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मकर संक्रांति एक खगोलीय घटना

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पूरे भारत में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है

KKN न्यूज ब्यूरो। मकर संक्रांति एक ऐसा त्यौहार है जो पूरे भारत में अलग-अलग नाम और कई तरीक़ों से मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसको मकर संक्रांति कहा जाता है। तमिलनाडु में पोंगल के नाम से जाना जाता है। जबकि गुजरात में इसे उत्तरायण कहते हैं। असम में इसे माघी बिहू कहते हैं और कर्नाटक में सुग्गी हब्बा। केरल में मकरविक्लु कहा जाता है और कश्मीर में शिशुर सेंक्रांत के नाम से मनाया जाता है। भारत के अतिरिक्त यह त्यौहार नेपाल और बांग्लादेश में भी मनाया जाता है। अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं के हिसाब से लोग इसे मनाते हैं। इस त्यौहार के पीछे एक खगोलीय घटना है। मकर का मतलब है कौन्स्टोलेशन ऑफ़ कैप्रिकॉन जिसे मकर राशि कहते हैं। खगोल विज्ञान के कैप्रिकॉन और भारतीय ज्योतिष की मकर राशि में थोड़ा अंतर है। पर, बहुत अधिक समानता भी है।

संक्रांति का मतलब संक्रमण यानी ट्रांजिशन

कॉन्सटोलेशन तारों से बनने वाले एक ख़ास पैटर्न को कहा जाता है। प्राचीन काल से दुनिया की लगभग हर सभ्यता में लोगों ने उनके आकार के आधार पर उन्हें नाम दिए हैं। खगोलीय कौन्स्टोलेशन और ज्योतिष की राशियां मोटे तौर पर मिलती-जुलती हैं। संक्रांति का मतलब संक्रमण यानी ट्रांजिशन से है। हिन्दु मान्यताओं के मुताबिक इस दिन मोटे तौर पर सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। यह विंटर सोलिस्टिस के बाद आता है। यानी सर्दियों की सबसे लंबी रात 22 दिसंबर के बाद मकर संक्रांति आता है। सूर्य के किसी राशि में प्रवेश करने या निकलने का अर्थ यह नहीं है कि सूर्य घूम रहा है। यह पृथ्वी द्वारा सूर्य के चारों तरफ़ चक्कर लगाने की प्रक्रिया का हिस्सा है। इसे परिभ्रमण कहते हैं। धरती को सूर्य का एक चक्कर पूरा करने में एक साल का समय लगता है।

मकर संक्रांति के बाद दिन लम्बे होते है

इसका आसान भाषा में यह मतलब है कि सूर्य किस तारा समूह (राशि) के सामने आ गया है। कहा जाता है कि मकर संक्रांति के बाद से दिन लंबे होने लगते हैं और रातें छोटी होनी लगती है। यह बात तकनीकी तौर पर सही है। क्योंकि नॉर्दर्न हैमिस्फ़ियर (उत्तरी गोलार्ध) में 14-15 जनवरी के बाद से सूर्यास्त का समय धीरे-धीरे आगे खिसकने लगता है। फिर आती है 21 मार्च की तारीख़, इसे इक्विनॉक्स कहते हैं। जब दिन और रात बराबर हो जाता हैं। इसका मतलब है कि सूर्य उत्तरी गोलार्ध के तकरीबन बीचो-बीच में पहुंच चुका होता है। सूर्यास्त का समय धीरे-धीरे आगे खिसकने का मतलब है कि सर्दियां कम होंगी और गर्मी बढ़ेगी। क्योंकि, सूर्य उत्तरी गोलार्ध के सीध में अधिक समय तक रहेगा। मकर संक्रांति को उत्तरायण इसलिए भी कहते हैं कि मकर संक्रांति के बाद से सूरज दक्षिणी गोलार्ध से उत्तरी गोलार्ध की तरफ़ आना शुरू हो जाता है। यह प्रक्रिया समर सोलिस्टिस के दिन पूरी होती है। जिस दिन सबसे लंबा दिन होता है, यह तारीख़ 21 जून की है।

धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने का संक्रमण काल

मकर संक्रांति यानी सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने का संक्रमण काल। वैसे भारत में प्रचलित सभी हिंदू कैलेंडर चंद्रमा पर आधारित हैं। यही वजह है कि हिंदू त्यौहारों की अंग्रेज़ी तारीख़ बदलती रहती है। इस समय जो कैलेंडर इस्तेमाल होता है उसे ग्रेगोरियन कैलेंडर कहते हैं। यह सोलर कैलेंडर है यानी सूर्य पर आधारित कैलेंडर है। मकर संक्रांति एक ऐसा त्योहार है जो धरती पर सूर्य की स्थिति के हिसाब से मनाया जाता है। यही वजह है कि चंद्रमा की स्थिति में मामूली हेरफेर की वजह से यह कभी 14 जनवरी को होता है तो कभी 15 जनवरी को होता है।

 

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