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मां के दिल जैसा दुनिया मे कोई दिल नही

सुहाग खोकर भी बच्चो पर लुटाती रही ममता की छांव 

कलेजे के टुकड़ो को रखा आंचल की छांव मे 

बानगी बना सुनिता की ममता 

सुनिता पर टूटा है दुखो का पहाड़ 

मजदूरी कर बेटो का कम नही होने दिया उत्साह

संतोष कुमार गुप्ता

मुजफ्फरपुर। माई के दूधवा अइसन केहूं के मिठाई ना होई, जे अभागा होई हे उनका घर मे माई ना होई। नंदना पंचायत के गांगी छपड़ा गांव मे एक मां की दर्द भरी दास्तान सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जायेंगे। उस पर दुखो का पहाड़ टूट पड़ा है। वावजूद वह बच्चो पर ममता लूटा रही है। उसकी ममता के छांव मे बच्चे को कभी ना लगा की उसके सिर से पिता का साया उठ चुका है। गांगी छपड़ा गांव की सुनिता देवी बच्चो के लिए आदर्श मां बन गयी है। उसकी ममता अन्य महिलाओ के लिए बानगी है।

39 साल की सुनिता देवी सुबह उठ कर बच्चो के लिए टीफीन तैयार करती है। इसके बाद वह अपने कलेजे के टुकड़े को तैयार कर स्कूल भेजती है। इसके बाद वह खेतो मे मजदूरी करने निकल पड़ती है। वह बच्चो के अच्छी परवरिश के लिए खेतो मे कटनी व बनिहारी करती है। उस पैसे से बच्चो के लिए खुशी खरीदती है। उसके लालन पालन व पठन पाठन का समाग्री खरीदती है। वह कहती है कि एक न एक दिन उसका राजदुलारा जरूर नाम करेगा।

सुनिता की दुख भरी दास्तान कुछ इस तरह है। 20 साल पूर्व उसने गांव के ही मोहन महतो के साथ सात फेरे लिये। किंतु एक बच्चे की मां बनने के बाद उसका सुहाग उजड़ गया। मोहन को राजयक्ष्मा बिमारी था। वह उचित इलाज के अभाव मे दम तोड़ दिया। इसके बाद सुनिता के समक्ष मुसिबत बढ गया। उसने परिवार के अन्य सदस्यो के दबाब मे दूसरी शादी रचाने का ऐलान किया। उसने अपने देवर अकलू महतो को दुसरा जीवनसाथी चुन लिया। इसके बाद नये पति से उसको तीन पुत्र की प्राप्ति हुई। किंतु शादी के छह साल बाद ही उसका दूसरा पति का देहावसान हो गया। कटौझा पुल पर सड़क दुर्घटना मे उनकी जान चली गयी। इसके बाद सुनिता पुरी तरह टूट गयी। किंतु जीवन की गाड़ी को पटरी से उतरने नही दिया। वह चौखट लांघ कर मजदूरी करने लग गयी। प्रथम पति से पुत्र बबलू कुमार 18 साल, दुसरे पति से पुत्र चंदन कुमार 15 साल,रितिक कुमार 10 साल,गोलू कुमार सात साल की खातिर कठीन परिश्रम करने लगी।

नतिजतन बबलू आठंवी की पढाई कर मां के कामो मे सहयोग कर रहा है। जबकि चंदन सातवा,रितिक छठा व गोलू चौथा क्लास का तेजतर्रार छात्र है। मां बच्चो की खातिर सुबह मे ही बिछावन छोड़ देती है। किंतु कमइनी व कटनी से उतने पैसे नही मिलते जिससे उसको सब कुछ मिल जाये। उसके सामने आर्थिक संकट मुंह बाये खड़ी है। अब वह जीविका समूह से भी जुड़ गयी है। वह गुलाब जीविका ग्राम संगठन अंतर्गत कमल जीविका स्वय सहायता समूह से जुड़कर महिलाओ को आगे बढने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। किंतु उस से आज भी अफसोस है की सड़क दुर्घटना मे पति की मौत पर सरकारी मुआवजा अब तक नही मिल सका है।

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