, तो उनकी भूमिका और विरासत को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।


धनखड़ का इस्तीफा केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं बल्कि एक राजनीतिक घटनाक्रम बन चुका है। कांग्रेस नेता उदित राज ने इसमें जो ‘जाट फैक्टर’ जोड़ा है, वह भाजपा की जातीय रणनीति को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।

विपक्ष जहां इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश में है, वहीं भाजपा इसे जल्द से जल्द शांत करना चाहेगी। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह एक सामान्य इस्तीफा था या फिर रणनीति का हिस्सा। लेकिन इतना तय है कि राजनीति में जाति और पहचान की बहस एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है।

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