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दूसरों की कमियां खोजते-खोजते खुद क्यों खो जाता है इंसान?

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विज्ञान ने खोली नकारात्मक सोच की परतें

कभी-कभी एक इंसान सुबह उठता है और उसकी दुनिया का सबसे बड़ा काम शुरू हो जाता है। वह दूसरों की कमियां खोजता है। किसी की सफलता में उसे साजिश दिखाई देती है। किसी की अच्छाई में स्वार्थ नजर आता है। किसी की चुप्पी उसे घमंड लगती है। धीरे-धीरे वह ऐसी कहानियां जमा करने लगता है, जिनमें दूसरे लोग हमेशा गलत होते हैं और वह खुद हमेशा सही।

साल गुजरते हैं। उसके पास आरोपों का ढेर होता है। अधूरी जानकारियां होती हैं। सुनी-सुनाई बातें होती हैं। कुछ सच होते हैं, कुछ आधे सच और कुछ ऐसी धारणाएं, जिनका वास्तविकता से रिश्ता कभी जांचा ही नहीं गया। फिर एक दिन वह अपनी ही बनाई दुनिया पर विश्वास करने लगता है। लोग उससे दूरी बनाने लगते हैं। उसकी बातों पर भरोसा घटता है। रिश्ते कमजोर पड़ते हैं। वह इस दूरी को अपने व्यवहार का परिणाम मानने के बजाय दूसरों की साजिश का सबूत समझ लेता है। उसकी शिकायतें और गहरी हो जाती हैं।

क्या यह केवल स्वभाव की समस्या है? क्या इंसान का मस्तिष्क उसे नकारात्मकता की ओर धकेलता है? क्या कोई हार्मोन उसे दूसरों की बुराई करने के लिए प्रेरित करता है और सबसे अहम सवाल— क्या इस मानसिक चक्र से बाहर निकलने का कोई रास्ता है? दुनिया में हुए वैज्ञानिक शोध इन सवालों के कुछ महत्वपूर्ण जवाब देते हैं। वे यह भी बताते हैं कि समस्या जितनी व्यक्तिगत है, उतनी ही सामाजिक और डिजिटल भी।

दूसरों की गलतियां हमें उनकी अच्छाइयों से ज्यादा क्यों दिखाई देती हैं?

मानव मस्तिष्क केवल सकारात्मक सूचनाओं पर ध्यान देने के लिए विकसित नहीं हुआ। खतरे पहचानना भी उसके अस्तित्व के लिए जरूरी रहा है। किसी संभावित खतरे को नजरअंदाज करने की कीमत कभी-कभी बहुत बड़ी हो सकती थी। इसलिए नकारात्मक घटनाओं पर ध्यान देने की प्रवृत्ति को मनोविज्ञान में नकारात्मकता पूर्वाग्रह कहा जाता है। इसका अर्थ है कि कुछ परिस्थितियों में बुरी खबर, अपमान, खतरे या नुकसान की सूचना हमारे ध्यान और भावनाओं पर अधिक प्रभाव डाल सकती है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं कि हर इंसान हमेशा नकारात्मक ही सोचेगा।

अमेरिकी मनोवैज्ञानिक अनुसंधान सहित कई अध्ययनों में इस प्रवृत्ति की चर्चा हुई है। यह सामान्य मानवीय मानसिक प्रक्रिया है, अपने आप में कोई बीमारी नहीं। नकारात्मकता पूर्वाग्रह पर प्रकाशित वैज्ञानिक समीक्षा इस विषय की पड़ताल करती है। लेकिन यहां एक निर्णायक अंतर है। किसी गलती को पहचानना उपयोगी हो सकता है। गलती को सुधारने के लिए आलोचना करना भी आवश्यक है। समस्या तब पैदा होती है, जब आलोचना इंसान की आदत और फिर उसकी पहचान बन जाती है।

ऐसी स्थिति में वह केवल गलती नहीं देखता। वह गलती खोजने लगता है। उसे अपनी धारणा के समर्थन में प्रमाण याद रहते हैं, जबकि उसके विपरीत जाने वाली बातें आसानी से भुला दी जाती हैं। मनोविज्ञान में इस प्रवृत्ति को पुष्टि पूर्वाग्रह कहा गया है। यह समझने में मदद करता है कि कोई व्यक्ति अपनी धारणा के खिलाफ प्रमाण सामने आने पर भी उसे क्यों स्वीकार नहीं करता। हालांकि, हर आलोचनात्मक व्यक्ति में यह प्रवृत्ति समान रूप से मौजूद हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता।

मस्तिष्क का कौन-सा हिस्सा इसके लिए जिम्मेदार है?

इस सवाल का सरल उत्तर आकर्षक हो सकता है— मस्तिष्क का अमुक हिस्सा या कोई खास रसायन। लेकिन विज्ञान ऐसी सरल व्याख्या का समर्थन नहीं करता। मस्तिष्क में अमिग्डाला नामक संरचना भावनात्मक महत्व और संभावित खतरे को पहचानने में भूमिका निभाती है। प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स जैसे हिस्से निर्णय, ध्यान, व्यवहार नियंत्रित करने और परिस्थितियों का मूल्यांकन करने से जुड़े हैं। स्मृति, भावनाएं और सामाजिक अनुभव भी हमारे फैसलों को प्रभावित करते हैं।

लेकिन दूसरों की आलोचना करने, गलत सूचना पर विश्वास करने या किसी के प्रति लंबे समय तक दुर्भावना रखने के लिए कोई एक अंग जिम्मेदार घोषित नहीं किया जा सकता। यह व्यवहार अनेक कारकों से बनता है। इनमें पुराने अनुभव, सीखी हुई आदतें, असुरक्षा, तनाव, सामाजिक वातावरण और किसी समूह के प्रति पूर्वधारणाएं शामिल हो सकती हैं। कुछ मामलों में मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं भी नकारात्मक विचारों को प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन केवल आलोचना करने के आधार पर किसी व्यक्ति का निदान नहीं किया जा सकता। यानी मस्तिष्क हमारे व्यवहार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन वह किसी व्यक्ति के चरित्र का अकेला निर्णायक नहीं है।

क्या कोई हार्मोन इंसान को नकारात्मक बना देता है?

तनाव के दौरान शरीर में कॉर्टिसोल जैसे हार्मोन की भूमिका होती है। डोपामिन जैसे रासायनिक संदेशवाहक प्रेरणा, सीखने और पुरस्कार से जुड़ी प्रक्रियाओं में शामिल होते हैं। सेरोटोनिन भी मनोदशा और अनेक अन्य शारीरिक प्रक्रियाओं से संबंधित है।

लेकिन इनमें से किसी एक हार्मोन को दूसरों की बुराई करने, झूठी बातें फैलाने या हमेशा नकारात्मक रहने का सीधा कारण बताने के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। तनाव किसी व्यक्ति को चिड़चिड़ा बना सकता है। नींद की कमी ध्यान और भावनात्मक नियंत्रण को प्रभावित कर सकती है। लगातार चिंता में रहने से किसी के लिए नकारात्मक विचारों से बाहर निकलना कठिन हो सकता है। फिर भी इन प्रभावों का अर्थ यह नहीं कि हर नकारात्मक व्यक्ति के हार्मोन असंतुलित हैं।

2024 में प्रकाशित एक व्यवस्थित वैज्ञानिक समीक्षा ने सोशल मीडिया पर भ्रामक सूचनाएं बनाने और फैलाने से जुड़े 23 अध्ययनों का विश्लेषण किया। इसमें व्यक्तिगत, सामाजिक, संज्ञानात्मक और जैविक प्रक्रियाओं सहित कई कारकों की भूमिका सामने आई। निष्कर्ष किसी एक हार्मोन को इसका सार्वभौमिक कारण नहीं ठहराते। यह समीक्षा बीएमसी साइकोलॉजी में प्रकाशित हुई थी।

इसलिए यदि कोई व्यक्ति लगातार गुस्सा करता है, दूसरों पर आरोप लगाता है या नकारात्मक सोच में डूबा रहता है, तो केवल हार्मोन की जांच को उसका संपूर्ण समाधान मानना गलत होगा। जरूरत पड़ने पर चिकित्सक उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का अलग-अलग मूल्यांकन कर सकते हैं।

सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को इतना प्रभावशाली कैसे बनाया?

पहले किसी व्यक्ति की शिकायत सीमित दायरे में रहती थी। अब एक संदेश कुछ ही क्षणों में सैकड़ों या हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। किसी आरोप को बार-बार दोहराने से वह परिचित लगने लगता है और कई बार परिचित लगने वाली बात को लोग सच समझने लगते हैं।

नवंबर 2024 में वैज्ञानिक पत्रिका साइंस में प्रकाशित एक अध्ययन ने इस समस्या की गंभीर परत उजागर की। शोधकर्ताओं ने फ़ेसबुक और ट्विटर के बड़े आंकड़ों तथा व्यवहारिक प्रयोगों का विश्लेषण किया। अध्ययन के अनुसार, भ्रामक सूचना फैलाने वाले स्रोतों में भरोसेमंद स्रोतों की तुलना में अधिक आक्रोश पैदा करने वाली सामग्री देखी गई। आक्रोश ने भ्रामक और विश्वसनीय, दोनों प्रकार की सामग्री साझा करने की प्रवृत्ति बढ़ाई। कुछ प्रतिभागी आक्रोश भड़काने वाली भ्रामक सामग्री को पढ़े बिना साझा करने के लिए भी अधिक तैयार थे।

इसका अर्थ यह नहीं कि हर सोशल मीडिया उपयोगकर्ता गलत सूचना फैलाता है। अध्ययन मुख्यतः अमेरिकी उपयोगकर्ताओं और मंचों के आंकड़ों पर आधारित था। इसलिए इसके परिणामों को भारत के हर उपयोगकर्ता पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। लेकिन यह स्पष्ट करता है कि भावनात्मक उत्तेजना और बिना जांचे साझा करना डिजिटल सूचना व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती हैं।

यहीं एक चिंताजनक चक्र बनता है। कोई व्यक्ति किसी के बारे में आरोप पढ़ता है। वह उसकी पुष्टि नहीं करता। फिर उसे आगे भेज देता है। दूसरा व्यक्ति उसे कई जगह देखकर सच मानने लगता है। तीसरा व्यक्ति उसी आधार पर किसी के चरित्र पर फैसला सुना देता है। इस प्रक्रिया में गलत सूचना केवल सूचना नहीं रहती। वह रिश्तों, प्रतिष्ठा और सामाजिक विश्वास को प्रभावित करने लगती है।

शोधकर्ताओं ने यह चेतावनी भी दी है कि ऑनलाइन गलत सूचना के प्रभावों को बढ़ा-चढ़ाकर बताना उचित नहीं। 2024 में नेचर में प्रकाशित समीक्षा ने बताया कि गलत और भड़काऊ सामग्री का उपभोग कई बार सीमित समूहों में केंद्रित रहता है। इसलिए समस्या का समाधान केवल सोशल मीडिया को दोष देना नहीं, बल्कि अधिक जोखिम वाले व्यवहार और प्रसार के तरीकों को समझना है।

क्या इस मानसिक चक्र का स्थायी उपचार संभव है?

हर व्यक्ति के लिए एक जैसा, स्थायी और गारंटीकृत उपचार अभी प्रमाणित नहीं है। लेकिन नकारात्मक विचारों की पुनरावृत्ति, चिंता और बार-बार एक ही बात पर मानसिक रूप से उलझे रहने की प्रवृत्ति को कम करने के प्रभावी तरीके उपलब्ध हैं। ऐसी मानसिक प्रक्रिया को बार-बार दोहराया जाने वाला नकारात्मक चिंतन कहा जाता है। इसमें व्यक्ति किसी पुरानी घटना, अपमान या विवाद पर बार-बार लौटता है। वह समाधान खोजने के बजाय उसी पीड़ा को फिर से जीता रहता है।

2025 में प्रकाशित एक मेटा-विश्लेषण ने संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा से जुड़े 55 अध्ययनों और 4,970 प्रतिभागियों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। शोध में बार-बार होने वाले नकारात्मक चिंतन को कम करने में इस उपचार के पक्ष में मध्यम प्रभाव मिला। हालांकि, अध्ययनों की गुणवत्ता एक जैसी नहीं थी और कुछ में पक्षपात का जोखिम भी था। इसलिए परिणामों को हर व्यक्ति के लिए निश्चित सफलता नहीं समझना चाहिए।

इस उपचार में व्यक्ति अपने विचारों को पहचानना, उनके पक्ष और विपक्ष के प्रमाण देखना, वैकल्पिक व्याख्याएं खोजना और व्यवहार में बदलाव लाना सीख सकता है। इसका उद्देश्य व्यक्ति को हर समय सकारात्मक बनाना नहीं है। उद्देश्य है कि वह अपनी सोच को अधिक संतुलित, प्रमाण-आधारित और उपयोगी बना सके। यदि नकारात्मक विचार लंबे समय तक बने रहें, रिश्तों और कामकाज को प्रभावित करें या चिंता और अवसाद के लक्षणों के साथ आएं, तो योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श उपयोगी हो जाता है।

बदलाव की शुरुआत दूसरों से नहीं, अपने विचारों से करें

मान लीजिए, किसी परिचित ने आपके बारे में गलत बात कही। आपका पहला विचार होगा— वह हमेशा से ऐसा ही है। दूसरा विचार हो सकता है— वह मेरी सफलता से जलता है। तीसरा विचार इस धारणा को दूसरों तक पहुंचाने का आग्रह पैदा कर सकता है।

लेकिन यहीं रुकना चाहिए। खुद से पूछिए: क्या मेरे पास प्रमाण है? क्या मैंने पूरी बात सुनी है? क्या कोई दूसरा कारण भी हो सकता है? क्या मेरी प्रतिक्रिया समस्या सुलझाएगी या उसे और बढ़ाएगी? यही छोटा-सा विराम विचार और प्रतिक्रिया के बीच जगह बना सकता है।

सोशल मीडिया पर भी कुछ सरल आदतें उपयोगी हो सकती हैं। किसी आरोप को साझा करने से पहले स्रोत जांचें। किसी व्यक्ति के बारे में पुरानी पोस्ट को वर्तमान तथ्य न मानें। असहमति को चरित्र पर हमले में न बदलें और यदि कोई सूचना गलत साबित हो जाए, तो उसे सुधारने में संकोच न करें।

यह भी जरूरी है कि हम वास्तविक अन्याय की आलोचना और निराधार नकारात्मकता में अंतर करें। भ्रष्टाचार, हिंसा या सत्ता के दुरुपयोग पर सवाल उठाना लोकतंत्र का हिस्सा है। समस्या आलोचना नहीं, बल्कि बिना प्रमाण आरोप लगाना और प्रमाण सामने आने पर भी गलत धारणा से चिपके रहना है।

किसी समाज की मानसिक सेहत केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि वहां कितनी सकारात्मक बातें कही जाती हैं। उसे इस बात से भी मापा जा सकता है कि लोग असहमति को कैसे संभालते हैं, गलतियों को कैसे सुधारते हैं और किसी व्यक्ति के बारे में फैसला करने से पहले कितनी सावधानी बरतते हैं।

क्या हम अपनी सोच के कैदी बनते जा रहे हैं?

दूसरों की कमियां खोजते-खोजते इंसान कभी-कभी अपनी दुनिया को इतना संकुचित कर लेता है कि उसे हर तरफ वही दिखाई देने लगता है, जिसकी तलाश वह खुद कर रहा था। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर आलोचक बीमार है या हर नकारात्मक विचार गलत है।

विज्ञान का संदेश अधिक संतुलित है। हमारे मस्तिष्क में नकारात्मकता की ओर ध्यान देने की प्रवृत्ति हो सकती है। हमारी धारणाएं प्रमाण चुनने के तरीके को प्रभावित कर सकती हैं। सोशल मीडिया आक्रोश को तेजी से फैला सकता है और मनोवैज्ञानिक उपचार बार-बार होने वाले नकारात्मक चिंतन को कम करने में मदद कर सकते हैं।

लेकिन कोई एक अंग, हार्मोन या दवा इस पूरी समस्या का सार्वभौमिक समाधान नहीं है। बदलाव की सबसे बड़ी संभावना तब पैदा होती है, जब इंसान अपने विचारों को अंतिम सत्य मानना छोड़ देता है। जब वह स्वीकार करता है कि उसकी जानकारी अधूरी हो सकती है। जब वह किसी की गलती देखने के साथ अपनी गलती भी देखने का साहस जुटा लेता है।

समाज को ऐसे लोगों की जरूरत नहीं, जो हर बात में अच्छाई ही खोजें। समाज को ऐसे लोगों की जरूरत है, जो बुराई को पहचानें, प्रमाण के साथ उसका विरोध करें और सुधार की संभावना को जीवित रखें। क्योंकि दूसरों को गलत साबित करने में बीता जीवन अंततः किसी को सही नहीं बनाता। लेकिन अपनी सोच की जांच करने में बिताया गया एक क्षण भी बदलाव की शुरुआत बन सकता है। सवाल यह नहीं कि दुनिया में गलत लोग कितने हैं। असली सवाल यह है कि दुनिया को बेहतर बनाने की कोशिश में हम अपनी सोच को कितना ईमानदार रख पाते हैं।

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