बिहार की राजनीति में एक बेहद दिलचस्प पैटर्न सामने आया है… 2010 में आरजेडी को 22 सीटें, 2025 में 25 सीटें… यानी लगभग बराबर! लेकिन जब 2015 में जेडीयू साथ आई—आरजेडी 80 सीट पर पहुंच गई। 2020 में जब चिराग पासवान की बगावत ने जेडीयू को कमजोर किया—आरजेडी 75 सीट ले आई। तो क्या इसका मतलब साफ नहीं है? क्या आरजेडी की वास्तविक ताकत 22–25 सीट के आसपास ही है? और 2015 व 2020 में मिली बड़ी जीत सिर्फ ‘जेडीयू फैक्टर’ या ‘एलजेपीआर इफेक्ट’ का परिणाम थी? इस विस्तृत पड़ताल में हम समझेंगे: • 2010, 2015, 2020 और 2025 में आरजेडी की सीटों का असली अर्थ • क्या 2015 की 80 सीटें आरजेडी की अपनी ताकत थीं? • क्या 2020 की 75 सीटें चिराग फैक्टर की देन थीं? • 2025 का चुनाव आरजेडी की वास्तविक स्थिति क्यों उजागर करता है? • क्या आरजेडी 25 सीट ही इसकी असली ‘कोर स्ट्रेंथ’ है? • नीतीश कुमार और जेडीयू की क्या भूमिका रही? • क्या एनडीए के एकजुट रहने पर आरजेडी हमेशा 22–25 पर ही सिमट जायेगी?
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