आंकड़ों का एक्स-रे: दुर्घटनाएं बढ़ीं, मौतें उससे भी तेज बढ़ीं
KKN ब्यूरो। एक सड़क। एक तेज रफ्तार वाहन। कुछ सेकंड की लापरवाही। फिर अचानक चीख, भीड़, टूटा हुआ हेलमेट और सड़क पर बिखरा हुआ सामान। कुछ देर बाद एंबुलेंस आती है। पुलिस पहुंचती है। अस्पताल का दरवाजा खुलता है। और कई बार कहानी वहीं खत्म हो जाती है। लेकिन क्या बिहार में सड़क दुर्घटनाएं सिर्फ कुछ सेकंड की गलती हैं? अगर ऐसा है तो पिछले पांच वर्षों में दुर्घटनाओं की संख्या लगातार क्यों बढ़ी? मौतों का आंकड़ा क्यों बढ़ता गया? 2020 में 6,699 लोगों की जान लेने वाली सड़क दुर्घटनाएं 2024 में 9,347 मौतों तक कैसे पहुंच गईं? और सबसे बड़ा सवाल—अगर सरकार के पास ब्लैक स्पॉट की सूची है, ट्रैफिक नियम हैं, कैमरे हैं, चालान हैं, एंबुलेंस हैं और सड़क सुरक्षा की पूरी मशीनरी है, तो फिर बिहार की सड़कें हर साल इतनी जान क्यों मांग रही हैं? आंकड़े चीख रहे हैं—सड़क दुर्घटनाएं लगातार बढ़ीं है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार बिहार में 2020 में 8,639 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुई थीं। 2021 में यह संख्या बढ़कर 9,553, 2022 में 10,801, 2023 में 11,014 और 2024 में 11,610 हो गई।
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दुर्घटनाओं से भी ज्यादा डरावना है मौतों का ग्राफ
2020 में बिहार में सड़क दुर्घटनाओं में 6,699 लोगों की मौत हुई। 2021 में यह संख्या बढ़कर 7,660 हो गई। 2022 में 8,898। 2023 में मामूली कमी के साथ 8,873। लेकिन 2024 में आंकड़ा फिर उछलकर 9,347 पहुंच गया। यानी 2020 से 2024 के बीच सड़क दुर्घटनाओं में मौतें लगभग 39.5% बढ़ीं। 2023 के मुकाबले भी 2024 में मौतों में लगभग 5.3% की वृद्धि हुई। यह महज संख्या नहीं है। 9,347 परिवार। 9,347 घर। 9,347 ऐसी कहानियां, जिनमें किसी का बेटा, किसी का पिता, किसी की मां, किसी का भाई या किसी की पत्नी सड़क से घर वापस नहीं लौटी।
बिहार में हादसे इतने जानलेवा क्यों हैं?
2024 में बिहार में 11,610 सड़क दुर्घटनाओं में 9,347 लोगों की मौत दर्ज हुई। यानी प्रति 100 दर्ज दुर्घटनाओं पर लगभग 80.5 मौतें। राष्ट्रीय स्तर पर 2024 में यह अनुपात लगभग 36.3 मौत प्रति 100 दुर्घटनाएं था। यानी बिहार का दर्ज accident-fatality ratio राष्ट्रीय औसत से बहुत अधिक था। लेकिन यहां सावधानी जरूरी है—इसे सीधे यह नहीं कहा जा सकता कि हर दुर्घटना में 80% लोगों की मौत होती है। यह कुल दर्ज दुर्घटनाओं और कुल मौतों का अनुपात है, व्यक्तिगत दुर्घटना में मृत्यु की संभावना नहीं। फिर भी यह अनुपात एक गंभीर संकेत देता है—बिहार में सड़क दुर्घटनाएं अपेक्षाकृत अधिक घातक हैं।
राष्ट्रीय राजमार्गों पर भी मौत का बड़ा हिस्सा
सड़क सुरक्षा की कहानी में राष्ट्रीय राजमार्गों को अलग से देखना जरूरी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार बिहार में राष्ट्रीय राजमार्गों पर सड़क दुर्घटनाओं में मौतें 2020 में 3,285 थीं। 2021 में 3,517, 2022 में 3,953 और 2023 में 4,078 तक पहुंचीं। 2024 में यह संख्या कुछ घटकर 4,012 हुई। यानी 2024 में बिहार की कुल सड़क दुर्घटना मौतों का लगभग 43% हिस्सा राष्ट्रीय राजमार्गों पर दर्ज हुआ। इससे एक बड़ा सवाल निकलता है— क्या सड़क चौड़ी होने का अर्थ सड़क सुरक्षित होना भी है? जरूरी नहीं। तेज रफ्तार, सड़क डिजाइन, कट, अनियंत्रित प्रवेश, पैदल यात्रियों की आवाजाही, भारी वाहनों की मौजूदगी और रात में दृश्यता जैसी कई चीजें सड़क को खतरनाक बना देती हैं।
दुर्घटना का पहला दुश्मन—रफ्तार
केंद्र सरकार खुद सड़क दुर्घटनाओं के प्रमुख कारणों में over-speeding, मोबाइल फोन का इस्तेमाल, नशे में ड्राइविंग, wrong-side driving, lane indiscipline, लाल बत्ती तोड़ना, हेलमेट और सीट बेल्ट का इस्तेमाल न करना, वाहन की खराब स्थिति और सड़क/मौसम की स्थिति को गिनाती है। लेकिन बिहार की सड़क पर समस्या सिर्फ चालक की नहीं है। अगर किसी सड़क पर लगातार दुर्घटनाएं हो रही हैं तो यह पूछना भी जरूरी है— क्या सड़क का डिजाइन सुरक्षित है? क्या वहां पर्याप्त संकेतक हैं? क्या डिवाइडर ठीक है? क्या रात में रोशनी है? क्या पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित crossing है? क्या स्पीड नियंत्रण की व्यवस्था है? क्या ब्लैक स्पॉट को वास्तव में ठीक किया गया? यही वह जगह है जहां सड़क सुरक्षा को सिर्फ “ड्राइवर की गलती” मानने की सोच अधूरी पड़ जाती है।
बिहार में 195 ब्लैक स्पॉट—फिर भी सवाल कायम
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के Black Spot Management Information System में बिहार में 195 ब्लैक स्पॉट सूचीबद्ध हैं। ब्लैक स्पॉट का अर्थ ऐसे दुर्घटना-प्रवण स्थानों से है जहां बार-बार गंभीर हादसे होते हैं और जहां सड़क इंजीनियरिंग के जरिए जोखिम कम करने की जरूरत होती है। यहां असली सवाल सूची बनाने का नहीं है। सवाल है—कितने ब्लैक स्पॉट स्थायी रूप से ठीक हुए? कहां crash barrier लगाया गया? कहां सड़क की geometry बदली गई? कहां lighting सुधारी गई? कहां speed calming measures लगाए गए और जहां सुधार हुआ, वहां दुर्घटनाएं कितनी घटीं? सड़क सुरक्षा की सफलता का पैमाना कितने चालान काटे गए नहीं, बल्कि कितनी जानें बचीं होना चाहिए।
सिर्फ चालान से नहीं बचेगी जान
बिहार में ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई जरूरी है। लेकिन सड़क सुरक्षा का स्थायी समाधान केवल चालान और जुर्माने में नहीं है। केंद्र की सड़क सुरक्षा रणनीति भी 4E—Education, Engineering, Enforcement और Emergency Care पर आधारित है। यानी— Education स्कूल से ही सड़क सुरक्षा की शिक्षा। Engineering सड़क, पुल, डिवाइडर, मोड़, ब्लैक स्पॉट और वाहन डिजाइन में सुरक्षा। Enforcement ओवरस्पीडिंग, शराब, हेलमेट, सीट बेल्ट और गलत दिशा में वाहन चलाने पर लगातार कार्रवाई। Emergency Care हादसे के बाद गोल्डन ऑवर में घायल को अस्पताल पहुंचाना। इन चारों में से किसी एक की कमजोरी पूरी व्यवस्था को कमजोर कर सकती है।
गोल्डन ऑवर: हादसे के बाद भी जिंदगी बच सकती है
सड़क दुर्घटना में मौत हमेशा घटनास्थल पर नहीं होती। कई बार घायल व्यक्ति अस्पताल पहुंचने से पहले दम तोड़ देता है। यही वजह है कि Good Samaritan और त्वरित emergency response बेहद महत्वपूर्ण हैं। केंद्र की Good Samaritan योजना में दुर्घटना पीड़ित को गोल्डन ऑवर में अस्पताल पहुंचाने वाले मददगार को प्रोत्साहित करने का प्रावधान है। बिहार में भी इस व्यवस्था को गांव और प्रखंड स्तर तक मजबूत करना होगा। हर किलोमीटर पर एंबुलेंस खड़ी करना संभव नहीं, लेकिन हर दुर्घटना के बाद मदद पहुंचने में लगने वाला समय कम करना संभव है।
सवाल सरकार से नहीं, पूरी व्यवस्था से है
बिहार में सड़क दुर्घटनाओं का पांच साल का आंकड़ा किसी एक विभाग पर आरोप लगाने के लिए पर्याप्त नहीं है। यह एक system failure की तरफ इशारा करता है। सड़क बनाने वाला विभाग अलग। ट्रैफिक पुलिस अलग। परिवहन विभाग अलग। स्वास्थ्य विभाग अलग। स्थानीय प्रशासन अलग और वाहन चलाने वाला नागरिक अलग। लेकिन दुर्घटना होने के बाद ये सारी व्यवस्थाएं एक ही जगह मिलती हैं—सड़क पर। इसलिए बिहार को जिला-स्तर पर नहीं, बल्कि Road Safety Corridor के हिसाब से काम करने की जरूरत है। हर जिले के शीर्ष 20 दुर्घटना-स्थलों की सूची बने। हर जगह का वैज्ञानिक audit हो। हर ब्लैक स्पॉट के लिए deadline तय हो। ओवरस्पीडिंग के लिए automated enforcement बढ़े। शराब पीकर ड्राइविंग की जांच नियमित हो। दो-पहिया चालकों के लिए helmet enforcement वास्तविक हो। स्कूल-कॉलेज के आसपास pedestrian safety अनिवार्य हो और सबसे महत्वपूर्ण—हर गंभीर दुर्घटना का independent crash investigation हो।
सड़क पर मरने वाला सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है
सरकारी रिपोर्ट में 9,347 एक संख्या है। लेकिन उस संख्या को अगर गांव की भाषा में पढ़ें तो वह 9,347 अधूरे परिवार हैं। कहीं खेत में हल चलाने वाला आदमी नहीं लौटा। कहीं स्कूल जाने वाला बच्चा नहीं लौटा। कहीं घर की EMI भरने वाला युवक नहीं लौटा। कहीं एक महिला का पति नहीं लौटा। सड़क पर दुर्घटना कुछ सेकंड में होती है। लेकिन उसका शोक कई पीढ़ियों तक चलता है। इसलिए बिहार की सड़क सुरक्षा का अगला लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि अगले साल कितने कम चालान काटे गए। लक्ष्य होना चाहिए— अगले साल कितने परिवारों के दरवाजे पर मौत की खबर नहीं पहुंची। क्योंकि सड़क का विकास तभी विकास है, जब सड़क लोगों को मंजिल तक पहुंचाए—मौत तक नहीं।
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