बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था इन दिनों गंभीर संकट से गुजर रही है। पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (PMCH) में जूनियर डॉक्टर अपनी मांगों को लेकर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं। जूनियर डॉक्टर एसोसिएशन (JDA) के नेतृत्व में चल रही यह हड़ताल लगातार जारी है और इसका सीधा असर मरीजों और उनके परिजनों पर पड़ रहा है। अस्पतालों में OPD और OT सेवाएं पूरी तरह बंद हो चुकी हैं, जिससे इलाज के लिए आए लोग इधर-उधर भटकने को मजबूर हैं।
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हड़ताल की वजह
JDA अध्यक्ष डॉ. सत्यम ने बताया कि डॉक्टरों ने छह प्रमुख मांगों को लेकर कार्य बहिष्कार किया है। इनमें सबसे अहम मांग बॉन्ड अवधि को घटाना और जुर्माना राशि को दस लाख रुपये करना है। जूनियर डॉक्टरों का कहना है कि ये मांगें लंबे समय से लंबित हैं और उनके करियर और भविष्य पर सीधा असर डालती हैं। सरकार की अनदेखी के कारण उन्हें मजबूरी में हड़ताल करनी पड़ी है।
स्वास्थ्य सेवाओं पर असर
हड़ताल का असर बिहार की स्वास्थ्य सेवाओं पर साफ दिखाई दे रहा है। PMCH में OPD पूरी तरह बंद है और मरीजों को इलाज नहीं मिल पा रहा है। कई दूरदराज के जिलों से आए लोग घंटों इंतजार करने के बाद भी निराश होकर लौट रहे हैं। OT सेवाएं भी बंद होने के कारण सामान्य सर्जरी टाल दी गई है। अस्पतालों में वरिष्ठ डॉक्टर और स्टाफ बढ़ते दबाव को संभालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन स्थिति बिगड़ती जा रही है।
स्वास्थ्य विभाग से बेनतीजा बैठक
मंगलवार को जूनियर डॉक्टर एसोसिएशन की पांच सदस्यीय टीम ने स्वास्थ्य सचिव से मुलाकात की। घंटों चली इस बैठक से किसी तरह का समाधान नहीं निकल सका। सरकार की ओर से ठोस आश्वासन नहीं मिलने पर JDA ने साफ कर दिया कि जब तक मांगें पूरी नहीं होंगी, तब तक गैर-आपातकालीन सेवाएं बंद रहेंगी। अभी केवल Emergency Services ही चालू हैं, लेकिन मरीजों की बढ़ती भीड़ से दबाव और बढ़ रहा है।
चेतावनी और बढ़ता संकट
JDA अध्यक्ष डॉ. सत्यम कुमार ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार का रवैया उदासीन बना रहा तो आने वाले दिनों में Emergency Services भी बंद की जा सकती हैं। इस चेतावनी ने मरीजों और उनके परिजनों की चिंता बढ़ा दी है। अगर इमरजेंसी भी बंद हो गई तो राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी और गंभीर मरीजों की जान पर बन सकती है।
मरीजों की बढ़ती परेशानियां
इस हड़ताल ने मरीजों को भारी संकट में डाल दिया है। दूरदराज से आए लोग इलाज के लिए भटक रहे हैं। कई गंभीर मरीज घंटों इंतजार करने के बाद भी लौट गए। निजी अस्पतालों की ओर रुख करने वालों को महंगा इलाज करना पड़ रहा है। गरीब और मजदूर वर्ग के लिए यह खर्च उठाना संभव नहीं है। इस वजह से उनके गुस्से का निशाना सरकार और हड़ताल कर रहे डॉक्टर दोनों बन रहे हैं।
बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल
यह हड़ताल बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरियों को सामने लाती है। पहले से ही डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ की कमी से जूझ रहे सरकारी अस्पताल अब और दबाव में हैं। जूनियर डॉक्टरों के कार्य बहिष्कार ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह गतिरोध लंबा खिंचता है तो राज्य में रोके जा सकने वाली मौतों की संख्या बढ़ सकती है।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
इस हड़ताल पर राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने प्रतिक्रिया दी है। कई नेताओं ने सरकार को दोषी ठहराया है और कहा है कि डॉक्टरों की जायज मांगों को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। वहीं, मरीज संगठनों ने अपील की है कि दोनों पक्ष जल्द से जल्द समाधान निकालें क्योंकि इसका खामियाजा आम जनता भुगत रही है। कुछ नेताओं ने डॉक्टरों की भी आलोचना की है और कहा है कि बातचीत के दौरान भी जरूरी सेवाओं को बंद करना सही नहीं है।
जूनियर डॉक्टरों की प्रमुख मांगें
जूनियर डॉक्टरों ने छह मांगें रखी हैं जिनमें दो मुख्य मुद्दे हैं।
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बॉन्ड अवधि को घटाना।
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जुर्माना राशि को दस लाख रुपये तय करना।
डॉक्टरों का कहना है कि मौजूदा बॉन्ड सिस्टम उनके करियर को सीमित करता है और भारी जुर्माना उनकी प्रगति पर रोक लगाता है। उनका मानना है कि इन मांगों को मानने से डॉक्टरों को राहत मिलेगी और स्वास्थ्य सेवाएं भी अधिक व्यावहारिक बनेंगी।
सरकार का रुख
अब तक सरकार की ओर से कोई ठोस पहल नहीं दिखी है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने डॉक्टरों से काम पर लौटने की अपील की है और कहा है कि बातचीत जारी रहेगी। लेकिन JDA ने साफ किया है कि लिखित आश्वासन के बिना वे हड़ताल खत्म नहीं करेंगे। सरकार की यह अनिश्चित स्थिति संकट को और गहरा रही है।
इमरजेंसी सेवाओं का खतरा
सबसे बड़ा खतरा इमरजेंसी सेवाओं के ठप होने का है। इमरजेंसी किसी भी अस्पताल की रीढ़ होती है। अगर जूनियर डॉक्टरों ने इसे भी बंद कर दिया तो एम्बुलेंस से आने वाले गंभीर मरीजों को इलाज नहीं मिलेगा। यह हालात राज्य के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकते हैं।
परिजनों की पीड़ा
अस्पताल से निकल रही तस्वीरें और कहानियां बेहद दर्दनाक हैं। गंभीर बीमार बच्चों, बुजुर्ग मरीजों और दुर्घटना पीड़ितों के परिजन वार्ड से वार्ड भटकते नजर आ रहे हैं। कई लोगों को बिना इलाज के लौटना पड़ा है, जबकि कुछ को मजबूरी में निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ा है। गरीब मरीजों के लिए यह स्थिति असहनीय बन चुकी है।
संवाद की जरूरत
विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता दोनों पक्षों से बातचीत दोबारा शुरू करने की अपील कर रहे हैं। उनका कहना है कि डॉक्टरों की मांगें जायज हो सकती हैं, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं को रोककर लोगों की जिंदगी को खतरे में डालना उचित नहीं है। कई लोगों ने सुझाव दिया है कि एक स्वतंत्र समिति बनाकर सरकार और डॉक्टरों के बीच मध्यस्थता की जाए।
हड़ताल का भविष्य
जैसे-जैसे हड़ताल लंबी खिंच रही है, संकट और गहराता जा रहा है। यह केवल PMCH तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि अन्य मेडिकल कॉलेजों के डॉक्टर भी समर्थन में आ सकते हैं। अगर समझौता जल्द नहीं हुआ तो बिहार एक बड़े स्वास्थ्य संकट का सामना कर सकता है।
पीएमसीएच में जूनियर डॉक्टरों की अनिश्चितकालीन हड़ताल ने बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की कमियों को उजागर कर दिया है। बॉन्ड अवधि घटाने और जुर्माना राशि कम करने जैसी मांगें डॉक्टरों के लिए अहम हैं, लेकिन इन पर बातचीत बेनतीजा रही है। मरीजों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है। OPD और OT सेवाएं ठप हैं और इमरजेंसी सेवाओं पर भी खतरा मंडरा रहा है। सरकार और JDA के बीच तत्काल समाधान की जरूरत है, वरना बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा सकती है।



