रेबीज संक्रमित गाय के दूध से जुड़ा स्वास्थ्य संकट
KKN ब्यूरो। भारत में 2025 में एक चौंकाने वाली घटना सामने आई जब ग्रेटर नोएडा की एक महिला की मौत रेबीज से संक्रमित गाय का दूध पीने के कारण हो गई। यह घटना एक असामान्य लेकिन गंभीर स्वास्थ्य खतरे की ओर इशारा करती है। हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), अमेरिकी रोग नियंत्रण केंद्र (CDC), और भारत के राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) का स्पष्ट मत है कि दूध के माध्यम से रेबीज का संचरण वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं है, फिर भी सावधानी के तौर पर टीकाकरण की सलाह दी जाती है क्योंकि रेबीज की मृत्यु दर लगभग 100% है।
Article Contents
बिहार में आवारा कुत्तों की संख्या 14 से 24 लाख के बीच अनुमानित है, और 2022-23 में कुत्ते के काटने के मामले 9,809 से बढ़कर 2,07,181 हो गए – यानी 2000% की वृद्धि। यह आंकड़ा इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है। इस व्यापक शोध रिपोर्ट में हम बिहार और भारत के अन्य हिस्सों में हुई घटनाओं, वैज्ञानिक साक्ष्यों, सरकारी कार्रवाई, और बचाव के उपायों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं।
ग्रेटर नोएडा: पहली पुष्ट मृत्यु का मामला
मार्च 2025 में ग्रेटर नोएडा के जेवर इलाके के थोरा गांव से भारत का सबसे चर्चित मामला सामने आया। 40 वर्षीय सीमा नाम की महिला की मृत्यु रेबीज संक्रमण से हो गई जब उसने एक ऐसी गाय का दूध पिया जिसे पागल कुत्ते ने काटा था। गाय ने दो महीने पहले बछड़े को जन्म दिया था और सीमा ने प्रसव के तुरंत बाद निकलने वाले पहले दूध (खीज) का सेवन किया था। जब गाय में रेबीज के लक्षण दिखने लगे, तो परिवार के अन्य सदस्यों ने टीका लगवा लिया, लेकिन सीमा ने टीकाकरण नहीं कराया।
कुछ दिनों बाद सीमा को पानी और रोशनी से डर लगने लगा – रेबीज के विशिष्ट लक्षण। परिजन उसे जेवर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, फिर सेक्टर-39 जिला अस्पताल, और बाद में दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले गए, लेकिन कई अस्पतालों ने उसे भर्ती करने से मना कर दिया। अंततः दिल्ली के बसंतकुंज के एक अस्पताल में डॉक्टरों ने रेबीज की पुष्टि की और उसे घर भेज दिया। उसकी घर में ही मौत हो गई। इस घटना के बाद कम से कम 10 ग्रामीणों ने एहतियातन रेबीज का टीका लगवाया।
गोरखपुर: 200 ग्रामीणों में दहशत
नवंबर 2025 में गोरखपुर जिले के रामडीह गांव में एक और बड़ी घटना हुई जब रेबीज से संक्रमित गाय के दूध से बने पंचामृत का सेवन लगभग 200 ग्रामीणों ने धार्मिक अनुष्ठान में किया। गाय को तीन महीने पहले एक आवारा कुत्ते ने काट लिया था। मालिक सुशील गौड़ ने जागरूकता दिखाते हुए गाय को तुरंत एंटी रेबीज वैक्सीन दिलवाई, लेकिन जानकारी के अभाव में पूरा इलाज नहीं कराया। धीरे-धीरे गाय में रेबीज के लक्षण दिखने लगे और वह अजीबोगरीब हरकतें करने लगी।
29 अक्टूबर और 2 नवंबर को आयोजित दो पूजा समारोहों में इस गाय के कच्चे दूध से बने पंचामृत का उपयोग किया गया। जब शनिवार को गाय की मौत हो गई, तब ग्रामीणों को एहसास हुआ कि उन्होंने संक्रमित गाय के दूध से बना प्रसाद ग्रहण किया था। उरुवा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर ग्रामीणों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी और 170 से अधिक लोगों ने रेबीज वैक्सीन की पहली डोज ले ली। चिकित्सक डॉ. ए.पी. सिंह ने बताया कि एहतियात के तौर पर पंचामृत ग्रहण करने वाले हर व्यक्ति को रेबीज वैक्सीन की तीन डोज दी जाएगी।
सिवान: 27 लोग प्रभावित
फरवरी 2023 में बिहार के सिवान जिले के बघौना गांव में दो दर्जन से अधिक लोग रेबीज से संक्रमित गाय का दूध पीने से प्रभावित हुए। रामाशंकर पांडेय की गाय को किसी पागल कुत्ते ने काट लिया था जिसे लोगों ने नहीं देखा। उनके यहां बरसी (श्राद्ध समारोह) का आयोजन था जिसमें गांव के अलावा परिजन व रिश्तेदार शामिल हुए। जिन लोगों ने उस गाय का दूध पिया, वे संक्रमित हो गए।
संक्रमितों में जनक पांडेय, अनुप पांडेय, प्रभावती देवी, मिथिलेश कुमार, महराजगंज के अमित दुबे, पंजवार की मालती देवी के अलावा अतुल कुमार, जितेंद्र पांडेय, वृजभूषण, आयुष, विकास सहित लगभग 27-28 लोग शामिल थे। सभी लोग रेफरल अस्पताल पहुंचे जहां डॉ. यासीन अंसारी ने सभी को इलाज के बाद एंटी रेबीज का इंजेक्शन देकर सतर्कता बरतने का निर्देश दिया। यह संख्या और भी बढ़ सकती थी क्योंकि अभी सभी प्रभावित लोगों की पहचान नहीं हो पाई थी।
छत्रपति संभाजीनगर: 170 ग्रामीणों का टीकाकरण
जुलाई 2025 में महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व में औरंगाबाद) जिले के बिदकिन गांव में एक बछड़े की मौत रेबीज से होने की आशंका के बाद 170 ग्रामीणों ने रेबीज के टीके लगवाए। किसान भाऊसाहेब मेटे ने नोटिस किया कि उनका बछड़ा अस्वस्थ था। स्थानीय पशु चिकित्सक ने जांच के बाद बताया कि बछड़ा रेबीज से संक्रमित प्रतीत होता है, संभवतः किसी पागल कुत्ते के काटने से। बछड़े की मौत हो गई।
ग्रामीणों को डर था कि बछड़े ने अपनी मां से दूध पीते समय संक्रमण फैलाया हो और उस गाय का दूध दूषित हो सकता है। एहतियातन, मेटे ने उन पांच परिवारों को सूचित किया जिन्हें वह दूध देते थे। शनिवार तक 170 ग्रामीणों ने बिदकिन ग्रामीण अस्पताल में रेबीज के टीके लगवाए, जबकि 25 अन्य लोगों ने निलाजगांव ग्रामीण अस्पताल में टीका लगवाया। कई अन्य लोगों ने निजी अस्पतालों में उपचार लिया। डॉ. प्रणिति म्हात्रे, बिदकिन ग्रामीण अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञ ने कहा, “बछड़े की रेबीज से मौत से गांव में दहशत फैल गई। जिन लोगों ने गाय का दूध पिया था, उन्हें डर था कि वे संक्रमित हो सकते हैं और कई लोग अस्पताल पहुंच गए”।
औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में रेबीज संक्रमित कुत्तों द्वारा काटी गई गायों के दूध का उपभोग करने से 80 लोगों के बीमार होने का मामला भी सामने आया है। गुजरात में भी रेबीज से संक्रमित मवेशियों की मौत की रिपोर्ट आई है, हालांकि विस्तृत विवरण सीमित है।
क्या दूध से रेबीज फैल सकता है
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अपनी 2018 की विशेषज्ञ परामर्श रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा है: “संक्रामक रेबीज वायरस (RABV) को पागल गायों के दूध से अलग नहीं किया गया है, और कच्चे दूध के सेवन से किसी भी मानव रेबीज मामले का श्रेय नहीं दिया गया है। हालांकि पागल पशु से कच्चे दूध पीने की सलाह नहीं दी जाती है, लेकिन इससे RABV के संपर्क में आने का कोई सबूत नहीं है, और पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (PEP) की सलाह नहीं दी जाती है। पाश्चुरीकृत दूध रेबीज वायरस संचरण के लिए कोई जोखिम प्रस्तुत नहीं करता है”।
अमेरिकी रोग नियंत्रण केंद्र (CDC) ने मार्च 1999 की एक रिपोर्ट में मैसाचुसेट्स में हुई दो घटनाओं का उल्लेख किया – 1996 में 66 लोगों ने और 1998 में 14 लोगों ने रेबीज से संक्रमित गायों का बिना पाश्चुरीकृत दूध पिया। रिपोर्ट में कहा गया कि “बिना पाश्चुरीकृत दूध में रेबीज वायरस का संचरण सैद्धांतिक रूप से संभव है”, लेकिन साथ ही यह भी उल्लेख किया कि इन मामलों में बाद में कोई भी मानव रेबीज मामला इन संपर्कों से जुड़ा नहीं पाया गया। अत्यधिक सावधानी के तौर पर, रेबीज की लगभग 100% घातकता दर को देखते हुए, स्वास्थ्य अधिकारियों ने सभी प्रभावित व्यक्तियों को PEP वैक्सीन दी।
भारतीय राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) की राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम की FAQ वेबसाइट पर स्पष्ट रूप से लिखा है: “यह दिखाने के लिए कोई प्रयोगशाला या महामारी विज्ञान साक्ष्य नहीं है कि रेबीज दूध या दूध उत्पादों के सेवन के माध्यम से फैलता है। इसलिए, रेबीज से संक्रमित जानवरों के किसी भी दूध या दूध उत्पादों के सेवन के लिए PEP की आवश्यकता नहीं है”। मांस के सेवन पर भी वेबसाइट कहती है: “पागल जानवर के बिना पके मांस के सेवन के बाद किसी मानव मामले का दस्तावेजीकरण नहीं किया गया है”।
भारतीय चिकित्सा विशेषज्ञों की राय
इंडिया टुडे डिजिटल ने आंतरिक चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. अनुज तिवारी से बात की। संक्रमित मवेशियों के दूध से रेबीज हो सकता है या नहीं, इस सवाल पर डॉ. तिवारी ने कहा, “पाश्चुरीकृत दूध, नहीं। यहां तक कि कच्चा दूध में भी, कम संभावना है क्योंकि रेबीज वायरस पेट के एसिड द्वारा नष्ट हो जाएगा”। हालांकि, रेबीज की लगभग 100% घातक प्रकृति को देखते हुए, डॉक्टर हमेशा PEP टीकाकरण शुरू करने और तुरंत चिकित्सक से परामर्श करने की सलाह देते हैं।
DHEE अस्पतालों के सलाहकार चिकित्सक डॉ. श्रीनिवास जनम के अनुसार, ICAR की एक रिपोर्ट बताती है कि सामान्य परिस्थितियों में गाय के दूध में रेबीज वायरस नहीं होता है। केवल अत्यंत दुर्लभ और असंभावित मामलों में ही यह संभव है।
दूध में रेबीज वायरस की उपस्थिति का वैज्ञानिक विश्लेषण
रेबीज एक न्यूरोलॉजिकल बीमारी है जो संक्रमित जानवर की लार के माध्यम से फैलती है, आमतौर पर काटने से, जिससे वायरस तंत्रिका तंत्र में केंद्रित हो जाता है। वैज्ञानिक सर्वसम्मति स्पष्ट रूप से स्थापित करती है कि एक गंभीर रूप से संक्रमित जानवर में भी, दूध में वायरस की उपस्थिति अत्यंत दुर्लभ है और यदि मौजूद है, तो केवल न्यूनतम, कम सांद्रता में होती है।
तापीय निष्क्रियता: रेबीज वायरस ताप उपचार के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। 1976 के एक वैज्ञानिक अध्ययन में पाया गया कि रेबीज वायरस को 56°C पर 15 मिनट से कम समय में 10,000 गुना से अधिक कम किया जा सकता है। मानक वाणिज्यिक पाश्चुरीकरण प्रोटोकॉल – 72°C (161°F) पर 15 सेकंड (HTST) या 63°C (145°F) पर 30 मिनट (बैच) – वायरस को तुरंत नष्ट कर देते हैं। यह प्रसंस्करण चरण जानवर की स्वास्थ्य स्थिति की परवाह किए बिना, कच्चे उत्पाद को एक सुरक्षित उपभोग्य वस्तु में बदलने के लिए एक व्यापक और लगभग पूर्ण अवरोध के रूप में कार्य करता है।
घरेलू उबालना: घरेलू स्तर पर दूध को उबालना (100°C पर) भी पूर्ण वायरल निष्क्रियता प्रदान करता है। भारत में परंपरागत रूप से दूध को उपभोग से पहले उबाला जाता है, जो एक अतिरिक्त सुरक्षा परत प्रदान करता है।
कच्चे दूध का सैद्धांतिक जोखिम: बिना पाश्चुरीकृत दूध के सेवन से एक सूक्ष्म, गैर-नगण्य जोखिम है, लेकिन केवल अत्यधिक विशिष्ट परिस्थितियों में: यदि उपभोक्ता के मुंह या जठरांत्र पथ में पहले से कोई घाव, खुला घाव, या क्षति है। म्यूकोसल बाधा में ऐसा टूटना, सिद्धांत रूप में, वायरस को सीधे रक्तप्रवाह या तंत्रिका तंत्र में प्रवेश करने की अनुमति दे सकता है।
बिहार में चिंताजनक स्थिति
बिहार में आवारा कुत्तों की समस्या एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन गई है। पशुपालन मंत्रालय की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार बिहार में 14 लाख से 24 लाख के बीच आवारा कुत्ते होने का अनुमान है। राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24 के आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं: कुत्ते के काटने के मामले 2021-22 में 9,809 से बढ़कर 2022-23 में 2,07,181 हो गए – यानी लगभग 2000% (200 गुना) की वृद्धि। औसतन प्रतिदिन 600 लोग कुत्तों के हमलों का शिकार होते हैं, जिसमें पटना जिला में सबसे अधिक 22,599 मामले दर्ज किए गए।
इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम (IDSP) के आंकड़ों के अनुसार रेबीज से मौतें अपेक्षाकृत कम रहीं – 2022 में एक, 2023 में तीन, और 2024 में दो मौतें दर्ज की गईं। हालांकि, जोखिम बना हुआ है और मामलों की संख्या कम रिपोर्टिंग या गलत निदान के कारण वास्तविकता से कम हो सकती है।
पटना में निलंबित नसबंदी कार्यक्रम
पटना में स्थिति और भी गंभीर है क्योंकि राजधानी में नसबंदी और टीकाकरण अभियान एक वर्ष से अधिक समय से निलंबित है। बिहार का पशु जन्म नियंत्रण (ABC) कार्यक्रम, जो नसबंदी और रेबीज टीकाकरण के माध्यम से आवारा आबादी का प्रबंधन करने के लिए डिजाइन किया गया था, अपर्याप्त आश्रयों, प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी, और धन के कथित दुरुपयोग के कारण सीमित सफलता देखी गई है।
पटना में, नसबंदी का प्रबंधन पटना रिसर्च एंड वेलफेयर सेंटर (PRWC) नामक NGO द्वारा ‘पशु मित्र’ योजना के तहत पटना नगर निगम (PMC) के साथ साझेदारी में किया जाता था। कार्यक्रम, जो प्रति जानवर 1,000 रुपये की लागत पर प्रतिदिन 30 कुत्तों को लक्षित करता था, पिछले साल रुक गया जब पीपल फॉर एनिमल्स (PFA) ने क्रूरता और एक ब्लैकलिस्टेड ठेकेदार के उपयोग का आरोप लगाते हुए जनहित याचिका दायर की।
सितंबर 2025 में, राजस्थान की एक NGO संतुलन जीव कल्याण ने पटना में नसबंदी और टीकाकरण करने का टेंडर हासिल किया। पशु कल्याण बोर्ड ऑफ इंडिया (AWBI) ने 4 सितंबर 2025 को संगठन को ABC कार्यक्रम के लिए मंजूरी दी। संगठन प्रतिदिन 30 कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण के लिए 15 कर्मियों की एक टीम तैनात करेगा। यह पहल, जो 2028 तक चलेगी, क्षेत्र में आवारा कुत्तों की आबादी को कम करने और रेबीज के प्रसार को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की उम्मीद है।
राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम (NRCP)
केंद्र सरकार ने रेबीज की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम (NRCP) शुरू किया है। कार्यक्रम की रणनीतियों में उचित पशु काटने के प्रबंधन पर प्रशिक्षण, रेबीज की रोकथाम और नियंत्रण, निगरानी और अंतर-क्षेत्रीय समन्वय, पशु काटने की निगरानी को मजबूत करना, राष्ट्रीय मुफ्त दवा पहल के माध्यम से पशु काटने के पीड़ितों के लिए एंटी-रेबीज वैक्सीन की खरीद का प्रावधान, और जागरूकता पैदा करने के लिए सूचना, शिक्षा और संचार (IEC) गतिविधियां शामिल हैं।
कुत्ते-मध्यस्थ रेबीज उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPRE) को स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से 2030 तक भारत से रेबीज उन्मूलन के लक्ष्य के साथ लॉन्च किया गया है। इस योजना में निरंतर सामूहिक कुत्ता टीकाकरण, पूर्व और पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस, और सार्वजनिक शिक्षा के माध्यम से रेबीज जोखिम में व्यवस्थित कमी की परिकल्पना की गई है।
पशु जन्म नियंत्रण नियम 2023
केंद्र सरकार ने पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के तहत पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023 को अधिसूचित किया है, जो आवारा कुत्ते की आबादी के प्रबंधन की सुविधा प्रदान करता है। ये नियम विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित वैश्विक मानकों के अनुरूप हैं और जनसंख्या प्रबंधन के लिए “पकड़ो-नसबंदी-टीकाकरण-रिहाई” विधि को बढ़ावा देते हैं।
स्थानीय निकायों को पशु कल्याण संगठनों के सहयोग से नसबंदी और टीकाकरण कार्यक्रमों को लागू करने का अधिकार दिया गया है। 16 जुलाई 2025 को, पशुपालन और डेयरी, आवास और शहरी मामलों, और पंचायती राज के सचिवों ने संयुक्त रूप से राज्यों से समर्पित पशु जन्म नियंत्रण इकाइयां स्थापित करने और यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि कम से कम 70% आवारा कुत्तों को नसबंदी अभियान के तहत कवर किया जाए।
केंद्र सरकार ने वर्तमान वित्तीय वर्ष से पशु कल्याण बोर्ड ऑफ इंडिया (AWBI) के माध्यम से कार्यान्वित आवारा कुत्तों और बिल्लियों के जन्म नियंत्रण और टीकाकरण के लिए योजना को संशोधित किया है। योजना के तहत, नसबंदी के लिए प्रति कुत्ता 800 रुपये और प्रति बिल्ली 600 रुपये तक की वित्तीय सहायता निर्धारित की गई है।
दूध की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम
पाश्चुरीकृत दूध का सेवन करें: व्यावसायिक रूप से पाश्चुरीकृत दूध पूरी तरह से सुरक्षित है क्योंकि पाश्चुरीकरण की प्रक्रिया (72°C पर 15 सेकंड या 63°C पर 30 मिनट) रेबीज वायरस को पूरी तरह से नष्ट कर देती है। पैकेज्ड दूध आमतौर पर पाश्चुरीकृत होता है और इसे उबालने की आवश्यकता नहीं होती।
कच्चे दूध को हमेशा उबालें: यदि आप स्थानीय डेयरी या दूध वाले से कच्चा दूध खरीदते हैं, तो इसे उपभोग से पहले हमेशा उबालें। उबालना (100°C पर) सभी हानिकारक वायरस और बैक्टीरिया को मार देता है। दूध को उबालते समय, इसे लगातार हिलाते रहें और सुनिश्चित करें कि यह पूरी तरह से उबल जाए।
संदिग्ध पशु के दूध से बचें: यदि आपको पता है कि किसी गाय या भैंस को कुत्ते ने काटा है या वह अजीब व्यवहार कर रहा है (अत्यधिक लार, पानी से डर, आक्रामकता), तो उसके दूध का सेवन तुरंत बंद कर दें और पशु चिकित्सक से परामर्श करें।
पशु काटने के बाद तत्काल कार्रवाई
घाव की तुरंत सफाई: यदि किसी जानवर (कुत्ता, बिल्ली, गाय, बंदर, आदि) ने काटा या खरोंचा है, तो तुरंत घाव को कम से कम 15 मिनट तक साबुन और पानी से अच्छी तरह धोएं। यदि उपलब्ध हो, तो घावों को सिंचित करने के लिए पोविडोन-आयोडीन घोल जैसे विषाणुनाशक एजेंट का उपयोग करें। यह रेबीज वायरस को शरीर में प्रवेश करने से रोकने का पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है।
तुरंत चिकित्सा सहायता लें: घाव धोने के बाद, तुरंत निकटतम सरकारी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र पहुंचें जहां मुफ्त एंटी-रेबीज वैक्सीन उपलब्ध है। देरी जानलेवा हो सकती है क्योंकि रेबीज का कोई इलाज नहीं है एक बार लक्षण दिखने के बाद।
पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (PEP) – जीवन रक्षक टीका
PEP की संरचना: WHO की सिफारिश के अनुसार, पहले कभी टीका न लगवाने वाले व्यक्तियों के लिए PEP में शामिल हैं:
- घाव की सफाई: साबुन और पानी से कम से कम 15 मिनट तक धोना
- ह्यूमन रेबीज इम्यूनोग्लोब्युलिन (HRIG): घाव में और आसपास एक बार (दिन 0 पर) दिया जाता है
- रेबीज वैक्सीन: चार खुराक – दिन 0, 3, 7, और 14 पर (इंट्रामस्क्युलर रूट)
- इंट्राडर्मल रूट: WHO ने लागत प्रभावी इंट्राडर्मल विधि की भी सिफारिश की है – दिन 0, 3, और 7 पर 0.1 मिली की दो-साइट इंजेक्शन
PEP की प्रभावशीलता: यदि सही तरीके से और तुरंत दिया जाए, तो PEP रेबीज को रोकने में 99% से अधिक प्रभावी है। पूर्व में टीका लगवा चुके व्यक्तियों को केवल दो बूस्टर खुराक की आवश्यकता होती है – दिन 0 और 3 पर।
भारत में निःशुल्क उपलब्धता: भारत सरकार राष्ट्रीय मुफ्त दवा पहल के तहत सभी सरकारी अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में मुफ्त एंटी-रेबीज वैक्सीन प्रदान करती है। पटना के न्यू गार्डनर रोड अस्पताल के अधीक्षक डॉ. मनोज कुमार ने कहा: “हम रोजाना लगभग 100 एंटी-रेबीज वैक्सीन देते हैं, जिनमें से 60-70 नए मामले हैं। वैक्सीन केवल सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध है, और घातक संक्रमण को रोकने के लिए समय पर प्रशासन महत्वपूर्ण है”।
पशुओं का टीकाकरण और संरक्षण
पालतू जानवरों का नियमित टीकाकरण: सभी पालतू कुत्तों और बिल्लियों को हर साल रेबीज का टीका लगवाना अनिवार्य होना चाहिए। यह न केवल पालतू जानवरों की सुरक्षा करता है बल्कि परिवार के सदस्यों को भी सुरक्षित रखता है।
गोवंश की सुरक्षा: यदि आपके क्षेत्र में आवारा कुत्तों की समस्या है, तो अपने पशुओं (गाय, भैंस, बछड़े) को रात में सुरक्षित बाड़े में रखें। यदि किसी पशु को कुत्ते ने काटा है, तो तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें और पशु को एंटी-रेबीज वैक्सीन दिलवाएं।
काटे गए पशु की निगरानी: यदि पशु को कुत्ते ने काटा है, तो पशु का बारीकी से निरीक्षण करें। रेबीज के लक्षणों में शामिल हैं: अत्यधिक लार आना, पानी पीने में असमर्थता, आक्रामक या असामान्य व्यवहार, पक्षाघात, और आवाज में परिवर्तन। यदि ऐसे लक्षण दिखें, तो उस पशु के दूध का सेवन तुरंत बंद कर दें और सभी संपर्क में आए लोगों को PEP दिलवाएं।
सामुदायिक स्तर पर रोकथाम
आवारा कुत्तों का नसबंदी और टीकाकरण: अपने स्थानीय नगर निकाय या पशु कल्याण संगठनों से संपर्क करें और ABC कार्यक्रम के तहत आवारा कुत्तों का नसबंदी और टीकाकरण सुनिश्चित करें। अध्ययन दिखाते हैं कि नसबंदी कुत्तों में 80% आक्रामकता को कम करती है। टीकाकरण से कुत्ते रेबीज से सुरक्षित रहते हैं और यदि वे गलती से काट भी दें, तो वे रेबीज नहीं फैला सकते।
जनजागरूकता: अपने गांव या मोहल्ले में लोगों को रेबीज के खतरों, पशु काटने के बाद तुरंत घाव धोने के महत्व, और मुफ्त वैक्सीन की उपलब्धता के बारे में जागरूक करें। धार्मिक समारोहों में कच्चे दूध से बने पंचामृत के उपयोग से पहले यह सुनिश्चित करें कि दूध उबला हुआ या पाश्चुरीकृत है।
निगरानी और निदान की सीमाएं
भारत की रेबीज निगरानी बहुत हद तक नैदानिक निदान पर निर्भर रहती है, केवल कुछ विशेष प्रयोगशालाओं में पुष्टिकरण परीक्षण उपलब्ध है। जानवरों के मामलों में, अधिकांश निदान नैदानिक लक्षणों पर आधारित हैं और पोस्ट-मॉर्टेम प्रयोगशाला पुष्टि दुर्लभ है। यह कम-रिपोर्टिंग और अनुमानित डेटा की ओर ले जाता है।
हाल के वर्षों में, लेटरल फ्लो परीक्षण, रियल-टाइम RT-PCR, और पॉइंट-ऑफ-केयर परीक्षणों जैसे उपकरणों के साथ नैदानिक क्षमताओं में प्रगति हुई है, जो मनुष्यों और जानवरों दोनों में तेज़, अधिक सटीक रेबीज का पता लगाने में सक्षम हैं। हालांकि, इन तकनीकों का ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में व्यापक कार्यान्वयन अभी भी एक चुनौती है।
कार्यान्वयन में अंतर
ABC कार्यक्रम की प्रभावशीलता विभिन्न क्षेत्रों में कार्यान्वयन की चुनौतियों के कारण भिन्न होती है। अपर्याप्त वित्त पोषण, प्रशिक्षित कर्मियों की कमी, बुनियादी ढांचे की कमी, और स्थानीय निकायों की प्रतिबद्धता की कमी प्रमुख बाधाएं हैं। पटना में ABC कार्यक्रम का निलंबन इन चुनौतियों का एक स्पष्ट उदाहरण है।
जनजागरूकता का अभाव
कई घटनाओं में, पशुओं को कुत्ते के काटने के बाद अपूर्ण टीकाकरण या दूध के सेवन से जुड़े जोखिमों की जानकारी न होना प्रमुख कारण रहा है। ग्रेटर नोएडा के मामले में, परिवार के अन्य सदस्यों ने टीका लगवाया लेकिन पीड़िता ने नहीं लगवाया। गोरखपुर में, गाय के मालिक ने शुरुआती टीका दिलवाया लेकिन पूरा कोर्स नहीं कराया।
धार्मिक समारोहों में कच्चे दूध से बने पंचामृत के उपयोग की परंपरा भी एक चुनौती है। समुदायों को शिक्षित करने की आवश्यकता है कि ऐसे अवसरों पर केवल उबले हुए या पाश्चुरीकृत दूध का ही उपयोग किया जाए। भारत ने 2030 तक रेबीज-मुक्त बनने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है।



