होमNationalरेजांगला के युद्ध में छिपा है शौर्य की अद्भूत दास्तान

रेजांगला के युद्ध में छिपा है शौर्य की अद्भूत दास्तान

Published on

KKN न्यूज ब्यूरो। बेशक, 1962 के युद्ध में हम चीन से पराजित हुए थे। इसमें कोई दो राय नहीं है कि चीन ने हमारे 38 हजार वर्ग किलीमीटर का जमीन कब्जा कर लिया और अचानक से युद्ध विराम की घोषणा करके, दुनिया में भारत को नीचा दिखाने की कोई कसर बाकी भी नहीं छोड़ी। पर, क्या 62 के युद्ध की सिर्फ इतनी सी हकीकत है? क्या कभी आपके मन में यह सवाल उठा कि हम हारे कैसे? क्या हुआ होगा सीमा पर? हमारे बहादुर और जांबाज सैनिको को अपना पराक्रम दिखाने का मौका मिला भी या नही? ऐसे और भी कई सवाल है। इसका जवाब तलाशने के लिए मैंने 62 के युद्ध से जुड़े ऐतिहासिक दस्ताबेजो का अध्ययन किया है। अध्ययन के दौरान कई जानकारी हाथ लगी। पर, जो सबसे महत्वपूर्ण जानकारी थी, वह रेजांगला के समीप हुई युद्ध से मिला। उन दिनो भारत और चीन के बीच रेजांगला पोस्ट पर सबसे भयंकर और खतरनाक युद्ध हुआ था। रेजांगला का यह पोस्ट लद्दाखा के चुशुल घाटी में है। रेजांगला का यह युद्ध भारत और चीन के बीच 1962 में हुए युद्ध का सबसे टर्निंग प्वाइंट माना जाता है। मेरा मानना है कि रेजागंला के युद्ध को ठीक से समझ लिया जाये तो चीन के साथ 1962 में मिली पराजय को समझना आसान हो जायेगा।

थ्रीनॉटथ्री से किया ऑटोमेटिक रायफल का मुकाबला

बात 18 नवंबर, वर्ष 1962 की है। लद्दाख के चुशुल घाटी में सुबह की सूरज निकलने से ठीक पहले घना कोहरा के साथ अंधेरा अभी ठीक से छठा भी नहीं था। चारो ओर बर्फ से ढ़की घाटी और फिंजा में पसरी अजीब सी खामोशी। इसी खामोशी के बीच रेजांगला पोस्ट की रक्षा में तैनात थी, भारतीय फौज की छोटी ठुकड़ी। भारत के जवान खामोशी के उस पार बैठे खतरे को ठीक से पहचान पाते, इससे पहले सुबह के ठीक साढ़े तीन बजे, घाटी का शांत माहौल अचानक गोलियों की तड़-तड़ाहट से गूंजने लगा। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी PLA के करीब तीन हजार जवानो ने इंडिया के रेजांगला पोस्ट पर धावा बोल दिया। चीन के सैनिको के पास भारी मात्रा में गोला-बारूद था। सेमी आटोमेटिक रायफल था और आर्टिलरी सपोट भी था। इधर, भारत की ओर से मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में चुशुल घाटी में 13 कुमाऊं रेजिमेंट की एक बेहद छोटी टुकड़ी मौजूद थीं। भारतीय सैन्य टुकड़ी में मात्र 120 जवान थे। वह भी थ्री-नॉट-थ्री रायफल के सहारे। थ्री-नॉट-थ्री रायफल को फायर करने से पहले प्र्रत्येक गोली लोड करना पड़ता था और खोखा को खींच कर निकालना पड़ता था। भारतीय सैनिक को उस वक्त वहां कोई आर्टिलरी सपोर्ट भी नहीं था। एक ओर चीन के तीन हजार की विशाल फौज और दूसरी ओर भारत के मात्र 120 जवान, वह भी थ्री-नॉट-थ्री रायफल के सहारे।

क्यों नहीं मिला आर्टिलरी सपोर्ट

चुशुल घाटी की खतरनाक चोटियों में उस वक्त भारत की ओर से आर्टिलरी का सपोर्ट भेजना मुमकिन नहीं था। क्योंकि, भारत की ओर से वहां तक आर्टिलरी को लेजाने के लिए रास्ता नहीं था। युद्ध शुरू होने पर रेजांगला के जवानो को अपने विवेक पर छोड़ दिया गया था। जरुरत पड़ने पर पोस्ट छोर कर पीछे हटने का आदेश भी था। इस बीच किसी को उम्मीद नहीं थीं कि चीन की सेना रेजांगला में इतना जबरदस्त हमला करेगी। ऐसे में रेजांगला के पोस्ट पर मौजूद मेजर शैतान सिंह को निर्णय लेना था। बतादें कि मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में रेजांगला में कुमाउं रेजिमेंट के 120 बहादुर सैनिक मोर्चा सम्भाले हुए थे। खराब मौसम की वजह से रेजांगला में मौजूद सैनिको का अपने बेस कैंप से रेडियो संपर्क टूट चुका था। इस बीच मेजर शैतान सिंह ने पोस्ट पर डटे रहने और पोस्ट की रक्षा करने का निर्णय लिया। फिर जो हुआ, वह कल्पना से परे है। बेशक हमारे सैनिक कम थे, साजो-सामान का घोर अभाव था। किंतु, उनके बुलन्द हौसलो की दास्तान इतिहास में दर्ज होने वाला था। कुमाउं रेजिमेंट के इन वीर जाबांजो को अंजाम पता था। वह जान रहे थे कि युद्ध में उनकी हार तय है। लेकिन इसके बावजूद बेमिसाल बहादुरी का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने अपने बेमिसाल शौर्य का प्रदर्शन किया। मेजर शैतान सिंह की टुकड़ी ने आखिरी आदमी, आखिरी राउंड और आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ने का हुंकार कर दिया। नतीजा, 13 कुमाऊं के 120 जवानों ने युद्ध के पहले दो घंटे में ही चीन के 1,300 सैनिको को मार गिराये। बाकी के चीनी सैनिक भारतीय पराक्र्रम के सामने टिक नहीं पाये और मैदान छोड़ कर भाग खड़े हुए। तीन- तीन गोली लगने के बाद भी मेजर शैतान सिंह ने पोस्ट नहीं छोरा। हालांकि, बाद में वे शहीद हो गये। इस लड़ाई में भारत के 117 सैनिक शहीद हुए और बंदी बने एक सैनिक भी चीन की सरहद को पार करके भागने में कामयाब हो गया। मेजर शैतान सिंह को मरनोपरान्त परमवीर चक्र से सम्मानिक किया गया था। बाद में कुमाउं रेजिमेंट के इस सैन्य टुकड़ी को पांच वीर चक्र और चार सेना पदक से सम्मानित किया गया। सैन्य इतिहास में किसी एक बटालियन को एक साथ बहादुरी के इतने पदक पहले कभी नहीं मिले थे।

जिंदा बचे एक जवान ने सुनाई कहानी

रेजांगला के उस युद्ध में जिन्दा बचे रामचन्द्र यादव को बाद में मानद कैप्टन की उपाधी से नबांजा गया। रामचंद्र यादव 19 नवंबर को कमान मुख्यालय पहुंचे थे। इसके बाद 22 नवंबर तक उनको जम्मू के एक आर्मी हॉस्पिटल में रखा गया। रामचन्द्र यादव ने अपने सैनिक अधिकारियों को युद्ध की जो कहानी बताई। दरअसल, वह रोगंटे खड़ी करने वाला है। रामचन्द्र यादव ने बताया कि मेजर शैतान के आदेश पर वे इस लिए जिन्दा बचे, ताकि पूरे देश को 120 जवानों की वीर-गाथा का पता चल सके। उनके मुताबिक युद्ध के दौरान चीन की सेना दो बार पीछे हटी और री-इनफ्रोर्समेंट के साथ फिर से धाबा बोल दिया। शुरू में चीन की ओर से काफी उग्र हमला हुआ था। किंतु, भारत की ओर से की गई जवाबी फायरिंग से चीन के सैनिको का हिम्मत टूट गया। वे पीछे हटे और दुबारा हमला किया। इधर, भारतीय सैनिकों का गोला-बारूद खत्म होने लगा था। मेजर शैतान सिंह ने बैनट के सहारे और खुले हाथों से युद्ध लड़ने का फैसला कर लिया। उस वक्त वहां एक सिपाही मौजूद था। उसका नाम राम सिंह था। दरअसल, वह रेसलर रह चुका था। मेजर शैतान सिंह से आदेश मिलते ही सिपाही राम सिंह टूट पड़ा और एक साथ दो-दो चीनी सैनिक को पकड़-पकड़ कर और उसका सिर आपस में टकरा कर दोनो को एक साथ मौत के घाट उतारने लगा। राम सिंह ने आधा दर्जन से अधिक चीनी सैनिको को थोड़ी देर में ही मौत के घाट उतार दिए। इस बीच चीन के एक सैनिक ने राम सिंह के सिर में गोली मार दी। शहीद होने से पहले रमा सिंह के रौर्द रूप को देख कर चीनी खेमा में हड़कंप मच गया था।

रेजांगला ही क्यों

यहां आपको बताना जरुरी है कि 13 कुमाऊं के यह सभी 120 जवान दक्षिण हरियाणा के रहने वाले थे। इनमें से अधिकांश गुड़गांव, रेवाड़ी, नरनौल और महेंद्रगढ़ जिलों के थे। रेवाड़ी और गुड़गांव में रेजांगला के वीरों की याद में भव्य स्मारक बनाये गये है, जो आज भी मौजूद है। इतना ही नहीं बल्कि, रेवाड़ी में हर साल रेजांगला शौर्य दिवस मनाया जाता है और यह बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। अभी तक आपके मन में सवाल उठने लगा होगा कि पहाड़ की बिहरो में हुई इस युद्ध को रेजांगला का युद्ध क्यों कहा जाता है? दरअसल, लद्दाख के चुशुल घाटी में एक पहाड़ी दर्रा है। इसको स्थानीय लोग रेजांगला का दर्रा बोलते है। चूंकि, इसी दर्रा के समीप वर्ष 1962 में 13 कुमाउं का अंतिम दस्ता मौजूद था और इसी के समीप यह भीषण युद्ध हुआ था। लिहाजा, इसको रेजांगला का युद्ध कहा जाने लगा। लद्दाख की दुर्गम बर्फीली चोटी पर चीनी सेना के साथ हुए रेजांगला युद्ध की गौरव गाथा अद्वितीय है। हम आपको बता चुकें है कि यह युद्ध 18 नवम्बर की सुबह में शुरू हुई थीं। किंतु, भारतीय सेना के सामने परीक्षा की घड़ी 17 नवंबर की रात में ही शुरू हो चुकीं थीं। दरअसल, 17 नवम्बर की रात इस इलाके में जबरदस्त बर्फिली तूफान आई थी और इस तूफान के कारण रेजांगला की बर्फीली चोटी पर मोर्चा संभाल रहे भारतीय जवानों का संपर्क अपने बटालियन मुख्यालय से टूट गया था।

बहादुरी की जगह चकमा दे रहे थे चीनी सैनिक

तेज बर्फीले तूफान के बीच 18 नवम्बर की सुबह साढ़े 3 बजे चीनी सैनिक इलाके में घुस गए। अंधेरे में हमारे बहादुर सैनिको ने चीनी टुकड़ी पर फायर झोक दिया। करीब एक घंटे के बाद पता चला है कि चिनियों ने याक के गले में लालटेन लटका कर हमारे सैनिक को चकमा देने का काम किया है। दरअसल, चीनी सैनिक उस बेजुबान जानवर को ढ़ाल बना कर पीछे से भारतीय फौज पर हमला कर रहे थे। सुबह करीब 5 बजे में मौसम थोड़ा ठीक होते ही भारत के सैनिक इस चाल को समझ कर अभी सम्भले भी नहीं थे कि इससे पहले चीनी सैनिको की एक बड़ी टुकड़ी सामने आ गई। उन्होंने झुंड में हमला करना शुरू कर दिया। किंतु, भारत के जवाबी फायरिंग के सामने वे टिक नहीं सके। पीछे हटे और थोड़ी देर बाद दुबारा से हमला कर दिया। सुबह के करीब 8 बजने को था। भारतीय सेना के पास गोली नहीं बची थी। बावजूद इसके हमारे बहादुर सैनिको ने हार नहीं मानी। लड़ाई जारी रहा। बैनट से लड़े। खुले हाथो से लड़े। उन्हीं का बन्दुक छिन कर उन्हीं से लड़े। तबतक लड़ते रहे, जबतक शहीद नहीं हो गये। कहतें हैं कि इस लड़ाई में चीन का इतना जबरदस्त नुकसान हो गया कि चीन के सैनिक रेजांगला से एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाया। हमारे सैनिको ने चीनी सैनिको को सिर्फ गलवान में ही नहीं पटका। इससे पहले रेजांगला में भी वह हमारा पराक्रम देख चुका है। यह सच है कि 62 में रेजांगला का युद्ध हम हार गये। पर, इससे भी बड़ा सच ये है कि चीन के दिलो दिमाग पर भारतीय पराक्रम का मुहर भी लगा गये।

KKN लाइव WhatsApp पर भी उपलब्ध है, खबरों की खबर के लिए यहां क्लिक करके आप हमारे चैनल को सब्सक्राइब कर सकते हैं।

KKN Public Correspondent Initiative


Discover more from

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Latest articles

मीनापुर के गांवों को स्मार्टफोन ने कितना बदला? खेती, पढ़ाई और रोजगार की नई कहानी

मीनापुर के गांव में अब जेब में सिर्फ फोन नहीं, पूरा बाजार है मीनापुर के...

हिंद केसरी यादव: मीनापुर की राजनीति में वह नाम, जिसने आंदोलन को सड़क से सदन तक पहुंचाया

पांचवीं पुण्यतिथि पर दरहीपट्टी में श्रद्धांजलि सभा, वक्ताओं ने कहा—अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाना...

मीनापुर की महिलाएं घर चलाने में कितना योगदान देती हैं? गांव की छिपी अर्थव्यवस्था का सच

मीनापुर की अर्थव्यवस्था का आधा हिस्सा शायद दिखाई ही नहीं देता मीनापुर की अर्थव्यवस्था का...

क्या अमेरिका पर भरोसा करने का दौर खत्म हो रहा है? भारत की नई चुनौती

दुनिया की राजनीति में अमेरिका की ताकत पर शायद ही कोई सवाल उठाता है,...

More like this

चुनाव आयोग पर क्यों मचा है हंगामा? 14 आपत्तियों से उठे सवाल, ज्ञानेश कुमार की भूमिका और सत्ता पक्ष की असहजता की पूरी पड़ताल

भारत में चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं हैं। चुनाव वह बुनियादी व्यवस्था...

ट्रंप के दौर में क्या अमेरिका की वैश्विक साख घटी? आंकड़े क्या कहते हैं

KKN ब्यूरो। एक समय था जब दुनिया के किसी संकट पर एक सवाल लगभग...

विश्वकर्मा पूजा: मशीन पर फूल चढ़ाने की परंपरा या इंसान के हुनर को सलाम?

ऋग्वेद के ‘विश्वकर्मन्’ से आधुनिक कारखाने तक पहुंची परंपरा में आखिर छिपा संदेश क्या...

हिंदी सिर्फ एक भाषा नहीं, भारत की चलती-फिरती कहानी है

हिंदी दिवस पर विशेष: क्या आप जानते हैं कि हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ नहीं, ‘राजभाषा’...

क्या नकारात्मक सोच इंसान को उसी अंधेरे में धकेल देती है, जिसे वह दुनिया में खोज रहा होता है?

हर घटना में षड्यंत्र, हर परंपरा में खामी, हर व्यक्ति में स्वार्थ और हर...

एनर्जी ड्रिंक से पैकेटबंद खाने तक: सुविधा के नाम पर शरीर के साथ कितना बड़ा सौदा?

बाजार की चमकदार पैकेजिंग के भीतर छिपी चीनी, नमक, वसा और कैफीन शरीर को...

डायबिटीज लाइलाज है या इलाज का तरीका पुराना पड़ चुका है?

भारत में 101 मिलियन लोगों को डायबिटीज, 136 मिलियन प्री-डायबिटीज की जद में; दुनिया...

डैम, मानव सभ्यता की प्यास बुझाने वाला वरदान या आने वाली पीढ़ियों के लिए खड़ा किया जा रहा जल-खतरा?

नदियों को बांधकर इंसान ने पानी, बिजली और खेती पर नियंत्रण हासिल किया। लेकिन...

वह सुबह, जब पहाड़ नदी बन गया

26 अगस्त की सुबह 8:37 बजे हिमालय में कुछ ऐसा टूटा, जिसकी गूंज सैकड़ों...

नेपाल की बाढ़ में चीन की चाल? ग्लेशियर टूटने का सच, हिमालय का बढ़ता खतरा और भारत के लिए आने वाली बड़ी आफत

नेपाल-तिब्बत सीमा पर 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने सैकड़ों जिंदगियां निगल लीं।...

फरक्का जलसंधि: बिहार की बाढ़, बंगाल का बंदरगाह और बांग्लादेश का पानी—30 साल बाद फिर क्यों खड़ा हुआ सबसे पेचीदा सवाल?

1996 की गंगा जलसाझेदारी संधि दिसंबर 2026 में समाप्त होने वाली है। बिहार में...

चीन का खतरा: सीमा पर सैनिकों से ज्यादा खतरनाक है सड़क, गांव और ब्रह्मपुत्र पर बनता नया सामरिक जाल

अरुणाचल में 60 किलोमीटर घुसपैठ का दावा निकला भ्रामक, लेकिन खतरा पूरी तरह काल्पनिक...

पढ़ाई महंगी, नौकरी और परीक्षा पर भरोसा भी संकट में

कैंपस से सड़क तक बढ़ती बेचैनी सिर्फ बेरोजगारी की कहानी नहीं; यह उस पीढ़ी...

नेपाल की सुलगती सरहद: सांप्रदायिक हिंसा, राजनीतिक बेचैनी और भारत के लिए बढ़ती चुनौती

जब पड़ोसी देश में आग लगती है, तो धुआं सीमाएं नहीं पहचानता... KKN ब्यूरो। भारत...

पेपर लीक का काला कारोबार: किसने चुराए करोड़ों युवाओं के सपने, कौन है इस संगठित अपराध का असली सरगना? (भाग–2)

क्या पेपर लीक केवल आज की समस्या है? KKN ब्यूरो। यदि कोई यह मानता...