बिहार में सियासी बदलाव का लोकसभा चुनाव में क्या असर होगा

नीतीश कुमार के साथ आने से होगा लाभ या साथ साथ छोड़ने से

कौशलेन्द्र झा, KKN न्यूज। बिहार के मुख्यमंत्री और जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार के एनडीए में वापसी के साथ ही लोकसभा चुनाव 2024 के ठीक पहले बिहार की राजनीतिक तस्वीर पूरी तरीके से बदल गई है। विपक्षी इंडिया गठबंधन के शिल्पकार रहे नीतीश कुमार अब बीजेपी नेतृत्व वाले एनडीए का हिस्सा बन चुके हैं। सवाल यह उठता है कि लोकसभा चुनाव की सरगर्मी के बीच नीतीश कुमार के पाला बदलने से किसे नुकसान और किसे फायदा होगा? बहरहाल, नीतीश कुमार के आने के साथ ही एनडीए गठबंधन में बीजेपी, एलजेपी, जीतनराम मांझी की पार्टी हम और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा के अतिरिक्त जदयू शामिल हो चुकी है। जबकि, विपक्षी इंडिया गठबंधन में अब आरजेडी, कांग्रेस और वामपंथी दल ही अब बच गयें हैं। लिहाजा, बिहार में कमोवेश 2019 के लोकसभा चुनाव वाली तस्वीर बनती दिख रही है। हालांकि, एक फर्क यह है कि उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी पिछले चुनाव में महागठबंधन का हिस्सा थे। अब एनडीए का हिस्सा है। मोटे तौर पर बीजेपी के नेतृत्व वाला एनडीए इस बार पहले की तुलना में बड़े कुनबे के साथ मैदान में उतरेगा। किंतु, जदयू के साथ आने का बीजेपी को कितना लाभ मिलेगा? फिलहाल यह बड़ा सवाल है।

सीट शेयरिंग के फॉर्मूला पर पड़ेगा असर

इतना तो तय है कि नीतीश कुमार के एनडीए में शामिल होने से बिहार में लोकसभा चुनाव के दौरान सीट शेयरिंग का फॉर्मूला पूरी तरीके से बदल गया है। बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं। नीतीश कुमार के एनडीए में शामिल होने से पहले बीजेपी, एलजेपी, हम और उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी के बीच सीट बंटनी थी। लेकिन अब नीतीश कुमार के हिस्सा बन जाने के बाद जेडीयू भी एक बड़े भूमिका में होगी। वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव बीजेपी, जेडीयू और एलजेपी मिलकर लड़ी थी। इसमें बीजेपी को 17, जेडीयू को 17 और एलजेपी 6 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। नीतीश कुमार के एनडीए में आने से पहले तक बिहार में बीजेपी कम से कम 30 सीटों पर चुनाव लड़ने की प्लानिंग कर रही थी। अब सवाल उठता हैं कि क्या इस बार फिर से बीजेपी और जेडीयू के बीच बराबर-बराबर सीटों का फॉर्मूला बन सकता है? ऐसे में मांझी, कुशवाहा, चिराग की एलजेपी और पशुपति पारस की पार्टी को कितनी सीटें मिलेगी? यह बड़ा सवाल है। बिहार की राजनीति को समझने वालों का मानना हैं कि यदि बीजेपी और जेडीयू के बीच बराबर- बराबर सीटों का बंटबारा हुआ तो, बदले हुए हालात में एनडीए को इसका नुकसान हो सकता है। क्योंकि, नीतीश कुमार की विश्वसनियता सवालों के घेरे में है।

 मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विश्वसनीयता की होगी परीक्षा

लोकसभा चुनावों से ठीक पहले बिहार में हुए उलटफेर से बिहार में एनडीए के नेता सकते में हैं। इंडिया गठबंधन को जवाब देते नहीं बन रही है। दूसरी और बिहार की प्रमुख दल आरजेडी समेत इंडिया गठबंधन से जुड़े नेता बीजेपी पर हमलावर है। दरअसल, वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान जेडीयू के साथ मिलकर बीजेपी और उसके सहयोगी पार्टियों ने बिहार की 40 लोकसभा सीट में 39 सीटों पर जीत हासिल की थी। अब नीतीश कुमार के दोबारा एनडीए में आने पर बीजेपी उस प्रदर्शन को दोहराने या उससे बेहतर करने की उम्मिदें पाली बैठी है। बीजेपी का टारगेट 50 फीसदी प्लस वोट का है। बिहार में यादव और मुस्लिम मिलकर 35 फीसदी के करीब होता है। इसी समीकरण के बदौलत 2019 में आरजेडी और कांग्रेस ने बीजेपी से मुकाबला किया था। वर्ष 2019 के लोकसभा में मुस्लिम बहुल किशनगंज की महज एक मात्र सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार चुनाव जीत गई थी। जबकि आरजेडी का खाता नहीं खुला था। बहरहाल, बिहार की सियासी समीकरण बदल चुका है। ऐसे में मुश्किलें दोनों गठबंधन के लिए मुंह बायें खड़ी है। इतना तो तय है कि इस लोकसभा चुनाव में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश के विश्वसनीयता की परीक्षा होनी है।

राजनीतिक दलों के बदले जातीय समीकरण

बिहार में नीतीश कुमार के पाला बदलने के चलते गठबंधन का जातीय समीकरण भी बदल गया हैं। बीजेपी सवर्ण वोट बैंक के साथ दलित, ओबीसी और अति पिछड़ा समीकरण के साथ चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। वहीं, महागठबंधन अब मुस्लिम-यादव के साथ दलित और सवर्ण समीकरण को साधने की जुगत करेगी। नीतीश के बीजेपी के साथ जाने से मुस्लिम वोट जेडीयू से छिटक सकता है। पिछड़ा, अति पिछड़ा और दलित वोट बैंक में बीजेपी पहले ही सेंधमारी कर चुकी है। ऐसे में जेडीयू का सियासी स्पेस क्या होगा? राजनीति के इसी गुणा- गणित पर बिहार में एनडीए और इंडिया गठबंधन के किस्मत का फैसला होना है। इतना तो तय है कि बिहार में अचानक हुए सियासी उलटफेर का सर्वाधिक खामियाजा एनडीए के छोटे सहयोगियों को भुगतना पड़ेगा। जाहिर है उपेंद्र कुशवाहा, चिराग पासवान और जीतन राम मांझी की पार्टी के सियासी स्पेस को घटाया जा सकता है। मेरा स्पष्ट मानना हैं कि एनडीए को इसका नुकसान होगा। हालांकि, इस पर अभी कुछ कहना जल्दीबाजी होगी।

तिरहुत के पांच सीटो पर हो सकती है उठापटक

तिरहुत इलाके की सभी पांच लोकसभा सीटों पर कब्जा के लिए ‘इंडिया’ और एनडीए के बीच जबरदस्त मुकावला होने के आसार बनने लगे है। फिलहाल, हाजीपुर, वैशाली, मुजफ्फरपुर और शिवहर में बीजेपी के नेतृत्व वाला एनडीए का कब्जा है। सीतामढ़ी की सीट पर जदयू का कब्जा है। हालांकि, सीतामढ़ी के सांसद सुनील कुमार पिंटू वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी छोड़ कर जेडीयू में शामिल हुए थे। वो सीतामढ़ी से बीजेपी के विधायक भी रह चुकें हैं। वहीं, हाजीपुर की सीट पर रामविलास पासवान की गैर मौजूदगी में उनके पुत्र चिराग पासवान और भाई पशुपति कुमार पारस के बीच घरेलू खींचतान, फिलहाल टसल का विषय बना हुआ है। सबसे दिलचस्प मुकावला वैशाली लोकसभा सीट पर है। वर्ष 2019 के चुनाव में वैशाली की सीट पर लोजपा की वीणा देवी चुनाव जीतने में सफल रही थी। बाद में वो लोजपा के पारस गुट में शामिल हो गई। हाल के दिनों में वे चिराग पासवान की लोजपा रामविलास के करीब आ गयी है। वैशाली लोकसभा सीट पर एनडीए की ओर से वर्तमान में आधा दर्जन से अधिक दावेदार ताल ठोक रहें हैं। इसमें से कई ऐसे भी है, जिनको टीकट नहीं मिला तो वो अन्दरखाने एनडीए की मुश्किल बढ़ा सकते है। मशलन,  वैशाली की सीट पर मुकावला दिलचस्प होने वाला है। यहां मुकावला सिर्फ विराधियों से नहीं, वल्कि भितरघातायों से भी होगा। मुजफ्फरपुर और शिवहर की सीट भाजपा की झोली मे है। मुजफ्फरपुर लोकसभा सीट पर एनडीए समर्थको में अन्दरखाने गहरा असंतोष है। लोकसभा चुनाव के दौरान इसके असर ये इनकार नहीं किया जा सकता है। कमोवेश, शिवहर सीट पर भी इस बार एनडीए को अपनो से ही असंतोष झेलना पड़ सकता है।

चंपारण में राजनीतिक गोलबंदी शुरू

लोकसभा के चुनाव में चंपारण की तीनों सीट पर सभी की नजर है। पूर्व चंपारण, पश्चमी चंपारण और वाल्मीकिनगर की सीट दोनों गठबंधन के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन चुका है। लोकसभा चुनाव को लेकर यहां के चौक चौराहे पर चर्चा शुरू हो चुकी है। वाल्मिकीनगर में जदयू के सुनील कुमार सांसद है। वहीं पूर्व चंपारण और पश्चमी चंपारण पर भाजपा का कब्जा है। पश्चमी चंपारण से भाजपा के डॉ संजय जायसवाल और पूर्व चंपारण से पूर्व केद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह सांसद है। भाजपा को  अपनी सीट बचाने  की चुनौती होगी। दूसरी ओर इन तीनों सीटो पर इंडिया गठबंधन ने अपनी चुनावी रणनीति को अमलीजामा पहनाने की तैयारी शुरू कर दी है। भाजपा भी अपनी इन सीटों को हर हाल में बचाने की तैयारी में है। नतीजा, दोनों ओर से सामाजिक गोलबंदी की कोशिश शुरू हो चुकी है। नीतीश कुमार को इस इलाके में अपनी साख बचाने की जबरदस्त चुनौती होगी। वहीं, भाजपा अति पिछड़ी जातियों के साथ सवर्ण मतदाताओं के बीच पैठ बनाने की कोशिश कर रही है।

मिथिलांचल में भी सीट बचाने की होगी चुनौती

मिथिलांचल की मधुबनी, दरभंगा, झंझारपुर, समस्तीपुर, उजियारपुर और सुपौल की छह लोकसभा सीटो पर भितरघातायों में जबरदस्त खलबली है। दोनों गठबंधन के नेता इलाके में दौर लगाना शुरू कर चुकें है। सीटों के तालमेल को लेकर यहां जबरदस्त रस्सा-कस्सी शुरू हो चुका है। वर्ष 2019 में इनमें से सभी सीटों पर एनडीए का कब्जा हुआ था। इसमे झंझारपुर और सुपौल में जदयू और समस्तीपुर में लोजपा के उम्मीदवार चुनाव जीते थे। बाकी की तीन सीट मधुबनी, दरभंगा और उजियारपुर पर भाजपा का कब्जा हुआ था। जानकार बतातें हैं कि एनडीए के साथ आने के बाद भी मिथिलांचल में जदयू को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। अव्वल तो ये कि जेडीयू को इन इलाको में अपने लिए मजबूत प्रत्यासी तलासने होंगे। इसके अतिरिक्त जेडीयू को इन इलाकों में विश्वसनीयता की कसौटी पर खड़ा उतरने की चुनौती होगी। समय कम है और टास्क बड़ा है। ऐसे में परिणाम चौकाने वाले भी हो जाये तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा। यदि ऐसा हुआ तो राजद को इसका भरपुर लाभ मिल जायेगा। बीजेपी के लिए भी राह आसान नहीं है। इस बार भाजपा को मधुबनी, दरभंगा और उजियारपुर में अपनी सीटें बचाने की जबरदस्त चुनौती होगी।

मगध में जदयू के जनाधार से है बीजेपी को उम्मीद

पटना और मगध प्रमंडल में लोकसभा की सात सीट है। इसमें पटना साहेब, पाटलिपुत्र, नालंदा, गया, नवादा, जहानाबाद और औरंगाबाद की सीटों पर पिछली दफा राजद ने कड़ा टक्कर दिया था। इनमें से पटना साहेब, पाटलिपुत्र और औरंगाबाद मे भाजपा को जीत मिली थी। वही, नालंदा, गया और जहानाबाद में जदयू के सांसद निर्वाचित हुए थे। जबकि, नवादा में लोजपा के चंदन सिंह को जीत मिली थी। आपको याद ही होगा कि पटना साहेब से भाजपा के हाई प्रोफाइल नेता रविशंकर पसाद की प्रतिष्ठा जुड़ी है। वहीं, पाटलिपुत्र की सीट पर एक बार फिर भाजपा के रामकृपाल यादव और राजद की मीसा भारती के बीच दिलचस्प मुकाबला होने के आसार है। नालंदा की सीट पर भाजपा की ओर गया की सीट पर जीतन राम मांझी के पार्टी की नजर है। महागठबंधन, इन तमाम सीटों पर नए सिरे से रणनीति बना कर जोरदार तैयारी के साथ एनडीए को चुनौती दे सकती है।

सारण प्रमंडल की सीटों पर भी होगी उठा- पटक

सारण प्रमंडल के छपरा और महाराजगंज लोकसभा सीट पर भाजपा का कब्जा है। जबकि, गोपालगंज और सीवान की सीट जदयू की झोली में है। इस बार मौजूदा सांसदो की वापसी और पीएम नरेंद्र मोदी के करिश्माई नेत्रत्व को लेकर इलाके में जोरदार बहस छिरी है। सीवान मे इंडिया गठबंधन के दो मजबूत घटक दल राजद और भाकपा माले की नजर है। वहीं सारण और महाराजगंज मे भाजपा को टक्कर देने के लिए नए दमखम वाले उम्मीदवार इंडिया गठबंधन की ओर से उतारे जाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। हालांकि, उम्मीदवार का चेहरा फिलहाल नेपथ्य से बाहर आना बाकी है। समझौते की तस्वीर साफ होते ही स्थिति स्पष्ट हो जायेगा। इस इलाके में भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की विश्वसनियता को लेकर जोरदार बहस शुरू हो चुका है। कहतें हैं कि नीतीश कुमार का सिक्का चला तो बीजेपी को इसका लाभ मिलेगा। अन्यथा महागठबंधन को लाभ मिलना लाजमी है।

कोसी से ‘इंडिया’ गठबंधन को है बड़ी उम्मीद

कोसी इलाके की मधेपुरा, कटिहार, खगड़िया, पूर्णिया, किशनगंज और अररिया की लोकसभा सीट पर इंडिया गठबंधन को बहुत उम्मीद है। फिलहाल, इसमें से एक मात्र अररिया लोकसभा सीट पर भाजपा का कब्जा है। बाकी की पांच में चार पर जदयू और किशनगंज में कांग्रेस के सांसद है। वर्तमान में चुनावी राह किसी भी दल के लिए आसान नहीं है। जदयू को नए समीकरण के साथ इस इलाके में अपनी प्रतिष्ठा बचाने की चुनौती होगी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साख का इस इलाके में परीक्षा होना है। विशेष करके मुस्लिम मतदाताओं के बीच नीतीश कुमार की पकड़  को लेकर अभी से सवाल उठने शुरू हो चुकें हैं। बतातें चलें कि मधेपुरा लोकसभा सीट पर 2019 के चुनाव में राजद और जदयू आमने- सामने रहा था। इस बार के चुनाव में भी महगठबंधन मधेपुरा में अपनी पूरी ताकत झोंकने को तैयार बैठी है। ऐसे में देखना बाकी है कि कौर किस रणनीति के साथ कैसा प्रदर्शन करता है…?

शाहाबाद में भी होगा दिलचस्प मुकाबला

शाहाबाद के चार लोकसभा क्षेत्र आरा, बक्सर, सासाराम और काराकाट के चौपालों पर लोकसभा को लेकर चुनावी बहस शुरू हो चुकी है। फिलहाल, इन चारों सीटो में तीन पर भाजपा का कब्जा है। वही, काराकाट की सीट भाजपा के सहयोगी रालोसपा की झोली में है। रालोसपा एनडीए का हिस्सा है। आम तौर पर शाहाबाद की पहचान लड़ाकू मतदाताओं के इलाके से की जाती है। पूर्व उप प्रधानमंत्री जगजीवन राम से लेकर राम सुभग सिंह और सूर्यदेव सिंह जैसे दमदार उम्मीदवार इस इलाके से अपना भाग्य आजमाते रहें है। शाहाबाद में 2014 में नरेंद्र मोदी के नाम की लहर सिर चढ़ कर बोली थी। यही कारण है कि बाहरी होने के बावजूद आरा में आरके सिंह, काराकाट में उपेन्द्र कुशवाहा और बक्सर में अश्वनी कुमार चौबे को चुनाव में जीत हासिल हुई थी। इस बार मुकाबला तगड़ा होगा। राजद और कांग्रेस की संभावित गठजोड़ की ताकत को नकारना एनडीए के लिए आसान नहीं होने वाला है।

इन सीटों पर भी है सभी  की नजर

लोकसभा चुनाव को लेकर भागलपुर, बांका, मुंगेर, जमुई और बेगूसराय के इलाकों में भी गुणा- गणित शुरू हो चुकी है। वर्तमान में मुंगेर, भागलपुर और बांका की सीट पर जदयू का कब्जा है। इनमें भागलपुर और बांका में पिछले चुनाव में जदयू को राजद से कड़ा मुकावला मिला था। जमुई की सीट लोजपा की झोली में है। वही, बेगूसराय की सीट पर भाजपा का कब्जा है। पिछली बार बेगूसराय में राजद और सीपीआइ के बीच की खींचतान का लाभ भाजपा को मिला था। इस बार कन्हैया कुमार सीपीआइ छोड़ कांग्रेस में शामिल हो चुके है। इस बार जदयू अपने सांसदों को दोबारा चुनावी मैदान में उतार सकती है। वहीं, भागलपुर, बांका और मुंगेर पर भाजपा के उम्मीदवार चौंकाने वाले हो जाये तो आश्चर्य नहीं होगा।

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