छठ का अद्भुत रहस्य: क्यों डूबते सूर्य को दिया जाता है अर्घ्य?
KKN ब्यूरो। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में छठ महापर्व की तैयारियां जोरों पर हैं। यह त्योहार अपनी अनूठी परंपरा के लिए पूरी दुनिया में विख्यात है – डूबते हुए सूर्य की पूजा। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब पूरी दुनिया उगते सूरज को ऊर्जा और नई शुरुआत का प्रतीक मानकर पूजती है, तो छठ व्रती अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य क्यों देते हैं? इस सवाल का जवाब छिपा है उषा और प्रत्युषा के रहस्यमय रिश्ते में, जो सूर्य देव की दो पत्नियां हैं। छठ पर्व भारतीय संस्कृति का एकमात्र ऐसा त्योहार है जहां उगते और डूबते दोनों सूर्य की पूजा समान भक्ति भाव से की जाती है। तीसरे दिन संध्या में ‘संध्या अर्घ्य’ और चौथे दिन प्रातःकाल ‘उषा अर्घ्य’ दिया जाता है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि जीवन में आरंभ जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण अंत भी है। यह चक्रीय जीवन की स्वीकृति और विनम्रता का प्रतीक है।
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उषा और प्रत्युषा: सूर्य की दो शक्तियां
हिंदू धर्मग्रंथों और वैदिक साहित्य में उषा और प्रत्युषा को सूर्य देव की दो पत्नियां या शक्तियां बताया गया है। यह दोनों देवियां सूर्य की ऊर्जा का स्रोत हैं और छठ महापर्व इन्हीं दोनों शक्तियों के साथ-साथ सूर्य की संयुक्त उपासना है। उषा – प्रातःकाल की पहली किरण का प्रतीक हैं। संस्कृत में ‘उषा’ का अर्थ ही भोर या सुबह है। उषा को छठी मइया के रूप में भी जाना जाता है, जो प्रकृति का छठा रूप हैं। वैदिक देवी उषा से छठी मइया की पहचान की जाती है। चौथे दिन सुबह जब भक्त नदी या तालाब के किनारे खड़े होकर उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं, तो वे वास्तव में उषा की आराधना कर रहे होते हैं। प्रत्युषा – दिन की अंतिम किरण, यानी संध्याकाल की सूर्य रश्मि का प्रतिनिधित्व करती हैं। ‘प्रत्युषा’ शब्द का अर्थ है – “सांझ का सूरज” या “अस्त होते सूर्य की अंतिम किरण”। तीसरे दिन शाम को जब भक्त कमर तक पानी में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं, तो वे प्रत्युषा को प्रणाम करते हैं।
सूर्य की पत्नियों की पौराणिक कथा
गुप्तकाल से लेकर पाल काल तक की मूर्तियों में सूर्य की दो शक्तियों – उषा और प्रत्युषा – का समायोजन पाया गया है। पुरातात्विक साक्ष्यों में सूर्य की प्रतिमाओं में सूर्य के दोनों तरफ दो स्त्री आकृतियां बनी होती थीं, जो उनकी दो पत्नियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन्हें प्रभा और छाया के नाम से भी जाना जाता है। मूर्तिकला में भारतीय कलाकारों ने स्पष्ट रूप से उन सभी परंपराओं को शामिल किया जो सदियों से प्रचलित थीं। सूर्य के रथ में सात घोड़े जुड़े होते हैं और सारथी अरुण को दिखाया जाता है। दोनों तरफ स्त्री आकृतियां उषा और प्रत्युषा हैं। दाईं और बाईं ओर पिंगल (अग्नि) और दंड (स्कंद के स्थान पर) खड़े हैं। छठ पूजा में हम डूबते सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्युषा) को शाम में और उगते सूर्य की पहली किरण (उषा) को सुबह नमन करते हैं। यह दोहरी उपासना सौर चक्र की परिवर्तनकारी शक्ति और जीवन की चक्रीय प्रकृति का प्रतीक है।
छठ की तीसरे दिन की संध्या अर्घ्य: सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान
छठ पर्व का तीसरा दिन ‘संध्या अर्घ्य’ या ‘पहला अर्घ्य’ के नाम से जाना जाता है, जो इस चार दिवसीय उत्सव का सबसे महत्वपूर्ण चरण है। इस दिन व्रती 36 घंटे के निर्जला व्रत के बीच होते हैं, जिसमें पानी की एक बूंद भी नहीं ली जाती। संध्याकाल में भक्त दउरा या सूप (बांस की बनी टोकरी) में ठेकुआ, चावल के लड्डू, नारियल, गन्ना, केला, सिंघाड़ा, और मौसमी फलों से भरकर घाट की ओर जाते हैं। घाट पर पहुंचकर महिलाएं (और कुछ पुरुष भी) कमर तक पानी में खड़े होकर डूबते सूर्य की प्रतीक्षा करते हैं। जैसे ही सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ता है, व्रती जल से भरा पात्र हाथ में लेकर सूर्य की ओर मुंह करके धीरे-धीरे जल अर्पित करते हैं। साथ में दीया (दीपक) जलाया जाता है, जो ज्ञान और पवित्रता की रोशनी का प्रतीक है। जल जीवन और पोषण का प्रतीक है। इस अर्घ्य के समय भक्त मौन रहकर अपने परिवार की समृद्धि, स्वास्थ्य और खुशहाली की कामना करते हैं।
क्यों है डूबते सूर्य की पूजा इतनी खास?
हिंदू परंपरा में सूर्य केवल जीवन का शक्तिशाली स्रोत नहीं है, बल्कि एक देवता भी है जो ऊर्जा, पोषण और गर्मी प्रदान करता है। आमतौर पर सूर्य को सूर्योदय और नई शुरुआत से जोड़ा जाता है, लेकिन डूबते सूर्य को अर्घ्य देने का कार्य विनम्रता, समापन और जीवन की चक्रीय प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है। यह स्वीकार करता है कि एक चक्र का अंत दूसरे की शुरुआत के लिए आवश्यक है। इस तरह संध्या अर्घ्य संतुलन, स्वीकृति और जीवन की यात्रा में अंत के महत्व का प्रतिनिधित्व करता है। प्रतीकात्मक स्तर पर, छठ पूजा को लोगों को सूर्य के गुणों को आत्मसात करने की आवश्यकता की याद के रूप में देखा जा सकता है। सूर्य कभी अपना सार नहीं खोता और उसकी महिमा की स्थायित्व का प्रतीक भोर और सांझ दोनों समय उसकी भव्यता और पूजनीयता से होता है। इस प्रकार सूर्य की स्थिति चाहे जो भी हो, उसे सम्मानित और पूजा जाता है – हम उगते और डूबते दोनों सूर्य को प्रार्थना अर्पित करते हैं।
क्या दुनिया में कहीं और भी डूबते सूर्य की पूजा होती है?
छठ पर्व की तरह डूबते सूर्य को समर्पित विशेष पूजा दुनिया में बेहद दुर्लभ है। हालांकि विश्व भर की प्राचीन सभ्यताओं में सूर्य पूजा का प्रचलन रहा है, लेकिन अस्ताचलगामी सूर्य को विशेष अर्घ्य देने की परंपरा छठ की अपनी अनूठी विशेषता है।
प्राचीन मिस्र में सूर्य पूजा
प्राचीन मिस्र में सूर्य देवता ‘रा’ (Ra) की पूजा केंद्रीय धार्मिक परंपरा थी। हेलियोपोलिस (On) शहर में सूर्य पूजा का केंद्र था। सूर्य को बाज के सिर वाले देवता के रूप में चित्रित किया जाता था जिसके ऊपर सौर डिस्क और सांप होता था। फैरो अखेनातेन ने सूर्य डिस्क ‘आतेन’ (Aten) को एकमात्र देवता के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया था। हालांकि, मिस्र में मुख्य रूप से सूर्योदय की पूजा होती थी, न कि सूर्यास्त की।
मेसोपोटामिया और बेबीलोन
बेबीलोनिया और असीरिया में ‘शमश’ (Shamesh) सूर्य देवता थे। सीपारा और लार्सा जैसे विशेष स्थल सूर्य पूजा के लिए निर्धारित थे। फोनीशिया में सौर बाल ‘बाल-हम्मोन’ की पूजा होती थी। लेकिन यहां भी डूबते सूर्य को अर्घ्य की परंपरा नहीं थी।
इंका और एज्टेक सभ्यताएं
दक्षिण अमेरिका में इंका सभ्यता में सूर्य देवता ‘इंति’ (Inti) की पूजा प्रमुख थी। पेरू में शासक को सूर्य देवता का अवतार माना जाता था। माचू पिच्चू में ‘इंतिहुआताना’ नामक पत्थर शीतकालीन संक्रांति को चिह्नित करने के लिए उपयोग किए जाते थे। ‘इंति रायमी’ त्योहार सूर्य को बांधने के लिए मनाया जाता था ताकि दिन और छोटे न हों। मेक्सिको में एज्टेक सभ्यता में सूर्य देवता ‘हुइत्ज़िलोपोच्त्ली’ और ‘तेज्कात्लिपोका’ को खुश करने के लिए व्यापक मानव बलि दी जाती थी। तेओतिहुआकान स्थल पर दो विशाल पिरामिड सूर्य और चंद्रमा के नाम पर हैं। लेकिन इन सभ्यताओं में सूर्योदय पर जोर था, सूर्यास्त पर नहीं।
जापान और चीन
जापान में सूर्य देवी ‘अमातेरासु’ (Amaterasu) प्राचीन पौराणिक कथाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और उन्हें विश्व की सर्वोच्च शासक माना जाता था। आज भी सूर्य प्रतीक जापानी राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। चीनी पौराणिक कथाओं में मूल रूप से आकाश में दस सूर्य थे, जो सभी भाई थे। एक बार वे सभी एक साथ आकाश में आ गए, जिससे दुनिया बहुत गर्म हो गई। हाउ यी नामक नायक ने धनुष और तीर से नौ को मार गिराया। चीन में ‘री गोंग ताई यांग शिंग जुन’ सूर्य देवता हैं। लेकिन यहां भी डूबते सूर्य को विशेष पूजा की परंपरा नहीं है।
यूरोपीय सभ्यताएं
रोमन इतिहास के बाद के काल में सूर्य पूजा ने महत्व प्राप्त किया और अंततः ‘सौर एकेश्वरवाद’ का रूप ले लिया। सोल इनविक्टस (Unconquered Sun) का त्योहार 25 दिसंबर को बड़े उत्साह से मनाया जाता था, और अंततः इस तारीख को ईसाइयों ने क्रिसमस के रूप में अपना लिया। यूनान में सूर्य से संबंधित कई देवता थे। आर्मेनियाई पौराणिक कथाओं में ‘अरा’ (Ara) सूर्य के रूप में सन्निहित एक शक्तिशाली देवता थे। प्राचीन आर्मेनियाई लोग खुद को “सूर्य के बच्चे” कहते थे। स्टोनहेंज (इंग्लैंड) और नबता प्लाया (मिस्र) जैसे प्राचीन स्मारक ग्रीष्म या शीतकालीन संक्रांति को सटीक रूप से चिह्नित करते हैं। लेकिन इन सभी में सूर्योदय को ही प्राथमिकता दी गई।
छठ की अनोखी विशेषता: उगते और डूबते दोनों सूर्य की समान पूजा
विश्व की किसी भी अन्य सभ्यता में उगते और डूबते दोनों सूर्य को समान भक्ति भाव से पूजने की परंपरा नहीं मिलती। छठ पूजा इस मामले में विश्व में अद्वितीय है। छठ में मूर्ति की पूजा नहीं होती और लोग प्रत्यक्ष रूप से उगते सूर्य को प्रणाम करते हैं। यह एक पूर्व-वैदिक त्योहार है जिसकी उत्पत्ति कम से कम 2300 वर्ष पहले हुई थी। पुजारी की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं होती। छठ पूजा में मंत्रों की औपचारिक आवृत्ति की आवश्यकता नहीं होती। यह लिंग, जाति या आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना सभी के लिए खुला है। मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला यह त्योहार समानता और भाईचारे को बढ़ावा देता है।
वैदिक परंपरा और वैज्ञानिक महत्व
छठ की उत्पत्ति हजारों साल पहले की है, जो पौराणिक कथाओं और वैदिक काल की प्रारंभिक सौर पूजा परंपराओं दोनों से गहराई से जुड़ी हुई है। उगते और डूबते सूर्य को जल अर्पित करने की रस्म – जिसे अर्घ्य कहा जाता है – हिंदू प्रार्थना के सबसे पुराने रूपों में से एक है, जिसका उल्लेख कई प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। ऋग्वेद में सूर्य देवता को समर्पित भजन सौर उपासना के आध्यात्मिक महत्व को उजागर करते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, कुशीनगर क्षेत्र में ऋषि कश्यप और अदिति का आश्रम था। माता अदिति ने कार्तिक की षष्ठी को सूर्य को पुत्र के रूप में जन्म दिया। सूर्य को अदिति के पुत्र होने के कारण ‘आदित्य’ भी कहा जाता है। इसी कारण छठ पूजा को सूर्य की जयंती के रूप में मनाया जाता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, सूर्य की पराबैंगनी किरणें (UV Rays) सुबह और शाम में कम हानिकारक और अधिक लाभकारी होती हैं। छठ पूजा के समय सूर्य की किरणों से विटामिन D की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में सूर्य को विष दूर करने, मानसिक रोग, कुष्ठ रोग और अंधेपन को ठीक करने का श्रेय दिया गया है।
रामायण और महाभारत में छठ का उल्लेख
रामायण में उल्लेख है कि जब भगवान राम और सीता अयोध्या लौटे तो लोगों ने दीपावली मनाई और उसके छठे दिन रामराज्य की स्थापना हुई। इस दिन राम और सीता ने व्रत रखा और सूर्य षष्ठी और छठ पूजा की गई। इसी कारण सीता को लव और कुश पुत्रों का आशीर्वाद मिला। महाभारत में, कुंती ने लक्षागृह से बचने के बाद छठ पूजा की थी। यह भी माना जाता है कि कर्ण, जो सूर्य और कुंती के पुत्र थे, छठ पूजा करने के बाद ही जन्मे थे। कर्ण सूर्य के भक्त थे और नदी के बहते पानी में अपने खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। द्रौपदी ने भी पांडवों के लिए कुरुक्षेत्र युद्ध जीतने के लिए यह पूजा की थी।
ब्रह्म वैवर्त पुराण और राजा प्रियव्रत की कथा
ब्रह्म वैवर्त पुराण में उल्लेख है कि छठी मइया की पूजा छठ पर्व के दौरान की जाती है। कहा जाता है कि छठ पूजा की शुरुआत काशी खंड में वाराणसी के गहड़वाल राजवंश द्वारा की गई थी। काशी खंड के अनुसार, छठ पूजा की परंपरा वाराणसी से देश के अन्य हिस्सों में फैली। एक अन्य किंवदंती के अनुसार, प्रथम मनु स्वयंभू के पुत्र राजा प्रियव्रत निःसंतान थे। इसे दूर करने के लिए ऋषि कश्यप ने उनसे यज्ञ करने को कहा। इसके तुरंत बाद रानी मालिनी को एक पुत्र हुआ, लेकिन बच्चा मृत पैदा हुआ। शाही परिवार की दुर्दशा देखकर माता षष्ठी ने आकाश में प्रकट होकर कहा: “मैं छठी मइया हूं, प्रकृति का छठा रूप। मैं दुनिया के सभी बच्चों की रक्षा करती हूं और सभी निःसंतान माता-पिता को संतान का आशीर्वाद देती हूं”। देवी ने मृत बच्चे को अपने हाथों से आशीर्वाद दिया और वह जीवित हो गया। षष्ठी देवी की कृपा के लिए आभारी राजा ने देवी की पूजा की।
चार दिवसीय छठ पर्व का विधान
छठ पर्व चार दिनों तक चलता है और प्रत्येक दिन विशेष अनुष्ठानों से भरा होता है:
पहला दिन नहाय खाय: दिवाली के चार दिन बाद कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को शुरू होता है। इस दिन व्रती पवित्र स्नान करते हैं, आमतौर पर गंगा जैसी पवित्र नदियों में, और कड़े आहार अनुशासन बनाए रखते हैं। केवल एक भोजन खाया जाता है जो परम पवित्रता के साथ तैयार किया जाता है।
दूसरा दिन खरना या लोहंडा: पूरे दिन व्रत रखा जाता है, यहां तक कि पानी से भी परहेज किया जाता है। सूर्यास्त के बाद गुड़, चावल और दूध से बनी खीर, चपाती और फलों के साथ व्रत तोड़ा जाता है। यह प्रसाद पहले छठी मइया को अर्पित किया जाता है फिर परिवार और पड़ोसियों में वितरित किया जाता है। इस भोजन के बाद व्रती 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू करते हैं।
तीसरा दिन संध्या अर्घ्य: यह छठ पूजा का सबसे महत्वपूर्ण दिन है। व्रती डूबते सूर्य को शाम की प्रार्थना अर्पित करते हैं। यह अवसर लगभग एक कार्निवल है। घाट पर व्रती और परिवार के सदस्य एकत्रित होते हैं और डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
चौथा दिन उषा अर्घ्य और पारण: तड़के फिर से सभी परिवार के सदस्य, दोस्त और व्रती घाट पर जाते हैं। व्रती आधे शरीर को पानी में खड़े होकर उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। सुबह के अर्घ्य की समाप्ति के बाद व्रती अपना 36 घंटे का समर्पित उपवास गर्म पानी या चाय के साथ तोड़ते हैं।
उगते और डूबते दोनों सूर्य की समान भक्ति
छठ पर्व विश्व का एकमात्र ऐसा त्योहार है जहां उगते और डूबते दोनों सूर्य की समान भक्ति से पूजा होती है। उषा और प्रत्युषा – सूर्य की दो शक्तियों की उपासना – इस पर्व को अद्वितीय बनाती है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि जीवन में आरंभ और अंत दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं, और प्रकृति के साथ सामंजस्य ही सच्ची खुशहाली का मार्ग है।
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