जब शाम ढलती थी और पूरा गांव एक आंगन में सिमट आता था
KKN ब्यूरो। सन् 1975 का एक गांव। कच्ची सड़कें। बैलों की घंटियां। लालटेन की रोशनी में खाना बनाती महिलाएं। चौपाल पर बैठे बुजुर्ग—जहां खबरें रेडियो से नहीं, रिश्तों से चलती थीं। उस दौर में गांव गरीब था, लेकिन रिश्ते अमीर हुआ करते थे। सपने छोटे थे, लेकिन नींद गहरी आती थी। आज 2025 का वही गांव पक्की सड़क से जुड़ा है। हाथों में मोबाइल है। घरों में टाइल्स और टीवी है, बाइक है। लेकिन, क्या वही सुकून है?
हरित क्रांति से डिजिटल इंडिया तक: खेतों का बदलता रंग
1970 के दशक में खेत की हल और बैलों से जुताई होती थी। हरित क्रांति ने अनाज बढ़ाया, पर असमानता भी बढ़ाई। आज ट्रैक्टर हैं, हार्वेस्टर हैं, सब्सिडी है, मनरेगा है। लेकिन खेती अब भी अनिश्चित है—कभी मौसम से, कभी बाजार से। पहले बेटा खेत संभालता था। आज वही बेटा शहर की बस पकड़ लेता है—दिल में गांव, हाथ में मोबाइल, और आंखों में नौकरी का सपना।
बदलता सामाजिक ढांचा: रिश्तों की परिभाषा भी बदली
एक समय था जब संयुक्त परिवार गांव की ताकत थी। अब छोटे परिवार, अलग-अलग कमरों में अलग-अलग स्क्रीन लगे हैं। पंचायती राज में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। लड़कियां स्कूल जा रही हैं, कॉलेज जा रही हैं। यह बदलाव उम्मीद जगाता है। पर उसी गांव में बुजुर्ग कहते हैं— पहले गरीबी थी, पर अपनापन था… अब सब है, पर वक्त नहीं है।
क्या पहले लोग ज्यादा संतुष्ट थे?
यह सवाल सीधा नहीं है। पहले जरूरतें सीमित थीं! तुलना कम थी। सामूहिकता मजबूत थी। आज अवसर अधिक हैं। आय के नए साधन हैं। लेकिन अपेक्षाएं भी अनंत हैं। पहले संतोष था। जो है, वही काफी है- ऐसी सोच थी। आज बेचैनी है- और क्या मिल सकता है__ लोग इस दौड़ में जी रहें है।
अच्छे बदलाव: जो गांव को आगे ले गए
सड़क, बिजली, पानी की बेहतर सुविधा… शिक्षा और स्वास्थ्य तक पहुंच… महिलाओं की सामाजिक भागीदारी… और डिजिटल कनेक्टिविटी…। गांव अब देश की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है। वह सिर्फ मतदाता नहीं, जागरूक नागरिक की पहचान है।
बुरे असर: जो चुपचाप पनप रहे हैं
पलायन से खाली होते आंगन… बुजुर्गों का अकेलापन… खेती पर बढ़ता कर्ज… और सोशल मीडिया से फैलती अफवाहें…। गांव अब दो दुनियाओं के बीच खड़ा है— एक में परंपरा की मिट्टी है, दूसरी में आधुनिकता की चमक।
आज का गांव: संतुष्टि या संघर्ष?
आज का ग्रामीण समाज पहले से अधिक जागरूक, महत्वाकांक्षी और संसाधनों से जुड़ा है। पर उसके भीतर एक मौन संघर्ष भी है— क्या हम विकास की दौड़ में अपनी पहचान खो रहे हैं? संतुष्टि अब रोटी, कपड़ा और मकान से आगे बढ़कर सम्मान, अवसर और पहचान से जुड़ गई है।
बदलाव की इस यात्रा में असली सवाल
गांव बदला है—बहुत बदला है। पर हर बदलाव अपने साथ कुछ खोता भी है, कुछ पाता भी है। आज का गांव पहले से ज्यादा सक्षम है, लेकिन पहले से ज्यादा बेचैन भी। शायद सच यह है— संतोष समय के साथ नहीं, मन के साथ बदलता है।
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