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सवालो के घेरे में नीतीश की विश्वसनीयता

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राजद को अपने नेता की छवि सवारने का मिला मौका

कौशलेन्द्र झा
बिहार। बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सवालो के घेरे में है। दूसरी ओर राजद को तेजस्वी यादव के रूप में एक नया नेता मिल गया है। दरअसल, पिछले दिनो महागठबंधन से हट कर जदयू के एनडीए में शामिल होना, महज एक राजनीतिक घटनाक्रम ही नही, बल्कि जनादेश का पूनर्मूल्यांकन भी है। भविष्य की राजनीति पर इसका असर पड़ना तय माना जा रहा है।
राजनीतिक तौर पड़ इसका लाभ किसे मिला और घाटे में कौन रहा? सवाल यह नही है। बड़ा सवाल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विश्वसनीयता को लेकर उठने लगा है। इससे पहले भी नीतीश कुमार जनादेश को अपने हिसाब से परिभाषित कर चुके हैं। लिहाजा, आने वाले चुनाव में नीतीश के नेतृत्व वाली गठबंधन पर मतदाता कितना भरोसा करेगा? यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा।
बहरहाल, नीतीश के विरोधी ही नही, बल्कि समर्थक भी उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाने लगें हैं। सुशासनबाबू के नाम से बिहार की राजनीति में अपनी धाख जमा चुके नीतीश कुमार, हाल के वर्षो में चुनाव जीत कर भी अपना इकबाल बचाने की जद्दोजेहद से उबर नही पा रहें हैं। वर्ष 2014 के बाद नीतीश कुमार के चौकाने वाले तमाम निर्णय, उनके प्रशंसको को मुश्किलों में डालती रही है। आने वाले दिनो में इसका असर देखने को भी मिलेगा।
प्रजातंत्र में जनादेश के पुनर्मूल्याकंन का अधिकार मतदाता को है। सरकार बनाने के लिए चुनाव पूर्व बने समीकरण को ध्वस्त करके, नई समीकरण में सरकार गठन करने से पहले जनमत संग्रह होना चाहिए। अन्यथा, मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग, खुद को ठगा हुआ समझने लगेगा और प्रजातंत्र की सेहत पर इसका प्रतिकूल असर पड़ना स्वभाविक है। बेशक, भष्ट्राचार से समझौता नही करना, नीतीश कुमार के सराहनीय निर्णयो में से एक है। बावजूद इसके, उनकी विश्वसनीयता पर उठने वाला सवाल, भविष्य की राजनीति में खतरे का संकेत भी है।

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