दुर्गा पूजा की अग्नि पर विज्ञान की बड़ी पड़ताल
दुर्गा पूजा की अंतिम आहुतियों के साथ अग्नि की लपटें उठती हैं। घी, लकड़ी और हवन-सामग्री अग्नि को समर्पित की जाती है। मंत्रोच्चार के बीच श्रद्धालु प्रार्थना करते हैं कि वातावरण पवित्र हो, जीवन में मंगल आए और नकारात्मकता दूर हो। लेकिन एक सवाल है, जिसका उत्तर केवल आस्था से नहीं दिया जा सकता।
Article Contents
यदि हवन में प्रयुक्त जड़ी-बूटियों और लकड़ियों के धुएं में जीवाणुओं को निष्क्रिय करने की क्षमता है, तो क्या इसका अर्थ यह है कि हवन प्रदूषण भी कम करता है और यदि अग्नि में सामग्री जलने से धुआं पैदा होता है, तो क्या वही धुआं सांस के साथ शरीर में जाने वाले सूक्ष्म कण भी बढ़ा सकता है? इन सवालों पर भारत में वैज्ञानिक अध्ययन हुए हैं। कुछ शोधों में औषधीय धुएं से हवा में मौजूद जीवाणुओं की संख्या घटने के संकेत भी मिले हैं। दूसरी ओर, हवन के दौरान वायु में सूक्ष्म कणों और कार्बन मोनोऑक्साइड के बढ़ने की भी रिपोर्ट प्रकाशित हुई है।
आहुति का वास्तविक अर्थ क्या है?
वैदिक परंपरा में यज्ञ केवल अग्नि में सामग्री डालने की क्रिया नहीं है। इसका संबंध देवताओं के प्रति समर्पण, प्रार्थना, सामूहिक अनुष्ठान और दान की भावना से भी है। वैदिक साहित्य में अग्नि को देवताओं तक आहुति पहुंचाने वाले माध्यम के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। दुर्गा पूजा में हवन देवी के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और समर्पण का प्रतीक है। अनुष्ठान में आहुति देना व्यक्ति को यह स्मरण करा सकता है कि जीवन में कुछ प्राप्त करने के साथ त्याग और जिम्मेदारी का भाव भी जरूरी है।
यह आध्यात्मिक अर्थ धार्मिक परंपरा से जुड़ा है। लेकिन जब यह दावा किया जाता है कि हवन से वायुमंडल के प्रदूषक नष्ट हो जाते हैं, रोगाणु समाप्त हो जाते हैं या आसपास की हवा पूरी तरह शुद्ध हो जाती है, तब सवाल वैज्ञानिक परीक्षण का हो जाता है। विज्ञान को यह देखना पड़ता है कि कौन-सी सामग्री जलाई गई, कितनी देर तक जलाई गई, धुआं कितनी मात्रा में निकला, हवा में कौन-से पदार्थ मौजूद थे और हवन के बाद उनमें वास्तव में कितना परिवर्तन आया।
औषधीय धुएं से जीवाणुओं में 94 प्रतिशत से अधिक कमी
वर्ष 2007 में भारतीय वैज्ञानिक चंद्रशेखर शेखर नौटियाल और उनके सहयोगियों का एक शोधपत्र प्रतिष्ठित शोध-पत्रिका जर्नल ऑफ एथ्नोफार्माकोलॉजी में प्रकाशित हुआ था। शोधकर्ताओं का संबंध लखनऊ स्थित राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान से था। उन्होंने लकड़ी और सुगंधित तथा औषधीय वनस्पतियों के मिश्रण को जलाकर पैदा हुए धुएं का हवा में मौजूद जीवाणुओं पर प्रभाव जांचा। प्रयुक्त मिश्रण को शोधपत्र में भारत में हवन के लिए उपयोग होने वाली सामग्री से जोड़ा गया है।
शोध में बंद कमरे में एक घंटे तक औषधीय धुएं के संपर्क के बाद हवा में मौजूद जीवाणुओं की संख्या में 60 मिनट तक 94 प्रतिशत से अधिक कमी दर्ज की गई। शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि बंद कमरे में धुएं से जुड़ा जीवाणुरोधी प्रभाव 24 घंटे तक बना रहा। यह परिणाम इसलिए उल्लेखनीय है, क्योंकि यह केवल धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि प्रयोग के जरिए प्राप्त किया गया निष्कर्ष है।
लेकिन इसकी सीमा समझना भी उतना ही जरूरी है। पहली बात, यह अध्ययन हवा में मौजूद जीवाणुओं पर केंद्रित था। इसमें यह साबित नहीं हुआ कि हवन से पीएम2.5 जैसे सूक्ष्म कण, कार्बन मोनोऑक्साइड या दूसरे जहरीले प्रदूषक नष्ट हो जाते हैं। दूसरी बात, बंद कमरे में जीवाणुओं की संख्या घटने का परिणाम पूरे शहर या खुले वायुमंडल पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। तीसरी बात, हवा में कुछ जीवाणुओं का कम होना और मनुष्यों में संक्रमण की दर घट जाना अलग-अलग परिणाम हैं। इसलिए इस शोध का उचित निष्कर्ष यह है कि विशेष औषधीय धुएं ने नियंत्रित परिस्थितियों में हवा में मौजूद जीवाणुओं की संख्या घटाई। यह वायु-प्रदूषण के हर प्रकार को समाप्त करने का प्रमाण नहीं है।
क्या हवन से वायु-गुणवत्ता सुधर सकती है?
हवन और वायु-गुणवत्ता पर एक अन्य अध्ययन वर्ष 2022 में प्रकाशित हुआ। इसका शीर्षक था—औषधीय लकड़ियों के साथ होम-चिकित्सा का भारतीय उत्सवी मौसम में वायु-गुणवत्ता पर प्रभाव जांचना। इस शोध में दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु-गुणवत्ता के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने संवेदकों और इंटरनेट से जुड़े मापन उपकरणों के जरिए प्रदूषण-संबंधी आंकड़े जुटाए। लेख में बताया गया कि एक सप्ताह बाद कुछ प्रदूषण-संबंधी मापों में कमी और वायु-गुणवत्ता में सुधार देखा गया है।
यह अध्ययन इंटरनेशनल जर्नल ऑफ सोशल इकोलॉजी एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट में प्रकाशित हुआ। लेकिन यहाँ एक समस्या है। दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में वायु-गुणवत्ता अनेक कारणों से बदलती है। यातायात, मौसम, हवा की गति, तापमान, औद्योगिक उत्सर्जन और मौसमी गतिविधियां प्रदूषण के स्तर को प्रभावित करती हैं। केवल यह देखना कि हवन के बाद प्रदूषण-सूचकांक घटा, यह साबित नहीं करता कि कमी हवन के कारण ही आई।
ऐसे दावे की पुष्टि के लिए समान परिस्थितियों वाले नियंत्रण क्षेत्र, विस्तृत प्रदूषक-मापन, मौसम संबंधी आंकड़े और स्वतंत्र पुनरावृत्ति जरूरी हैं। उपलब्ध सारांश के आधार पर इस अध्ययन को प्रारंभिक संकेत के रूप में देखना अधिक उचित है, न कि निर्णायक प्रमाण के रूप में। अर्थात, हवन से वायु-गुणवत्ता में सुधार का दावा प्रकाशित हुआ है, लेकिन इसे वैज्ञानिक समुदाय में स्थापित निष्कर्ष मानने के लिए अधिक मजबूत प्रमाण आवश्यक हैं।
हवन के समय सूक्ष्म कणों में भारी वृद्धि
वर्ष 2023 में इंटरडिसिप्लिनरी जर्नल ऑफ यज्ञ रिसर्च में प्रकाशित एक अध्ययन ने खुले और बंद कमरे में यज्ञ के धुएं से पैदा होने वाले सूक्ष्म कणों और गैसों को मापा। शोध में खुले कमरे की परिस्थितियों में 40 अवलोकन शामिल थे, जबकि बंद कमरे के प्रयोग में केवल 3 अवलोकन थे। शोधकर्ताओं ने पाया कि यज्ञ के दौरान पीएम1, पीएम2.5 और पीएम10 के स्तर 1000 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से ऊपर पहुंच गए। कार्बन मोनोऑक्साइड का स्तर भी बढ़कर 20 पीपीएम तक दर्ज हुआ।
शोधपत्र के अनुसार, हवन समाप्त होने के बाद सूक्ष्म कणों का स्तर धीरे-धीरे घटा। बंद कमरे में उसे लगभग 15 घंटे बाद करीब 250 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के आधार स्तर तक लौटने की सूचना दी गई। कार्बन डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड के स्तर भी समय के साथ नीचे आए। शोधकर्ताओं ने नाइट्रोजन ऑक्साइड और ओजोन में हल्की वृद्धि भी दर्ज की। यह अध्ययन एक महत्त्वपूर्ण तथ्य सामने रखता है।
लेकिन इस अध्ययन की सीमाएं भी हैं। बंद कमरे में केवल 3 अवलोकन किए गए। इसलिए इसके आंकड़ों को हर प्रकार के हवन, हर सामग्री और हर वातावरण पर लागू नहीं किया जा सकता। फिर भी यह परिणाम उस सामान्य धारणा को चुनौती देता है कि हवन का धुआं अपने-आप हवा को स्वच्छ बना देता है। हवन की सामग्री जलने से जो धुआं बनता है, उसका प्रभाव मापना जरूरी है—भले ही अनुष्ठान का आध्यात्मिक महत्त्व अपनी जगह बना रहे।
धुएं में औषधीय गुण होने का क्या अर्थ है?
किसी वनस्पति में औषधीय गुण हो सकते हैं। उससे निकले कुछ रासायनिक पदार्थ प्रयोगशाला में जीवाणुरोधी प्रभाव दिखा सकते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उस वनस्पति को जलाकर पैदा हुआ पूरा धुआं मनुष्य के लिए लाभकारी होगा। जलने की प्रक्रिया में अनेक पदार्थ बनते हैं। लकड़ी, घी और हवन-सामग्री के दहन से सूक्ष्म कण, कार्बन मोनोऑक्साइड तथा दूसरे रासायनिक पदार्थ निकल सकते हैं। इनकी मात्रा सामग्री, तापमान, दहन की पूर्णता और वायु-संचार पर निर्भर करती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, ठोस ईंधन और जैविक पदार्थों के अधूरे दहन से उत्पन्न घरेलू वायु-प्रदूषण में सूक्ष्म कण और अन्य हानिकारक प्रदूषक शामिल हो सकते हैं। इनके संपर्क का संबंध श्वसन रोगों, हृदय रोग, स्ट्रोक और फेफड़ों के कैंसर जैसे स्वास्थ्य जोखिमों से है।
धार्मिक धूप और अगरबत्ती के धुएं पर हुए अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में भी सूक्ष्म कणों के बढ़ने की सूचना मिली है। उदाहरण के लिए, वर्ष 2021 में वियतनाम के हनोई शहर के 32 घरों में किए गए अध्ययन में अगरबत्ती जलाने के समय घरों के भीतर पीएम2.5 की सांद्रता काफी बढ़ी। शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि अगरबत्ती का धुआं घर के भीतर वायु-प्रदूषण का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत हो सकता है। यह अध्ययन भारतीय हवन पर नहीं था। इसलिए इसे हवन का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं कहना चाहिए। फिर भी यह एक वैज्ञानिक सिद्धांत स्पष्ट करता है—किसी धार्मिक या सुगंधित सामग्री के जलने से निकलने वाले धुएं को केवल उसकी सुगंध या पारंपरिक उपयोग के आधार पर सुरक्षित घोषित नहीं किया जा सकता।
क्या शास्त्रीय विधान से हवन करने पर पूरे वायुमंडल को स्वच्छ किया जा सकता है?
अभी ऐसा पर्याप्त, स्वतंत्र और पुनरुत्पादित वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, जो यह सिद्ध करे कि शास्त्रीय विधि से किया गया हवन बड़े क्षेत्र या पूरे वायुमंडल को प्रदूषण से मुक्त कर सकता है। कुछ छोटे अध्ययनों में हवा में मौजूद जीवाणुओं की संख्या घटने के संकेत मिले हैं। कुछ अध्ययनों ने हवन के बाद वायु-गुणवत्ता में सुधार का दावा किया। लेकिन अन्य मापन बताते हैं कि हवन के दौरान सूक्ष्म कण और कार्बन मोनोऑक्साइड बढ़ सकते हैं।
इन परिणामों को साथ रखकर देखने पर स्पष्ट होता है कि वायु-गुणवत्ता पर हवन का प्रभाव एक ही दिशा में जाने वाला सरल परिणाम नहीं है। इसमें दहन से पैदा होने वाले प्रदूषक और कुछ परिस्थितियों में देखे गए जीवाणुरोधी प्रभाव—दोनों का मूल्यांकन करना होगा। वैज्ञानिक रूप से मजबूत निष्कर्ष के लिए बड़े नमूने, नियंत्रित प्रयोग, अलग-अलग हवन-सामग्रियों का तुलनात्मक परीक्षण, खुले और बंद वातावरण के मापन तथा स्वतंत्र शोधकर्ताओं द्वारा पुनरावृत्ति आवश्यक है। जब तक ऐसे प्रमाण उपलब्ध नहीं होते, हवन को वायुमंडलीय प्रदूषण का प्रमाणित समाधान बताना उचित नहीं होगा।
आस्था का सम्मान, विज्ञान से समझौता नहीं
दुर्गा पूजा में हवन का आध्यात्मिक महत्त्व समर्पण, प्रार्थना और सामूहिक साधना से जुड़ा है। भारत में हुए कुछ शोध बताते हैं कि विशिष्ट औषधीय धुएं से बंद कमरे में हवा में मौजूद जीवाणुओं की संख्या घट सकती है। वहीं, यज्ञ के धुएं पर हुए अन्य मापन बताते हैं कि दहन के दौरान सूक्ष्म कण और कुछ गैसें बढ़ सकती हैं। इसलिए यह कहना कि हवन हमेशा हवा को शुद्ध करता है, उपलब्ध विज्ञान से आगे बढ़कर दावा करना होगा। उसी तरह, कुछ प्रयोगों में प्रदूषक बढ़ने के आधार पर हर धार्मिक अनुष्ठान के आध्यात्मिक महत्त्व को नकारना भी उचित नहीं होगा।
व्यावहारिक दृष्टि से हवन खुली या पर्याप्त हवादार जगह पर करना, धुएं के सीधे संपर्क को कम रखना और बच्चों, बुजुर्गों तथा सांस की बीमारी वाले लोगों को धुएं से दूर रखना समझदारी है। आस्था मनुष्य को अर्थ और संबल दे सकती है। विज्ञान हमें यह समझने में मदद करता है कि किसी क्रिया के भौतिक परिणाम क्या हैं। दोनों के बीच संतुलन तभी संभव है, जब धार्मिक परंपरा का सम्मान करते हुए उसके बारे में किए गए वैज्ञानिक दावों को प्रमाण की कसौटी पर भी परखा जाए।
हवन की अग्नि में आहुति देना आस्था का विषय है। लेकिन उस अग्नि से उठने वाले धुएं का प्रभाव जानना विज्ञान का विषय है। दोनों प्रश्नों के उत्तर अलग हो सकते हैं—और यही अंतर समझना इस परंपरा की गंभीर पड़ताल का पहला कदम है।
स्रोत:- 2007: औषधीय धुएं और हवा में मौजूद जीवाणुओं पर शोध — पबमेड। 2022: हवन-सामग्री और वायु-गुणवत्ता पर अध्ययन — आईजीआई ग्लोबल। 2023: यज्ञ के धुएं में सूक्ष्म कणों और गैसों का मापन — इंटरडिसिप्लिनरी जर्नल ऑफ यज्ञ रिसर्च। विश्व स्वास्थ्य संगठन: घरेलू वायु-प्रदूषण और स्वास्थ्य जोखिम — आधिकारिक तथ्यपत्र।
नोट: हवन के जीवाणुरोधी प्रभाव के कुछ प्रयोगात्मक संकेत मौजूद हैं, लेकिन पूरे वायुमंडल को शुद्ध करने का दावा अभी प्रमाणित नहीं है। हवन के धुएं से सूक्ष्म कण और गैसें बढ़ने के प्रमाण भी उपलब्ध हैं। इसलिए स्टोरी में आस्था, प्रयोगशाला के परिणाम और व्यापक पर्यावरणीय दावों को अलग-अलग रखना आवश्यक है।
Discover more from
Subscribe to get the latest posts sent to your email.



