मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर लिमिटेड द्वारा 6 साल तक की गई एक व्यापक स्टडी ने भारतीयों में विटामिन D की कमी के बारे में चौंकाने वाले तथ्य सामने रखे हैं। इस स्टडी का उद्देश्य भारतीयों में विटामिन D की कमी को पहचानना और इस कमी के कारणों को समझना था। इन परिणामों ने इस महत्वपूर्ण पोषक तत्व की कमी के खतरे को उजागर किया और इस पर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता को रेखांकित किया।
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स्टडी का उद्देश्य और विवरण
मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर, भारत की एक प्रमुख डायग्नोस्टिक फर्म, ने यह स्टडी भारत में विटामिन D की कमी की स्थिति का विश्लेषण करने के लिए की। इस अध्ययन में विभिन्न आयु समूहों, भौगोलिक क्षेत्रों और जीवनशैली के पैटर्न को ध्यान में रखते हुए हजारों नमूनों का विश्लेषण किया गया। स्टडी का मुख्य उद्देश्य विटामिन D की कमी का पता लगाना और इसके कारणों को समझना था।
मुख्य परिणाम
1. विटामिन D की कमी का उच्च प्रसार
स्टडी ने यह खुलासा किया कि भारत की एक बड़ी जनसंख्या विटामिन D की कमी से जूझ रही है। अध्ययन के मुताबिक, भारत में लगभग 9 में से 8 लोग विटामिन D की कमी से प्रभावित हैं, जबकि देश में पर्याप्त धूप है। यह चौंकाने वाली स्थिति विभिन्न कारणों से उत्पन्न हुई है, जिनमें घर के अंदर रहने की आदतें, सीमित धूप में समय बिताना, और सांस्कृतिक प्रथाएँ शामिल हैं।
2. इनडोर लाइफस्टाइल का प्रभाव
शहरीकरण के साथ, लोग अधिकतर समय घर के अंदर बिताते हैं, खासकर काम और अन्य कार्यों के कारण। यह आदत विटामिन D के प्राकृतिक संश्लेषण में रुकावट डालती है। घर के अंदर रहने से धूप में कम समय बिताया जाता है, जिससे शरीर विटामिन D का उत्पादन करने में असमर्थ होता है।
3. प्रदूषण का प्रभाव
भारत के कई शहरी इलाकों में प्रदूषण की अधिकता है, जो सूर्य की पराबैंगनी बी (UVB) किरणों को अवरुद्ध करती है। ये किरणें विटामिन D के उत्पादन के लिए आवश्यक होती हैं। प्रदूषण के कारण, सूर्य की किरणें त्वचा में विटामिन D के संश्लेषण को बाधित करती हैं।
4. सांस्कृतिक आदतें और आहार
कुछ सांस्कृतिक प्रथाएँ और आहार की आदतें भी विटामिन D की कमी को बढ़ावा देती हैं। उदाहरण के लिए, सूरज की किरणों से बचने के लिए सनस्क्रीन का अत्यधिक प्रयोग और विटामिन D से भरपूर खाद्य पदार्थों की कमी इस समस्या को और बढ़ाते हैं।
स्वास्थ्य पर प्रभाव
विटामिन D हड्डियों के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह कैल्शियम के अवशोषण में मदद करता है। इसकी कमी से हड्डियाँ कमजोर हो सकती हैं, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसके अलावा, हालिया शोध में यह भी पाया गया है कि विटामिन D की कमी से शरीर में इंफेक्शन की संवेदनशीलता बढ़ सकती है, और मांसपेशियों की कमजोरी भी हो सकती है। इसके अतिरिक्त, निम्न स्तर पर विटामिन D से दिल की बीमारियों और मधुमेह जैसी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
सुझाव और उपाय
1. धूप में समय बिताना
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि हर व्यक्ति को रोजाना थोड़ी देर धूप में समय बिताना चाहिए, ताकि विटामिन D का उत्पादन हो सके। 15 से 30 मिनट की धूप में समय बिताना विटामिन D के स्तर को बढ़ाने के लिए पर्याप्त होता है।
2. आहार में बदलाव
विटामिन D से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन बढ़ाना चाहिए। मछली, अंडे, और फोर्टिफाइड डेयरी प्रोडक्ट्स विटामिन D के अच्छे स्रोत हैं। इनका आहार में समावेश विटामिन D की कमी को दूर करने में मदद कर सकता है।
3. सप्लीमेंटेशन
अगर सूरज की रोशनी या आहार से विटामिन D की कमी पूरी नहीं हो पा रही है, तो विटामिन D के सप्लीमेंट्स का सेवन किया जा सकता है। हालांकि, किसी भी प्रकार के सप्लीमेंट लेने से पहले डॉक्टर से परामर्श लेना जरूरी है।
4. जन जागरूकता अभियानों की आवश्यकता
विटामिन D की कमी और इसके खतरों के बारे में जन जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है। स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक स्थानों पर जागरूकता अभियान चलाए जा सकते हैं, ताकि लोग इस कमी के बारे में अधिक जान सकें और इसका समाधान ढूंढ सकें।
मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर की छह साल की स्टडी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत में विटामिन D की कमी एक गंभीर समस्या है। हालांकि, भारत में पर्याप्त सूर्य की रोशनी है, फिर भी जीवनशैली और पर्यावरणीय कारणों के कारण इस कमी का प्रसार बढ़ा है। अगर हम सही उपायों को अपनाएँ और जन जागरूकता बढ़ाएँ, तो विटामिन D की कमी के स्वास्थ्य पर प्रभाव को कम किया जा सकता है। इससे ना केवल हड्डियों की सेहत में सुधार होगा, बल्कि अन्य स्वास्थ्य समस्याओं को भी रोका जा सकेगा।
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