मंगलवार, मार्च 3, 2026 8:12 अपराह्न IST
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प्लासी में ऐसा क्या हुआ कि भारत को अंग्रेजो का गुलाम होना पड़ा

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इन दिनो भारत में आजादी का अमृत महोत्सव चल रहा है। यह बात हम सभी लोगो के लिए खुशी के साथ गौरव की अनुभूति कराता है। पर, मेरे मन में कई सवाल है। अव्वल तो ये कि व्यापार करने वाले मुट्ठी भर अंग्रेजो के हम गुलाम कैसे हो गए? सिर्फ गुलाम नहीं हुए। बल्कि, करीब 200 वर्षो तक गुलाम रहे। 200 वर्ष… एक बड़ा कालखंड होता है। ऐसे में यह समझना जरुरी हो जाता है कि उस समय, यानी जब अंग्रेज हमको गुलाम बना रहे थे। तब भारत की राजनीतिक और समाजिक परिस्थितियां कैसी थीं? इसको समझने के लिए इतिहास के पन्ना पलटना जरुरी हो जाता है। इसको समझने के लिए प्लासी के मैदान में हुए युद्ध को समझना होगा। प्लासी की लड़ाई क्यों और किन हालातो में हुई और इसका परिणाम क्या हुआ? यही पर सभी सवालो का जवाब मिल जाता है।

प्लासी के मैदान में हुआ था युद्ध

KKN न्यूज ब्यूरो। आपने इतिहास में पढ़ा होगा कि प्लासी में इस्ट इंडिया कंपनी और बंगाल के नवाब के बीच सबसे पहला युद्ध हुआ था। उस समय सिराजुद्दौला बंगाल के नवाब हुआ करते थे। जबकि, इस्ट इंडिया कंपनी रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में युद्ध करने उतरी थी। यह युद्ध प्लासी के मैदान में हुआ था। इसलिए इसको प्लासी का युद्ध कहा जाता है। पश्चिम बंगाल में भागरीथी नदी के पूर्वी इलाके को प्लासी का इलाका कहा जाता है। यह लड़ाई वर्ष 1757 में हुआ था। सिराजुद्दौला इस लड़ाई में पराजित हुए और यही से भारत में ब्रिटिश हुकूमत की नींब पड़ गई थी। कहानी इतनी भर नहीं है। बल्की असली कहानी तो इसी युद्ध की पृष्टभूमि में छिपा है। नवाब के पास 50 हाजार सैनिक थे। जबकि क्लाइव के नेतृत्व वाली ब्रिटिश सेना में मात्र 3 हजार सैनिक थे। बावजूद इसके नवाब पराजित क्यों हुए? इस सवाल का जवाब आगे बतायेंगे।

बंगाल से व्यापार करने की अनुमति

पहले यह जान लेना जरुरी है कि उनदिनो भारत पर मुगलो का शासन हुआ करता था। यह बात 16वीं शताब्दी के मध्य की है। मुगल भारत पर निर्बाध शासन कर रहे थे। हालांकि, शासन पर मुगलो की पकड़ कमजोर पड़ने लगा था। कहतें हैं कि मुगल काल में बंगाल प्रांत को सबसे उपजाऊ या अमीर प्रांत माना जाता था। इस्ट इंडिया कंपनी बंगाल से नमक, चावल, नील, काली मिर्च, चीनी, रेशम के वस्त्र, सूती वस्त्र और हस्तशिल्प के कई अन्य वस्तु बंगाल से यूरोप ले जाते थे। यानी इन वस्तुओं का व्यापार करते थे। ईस्ट इंडिया कंपनी ने वर्ष 1690 में मुगल बादशाह के साथ एक समझौता किया था। इस समझौता के तहत बंगाल से व्यापार करने की उन्हें अनुमति मिल गई थीं। यहां आपको बतादें उनदिनो बंगाल का मतलब सिर्फ पश्चिम बंगाल नहीं था। बल्कि, पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त आज का बांग्लादेश, बिहार और ओडिशा भी बंगाल प्रांत का हिस्सा हुआ करता था।

अमीर प्रांत हुआ करता था बंगाल

इस्ट इंडिया कंपनी के लिए बंगाल का कितना महत्व था। इसको समझने के लिए कंपनी के टर्न ओवर को समझना होगा। दरअसल, एशिया में इस्ट इंडिया कंपनी के व्यापार का करीब 60 फीसदी हिस्सा अकेले बंगाल से होता था। उनदिनो ब्रिटिश कंपनी बंगाल से करीब 50 हजार पाउंड का कारोबार करती थी। सिर्फ कर के रूप में मुगल शासक को करीब 350 पाउंड या तीन हजार रुपये कर यानी टैक्स मिलता था। उनदिनो यह बड़ी रकम हुआ करती थीं। इससे आप बंगाल के समृद्धि को समझ सकते है। यह गुलामी से पहले का बंगाल था। कहतें है कि इसी समृद्धि की वजह से बंगाल पर अंग्रेजो की गिद्ध दृष्टि पड़ी और इन्हीं कारणो से बंगाल पर कब्जा करने के लिए इस्ट इंडिया कंपनी ने रणनीति बनाना शुरू कर दिया।

आपसी कलह बना कारण

बात तब कि है जब बंगाल के नवाब हुआ करते थे अलीवर्दी खान। अलीवर्दी खान की मृत्यु के बाद सिराजुद्दौला को उनका उत्तराधिकारी बाना कर नवाब की गद्दी पर बैठा दिया गया। सिराजुद्दौला बंगाल के नवाब तो बन गए। पर, उनके दरबार में शामिल कई दरबारियों को यह पसंद नही था। दरअसल, अलीवर्दी खान से पहले मुर्शिद कुली खान बंगाल के दिवान हुआ करते थे। कायदे से मुर्शिद कुली खान के बड़े पुत्र सरफराज खान को बंगाल की दिवानी मिलनी थी। किंतु, अलीवर्दी खान ने सरफराज खान की हत्या करके गद्दी पर कब्जा कर लिया था। इस घटना के बाद मुर्शिद कुली खान के समर्थको में असंतोष था। अलीवर्दी खान ने उस असंतोष को दबा दिया और शासन करने लगे। अलीबर्दी खान के मृत्यु के बाद जब सिरजुद्दौला को विरासत में गद्दी मिला तो असंतोष एक बार फिर से सिर उठाने लगा। इस बीच इस्ट इंडिया कंपनी ने कर्नाटक के नवाब को अपना कटपुतली बना कर अपनी ताकत बढ़ा रहे थे। अब बारी बंगाल की थी। कंपनी के अधिकारी बंगाल में मनमानी करने लगे और कलकत्ता की किलाबंदी शुरू कर दी।

कलकत्ता का ब्लैक होल कांड

इधर, सिराजुद्दौला बंगाल को कर्नाटक नहीं बनने देना चाहते थे। नतीजा, नवाब अपनी सेना लेकर कलकत्ता की ओर कूच कर गए। जून 1756 में नवाब की सेना ने कंपनी की सेना को खदेड़ दिया और फोर्ट विलियम को कंपनी के कब्ज़ा से मुक्त करा लिया। इस लड़ाई में 146 ब्रिटिश सैनिक को नवाब की सेना ने कैद कर लिया था। जिसको नवाब के आदेश पर 20 जून 1756 को कलकत्ता की एक छोटे सी काल कोठरी में कैद कर लिया गया। यह कोठरी बहुत ही छोटी थी। नतीजा, 123 कैदियों की दम घुटने से मौत हो गई। इस घटना को इतिहास में कलकत्ता ब्लैक होल कांड के नाम से जाना जाता है। ब्रिटिश सैनिको की दमघोटू मौत की खबर मिलते ही कंपनी के अधिकारी बौखला गए और नवाब से बदला लेने की योजना बनाने लगे। अभी तक यह तय हो गया था कि आमने-सामने की लड़ाई में रिराजुद्दौला को हराना कंपनी के लिए आसान नही था। नतीजा, अंग्रेजो ने रिराजुद्दौला को पराजित करने के लिए छल का सहारा लिया।

अंग्रेजो ने लिया छल का सहारा

कंपनी ने मद्रास में तैनात अपने सबसे चतुर सैनिक अधिकारी रॉबर्ट क्लाइव को बंगाल बुला लिया। बंगाल पहुंचते ही रॉबर्ट क्लाइव ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। उसने सबसे पहले सिराजुद्दौला के सैनिक अधिकारी मीर ज़ाफर से संपर्क किया और मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाने की ऑफिर दे दी। मीर जाफर को यह ऑफर पसंद आया और उसने रॉबर्ट क्लाइव से एक गुप्त समझौता कर लिया। इधर, सिराजुद्दौला इस पुरे घटनाक्रम से बेखबर थे। नतीजा, 1757 में प्लासी के मैदान में हुए युद्ध में सिराजुद्दौला की बुरी पराजय हुई। जब सिराजुद्दौला मैदान छोड़ कर भागने लगे। तो, मीर ज़ाफर के पुत्र मीरन ने सिराजुद्दौला पर पीछे से वार करके उनकी हत्या कर दी। इस तरह इस्ट इंडिया कंपनी ने प्लासी की लड़ाई जीत ली। यह युद्ध भारत में अंग्रेज़ों के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ। इसके बाद बंगाल में अंग्रेज़ों की राजनीतिक और सैन्य सर्वोच्चता स्थापित हो गई। यही से भारत में अंग्रेजो की गुलामी का दौर भी शुरू हो गया, जो अगले 200 वर्षो तक हमारा शोषण करता रहा। हालांकि, इसमें अभी कुछ रुकाबटे थीं।

अपनो की गद्दारी बना हार का कारण

दरअसल अंग्रेजो की यह जीत हमारे ही कुछ अपनो की गद्दारो की वजह से हुई। गौर करने वाली बात ये है कि कालांतर में हम सभी गुलाम हो गए। आजादी के 75 वर्षो बाद आज भी यह सिलसिला थमा नहीं है। आज भी हमारे बीच के कुछ लोग विदेशी ताकतो के प्रलोभन में आकर अपने ही देश के खिलाफ चल रही साजिश का हिस्सा बन रहें हैं। कई बार यह काम हम अनजाने में भी कर देते है। प्लासी के युद्ध में हमारे लिए बहुत बड़ी सीख छिपा है। इसको सिर्फ अंग्रेजो की धोखेबाजी समझना, नादानी होगा। दरअसल, हर वो दुश्मन मुल्क इसी तरह की चालें चलती है। झांसे में आने वाला राष्ट्र बर्बाद हो जाता है।

बर्तमान भी इससे अछूता नही है

इतिहास ऐसे उदहरणो से भरा पड़ा है। इतिहास को छोड़िए। आप वर्तमान में यूक्रेन को देख लीजिए। युद्ध शुरू होने से पहले अमेरिका समेत नाटो के 30 देश यूक्रेन को सैनिक मदद का भरोसा दे रहे थे। इसी के दम पर यूक्रेन जैसा छोटा देश रूस जैसी महाशक्ति को आंख दिखाने लगा। आज यूक्रेन करीब- करीब बर्बाद हो चुका है। अब अमेरिका क्या कर रहा है? दरअसल, अमेरिका अपने लिए हथियार का बाजार तलाश रहा है। कच्चे तेल पर एकछत्र राज कायम करने के लिए आर्थिक प्रतिबंध लगा रहा है। इससे यूक्रेन को क्या मिलेगा? यूक्रेन तो बर्बाद हो रहा है या बर्बाद हो चुका है। इसके बाद भी हम नहीं समझ पाए। तो, शायद देर हो जायेगी।

जमींदारी पर किया कब्जा

आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि मीर जाफर का क्या हुआ? बेशक, प्लासी का युद्ध जीतने के बाद रॉबर्ट क्लाइव ने शर्तो के साथ मीर ज़ाफर को बंगाल का नवाब बना दिया। पर, नवाब को अपनी सेना रखने के अधिकार से बंचित कर दिया गया। ताकि, वह भविष्य में इस्ट इंडिया कंपनी का कटपुतली बना रहे। इसके अतिरिक्त रॉर्बट क्लाइव ने प्लासी के युद्ध में कंपनी को हुए खर्चा की भरपाई करने के लिए बंगाल के 24 परगना की जमींदारी अपने पास रख ली। कंपनी इतने से संतुष्ठ नहीं थी। धीरे-धीरे कंपनी की मांग बढ़ने लगी। मांगे इतनी बढ़ गई कि मीर ज़ाफर के लिए उसकी भरपाई करना मुश्किल होने लगा। जब मीर जाफर ने कंपनी की मांगो को पूरा करने से इनकार किया तो कंपनी बहादुर ने तत्काल ही मीर जाफर को गद्दी से उतार दिया और उसी के दामाद मीर कासिम को गद्दी पर बैठा दिया गया। यानी बंगाल की स्थिति अब कर्नाटक से भी बदतर होने लगा था।

मुर्शिदावाद से मुंगेर का सफर

मतलब साफ है कि नवाब चाहे कोई हो। हुकूमत इस्ट इंडिया कंपनी की चलेगी। मीर कासिम इस बात को समझ गया था। नतीजा, उसने भी वहीं चाल चलनी शुरू कर दी। बंगाल के प्रशासन में बदलाव करने शुरू कर दिए। सबसे पहले वर्ष 1762 में मीर कासिम ने बंगाल की राजधानी को मुर्शिदाबाद से हटा कर मुंगेर शिफ्ट कर दिया। मुंगेर आज के बिहार का हिस्सा है। उनदिनो बंगाल का हिस्सा हुआ करता था। मीर कासिम को लगा कि मुंगेर पर नजर रखना अंग्रेजो के लिए आसान नहीं होगा। मुंगेर पहुंचते ही मीर कासिम ने गुपचुप तरिके से सेना इखट्ठा करनी शुरू कर दी। उसको पता था कि आगे चल कर कंपनी से टकराव होना तय है। हालांकि, सेना अभी पूरी तरिके से तैयार नहीं हुआ था। इस बीच मीर कासिम ने एक गलती कर दी। जल्दीबाजी में उसने कंपनी को व्यापार कर देने का फरमान जारी किया। इससे रॉबर्ट क्लाइव भड़क गया। रॉबर्ट क्लाइव ने मीर कासिम पर हमला बोल दिया।

बक्सर के युद्ध में मिली पराजय

कंपनी की सेना ने कटवा, मुर्शिदाबाद, गिरिया, सूटी होते हुए मुंगेर पर धावा बोल दिया। इधर, मीर कासिम इसके लिए तैयार नहीं थे। नतीजा, मीर कासिम ने अपनी जान बचाने के लिए मैदान छोड़ दी और मुंगेर से भाग कर अवध पहुंच गया। उनदिनो शुजा-उद-दौला अवध के नवाब हुआ करते थे। उनकी मदद से मीर कासिम ने मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय से संपर्क किया और बंगाल पर फिर से कब्जा करने की रणनीति बनाई। मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय ने बंगाल को इस्ट इंडिया कंपनी से आजाद कराने के लिए शाही सेना की एक टुकड़ी, बंगाल के लिए रवाना कर दिया। आगे चल कर इस टुकड़ी में अवध की सेना भी शामिल हो गई। इधर, इस्ट इंडिया कंपनी को इस बात की भनक मिल गई थी। कंपनी ने हेक्टर मुनरो के नेतृत्व में अपनी सेना को इखट्ठा करके युद्ध की तैयारी शुरू कर दी। यह बात वर्ष 1763 की है। बक्सर के समीप दोनो सेना के बीच घनघोर युद्ध हुआ। हेक्टर मुनरो ने चालाकी से लड़ते हुए मुगल सेना को पराजित कर दिया। इस युद्ध को इतिहास में बक्सर के युद्ध के नाम से जाना जाता है। इसी के साथ बंगाल में कटपुतली नवाब रखने की परंपरा का अंत हुआ और भारत में कंपनी हुकूमत की शुरूआत हो गई।

इलावाद समझौता हुआ घातक

रही सही कसर 1765 में पुरा हुआ। बक्सर के युद्ध के बाद 1765 में शांति की वहाली के लिए मुगल सम्राट ने इलाहावाद यानी आज के प्रयागराज में इस्ट इंडिया कंपनी से एक समझौता किया। इस समझौता के तहत मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय ने बंगाल को इस्ट इंडिया कंपनी के हवाले कर दिया। इसके बाद इस्ट इंडिया कंपनी ने रॉबर्ट क्लाइव को बंगाल का पहला गर्वनल जनरल नियुक्त किया और बंगाल में इस्ट इंडिया कंपनी की वैध हुकूमत की नींब पड़ गई। यही से भारत में कंपनी राज की शुरूआत हो गई। जो, आगे चल कर धीरे- धीरे पूरे भारत को अपनी गिरफ्त में लेता चला गया।

कुछ लोगो की लालच से पूरा देश हुआ गुलाम

कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि मीर जाफर लालच में नहीं आया होता और सिराजुद्दौला के साथ धोखा नहीं हुआ होता तो, बंगाल की सत्ता कभी भी इस्ट इंडिया कंपनी के हाथो में नही गई होती। शायद भारत भी गुलाम नहीं होता। पर, यह सभी कुछ हुआ और लालच की वजह से हुआ। अब लालच का परिणाम देखिए। बेशक थोड़े दिनो के लिए मीर जाफर बंगाल का नवाब बना। पर, जल्दी ही सत्ता से बेदखल हो गया। दूसरी ओर अंग्रेजो ने बड़ी ही चलाकी से पहले बंगाल और बाद में धीरे- धीरे पूरे भारत पर कब्जा कर लिया। चंद लालची लोगो की वजह से पूरा भारत गुलाम हो गया। ऐसे लालची लोग आज भी हमारे बीच मौजूद है। जो, क्षणिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए पूरे देश को बर्बाद करने पर तुले हुए है। समय रहते ऐसे लोगो की पहचान नहीं हुई तो खामियाजा हम सभी को भुगतना पड़ेगा।

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