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भारत को मिली आजादी या हुआ सत्ता का हस्तान्तरण?

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एक ऐसी सच्चाई जिसे देश से छिपाया गया

वह 14 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि का वक्त था। पंडित जवाहर लाल नेहरु और लॉर्ड माउन्ट बेटेन ने एक मसौदे पर जैसे ही हस्ताक्षर किये, पूरा देश खुशियों से झुम उठा। हालांकि, इस खुशी में एक दर्द भी छिपा था। इसी हस्ताक्षर से भारत के दो टुकड़े हो गए और दुनिया के नक्शे पर एक नया देश पाकिस्तान बन गया। हमें बताया कि हम आजाद हो गये और हम आज भी इसी गुमान में जी रहें हैं। पर, यह सच नहीं है। सच्चाई ये है कि पंडित जवाहर लाल नेहरु और लॉर्ड माउन्ट बेटेन ने जिस मसौदे पर हस्ताक्षर किए थे, वह महज सत्ता का हस्तान्तरण भर था। यानी ट्रांसफर ऑफ पावर…।
यह एक संधि मात्र है
दरअसल, हम जिसे भारत के आजादी का संधि मानतें चलें आ रहें हैं। वास्तव में उसकी हकीकत डरावनी है। इस पर बात करने से पहले आपको जानना जरुरी है कि अंग्रेजों ने सन 1615 से लेकर 1857 तक भारत के विभिन्न रजबाड़ो के साथ कुल 565 संधि किये। किंतु, 14 अगस्त 1947 की रात में जो संधि हुआ वह भारत के भविष्य के लिए एक बड़ा प्रश्नचिन्ह छोड़ गया है।
इन्डिपेंटेन्ट बनाम डोमिनियन स्टेट
जान कर हैरानी होगी कि 14 अगस्त की रात हमें डोमिनियन स्टेट अर्थात बड़े राज्य के अधीन एक छोटे राज्य का दर्जा हासिल हुआ था। चौकाने वाली बात ये कि आखिरकार देश को यह बात बताया क्यों नहीं गया? संधि के मुताबिक ब्रिटेन की महारानी हमारे भारत की भी महारानी है और वह आज भी भारत की नागरिक है। उन्हें भारत आने के लिए वीजा की जरुरत नहीं होती है। ताज्जुब की बात ये है कि वह भारत सहित 71 अन्य देशो की महारानी है।
कहां थे महात्मा गांधी
भारत की आजादी के लिए महात्मा गांधी ने 1917 से ही संघर्ष करना शुरू कर दिया था और जिस रात देश को आजादी मिली वह दिल्ली से दूर कोलकाता के नोआखाली में थे। सवाल उठना लाजमी है कि 14 अगस्त की रात समझौते वाली स्थान पर महात्मा गांधी क्यों नहीं थे? जबकि, सभी को पहले से मालुम था कि 14 अगस्त की मध्य रात्रि को आजादी के मसौदे पर हस्ताक्षर होने है। फिर ऐसे मौके पर महात्मा गांधी मौजूद क्यों नहीं थे? हालांकि, कुछ लोगो का कहना है कि नोआखाली में दंगा भड़क गया था। लिहाजा, गांधीजी नोआखाली में ही रुके रह गये।
कॉमनबेल्थ का मतलब
अक्सर आप कॉमनबेल्थ नेशन और कॉमनबेल्थ गेम का नाम सुनतें होंगे। इसका मतलब होता है समान संपत्ति। अब सवाल उठता है कि किसकी समान संपत्ति? दरअसल, इसी शब्द के अंदर छिपा है संधि का राज। यह ब्रिटेन की महरानी की समान संपत्ति है। अब एक और चौकाने वाली सच। हमारे देश के प्रोटोकोल के मुताबिक राष्ट्रपति को 21 तोपों की सलामी दी जाती है। पर, जब ब्रिटेन की महारानी भारत आती है तो उनको भी 21 तोपों की सलामी दी जाती है। बड़ा सवाल यह, कि ऐसा क्यों? आपको याद ही होगा कि पिछली बार जब ब्रिटेन की महारानी भारत आई थी तो आमंत्रण पत्र सबसे पहले महारानी का नाम छपा था और भारत के राष्ट्रपति का नाम उसके नीचे छपा था?
भारत बनाम इंडिया
एक और बड़ा सवाल यह कि हमारे देश का नाम भारत है या इंडिया? जाहिर है आप कहेंगे भारत। पर, संधि के मसौदे के मुताबिक इसका नाम इंडिया है और विदेशो में हमे इंडिया के नाम से ही जाना जाता है। हैरानी की बता यह कि हमारे संविधान के प्रस्तावना में लिखा है कि- इंडिया, दैट इज भारत…। जबकि, होना यह चाहिए था- भारत, दैट वाज इंडिया…। एक और बात विदेशो में हमे अपना एम्बेसी रखने का अधिकार नहीं है। बदले में हम हाई कमीशन रख सकतें हैं। दरअसल, हम जिसे अपना एम्वेस्डर कहतें हैं, मसौदे के मुताबिक उसे हाई कमीनश्नर लिखा जाता है।
वन्देमातरम पर रोक
संधि के मुताबिक आजादी के अगले 50 वर्षो तक भारत के संसद में वन्देमातरम गाने पर रोक लगा रहा। आपको जान कर हैरानी होगी वर्ष 1997 में तात्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने इस मुद्दे को संसद में उठाया था और तब जाकर पहली बार भारत के संसद में वन्देमातरम गाया गया। वन्देमातरम को लेकर उस वकत जो भ्रम फैलाया गया, वह आजादी के 71 साल बाद आज भी बरकरार है। इस गीत में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है। हमारे राष्ट्रगान जन, गन, मन… में जिसे भारत का भाग्य विधाता बताया जा रहा है, सवाल उठता है कि वह भाग्य विधाता है कौन?
संधि एक और शर्त अनेक
संधि की शर्तों के अनुसार सुभाष चन्द्र बोस को जिन्दा या मुर्दा ब्रिटेन के हवाले करना था। यही वह बड़ी वजह रही क़ि सुभाष चन्द्र बोस जिन्दा होते हुए भी देशवासियों के लिए लापता ही रहे। समय- समय पर कई अफवाहें फैलीं। पर, सुभाष चन्द्र बोस का पता नहीं लगा और नाही किसी ने उनको ढूंढने में रूचि दिखाई। दरअसल, सुभाष चन्द्र बोस ने वर्ष 1942 में आजाद हिंद फौज बनाई थी। उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था और सुभाष चन्द्र बोस ने इस काम में जर्मन और जापानी लोगों से मदद ली थी जो कि अंग्रेजो के दुश्मन थे और इस आजाद हिंद फौज ने अंग्रेजों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया था। लिहाजा, ब्रिटेन सुभाषचन्द्र बोस को गिरफ्तार करना चाहती थी।
क्यों नहीं मिला शहीद का दर्जा
इस संधि की शर्तों के अनुसार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकुल्लाह, रामप्रसाद विस्मिल सहित आजादी के लिए शहीद होने वाले अधिकांश स्वतंत्रता सैनानी ब्रिटिस कानून के तहत आतंकवादी थे। यहीं वह बड़ी वजह है कि हम आजाद होकर भी आज तक अपने इस सभी वीर सपूतो को बजाप्ता शहीद का दर्जा नहीं दे सके। चौकाने  वाली बात तो यह कि आजादी के आरंभिक वर्षो में ऐसे सभी महान सपूतो को सिलेवश में आतंकवादी ही पढ़ाया जाता रहा और बाद में उसे सिलेवश से हटा दिया गया।
व्हीलर बुक स्टोर का रहस्य
आज भी भारत के अधिकांश बड़े रेलवे स्टेशन पर एक किताब की दुकान देखने को मिल जाता है। जिसका नाम व्हीलर बुक स्टोर है। वह, 14 अगस्त की इसी संधि की शर्तों के अनुसार है। क्या आप जानते है कि वह व्हीलर कौन था? दरअसल वह व्हीलर अंग्रेज का सबसे बड़ा दमनकारी ऑफिसर था। इसने देश क़ि हजारों मां, बहन और बेटियों के साथ बलात्कार करवाया था और स्वयं भी बलात्कार करने का शौकीन था। इसने किसानों पर सबसे ज्यादा गोलियां चलवाई थी। कहतें हैं कि 1857 की क्रांति के बाद कानपुर के नजदीक बिठुर में व्हीलर और नील नामक दो अंग्रेज अधिकारी ने यहां के सभी 24 हजार लोगों को मरवा दिया था। इसमें गोदी का बच्चा से लेकर मरणासन्न हालत में पड़ा कई बृद्ध भी मारे गये थे। बावजूद इसके 14 अगस्त की संधि के मुताबिक व्हीलर का सम्मान करते रहना हमारी विवशता है।
आज भी चलता है अंग्रेजो का कानून
इस संधि की शर्तों के मुताबिक आज भी भारत में अंग्रेजो के बनाये गये 34,735 कानून जस के तस है। इंडियन पोलिस एक्ट, इंडियन सिवल सर्विस एक्ट, इंडियन पैनल कोड, इंडियन सीटीजनशिप एक्ट, इंडियन एडवोकेट एक्ट, इंडियन एडुकेशन एक्ट, लैंड एक्यूजेशन एक्ट, क्रिमनल प्रोसीडियूर एक्ट, इंडियन एभीडेंस एक्ट, इंडियन इनकम टैक्स एक्ट, इंडियन फॉर्स एक्ट, इंडियन एग्रीकल्चर प्राइस कमीशन एक्ट… आदि। सब के सब आज भी वैसे ही चल रहे हैं। हालांकि, कालांतर में इसमें कुछ बदलाव हुए है। पर उसके मूल भावनाओं में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है।
भवन और स्थान
इस संधि के अनुसार अंग्रेजों द्वारा बनाये गए भवन जैसे के तैसे रखे जायेंगे। शहर का नाम, सड़क का नाम सब के सब वैसे ही रखे जाने है। आज देश का संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, राष्ट्रपति भवन कितने नाम गिनाऊं…? लार्ड डलहौजी के नाम पर डलहौजी शहर है, रिपन रोड, कर्जन रोड, मेयो रोड, बेंटिक रोड, फ्रेजर रोड, बेली रोड, ऐसे हजारों सड़क और भवन हैं, सब के सब वैसे के वैसे ही हैं। गुजरात के सूरत में एक बिल्डिंग है उसका नाम है कूपर विला। अंग्रेजों को जब जहाँगीर ने व्यापार का लाइसेंस दिया था तो सबसे पहले वह सूरत में आये थे और सूरत में उन्होंने इस बिल्डिंग का निर्माण किया था। यही से भारत को गुलाम बनाने की साजिशें रची गयी थी और यह आज तक सूरत के शहर में खड़ा, हमें मुंह चिढ़ा रहा है।
दरकिनार हुआ देशी पद्धति
इस संधि की शर्तों के हिसाब से हमारे देश में आयुर्वेद के विकास में सरकार सहयोग नहीं करेगा। मतलब हमारे देश की विद्या हमारे ही देश में ख़त्म हो जाये, ऐसी साजिस की गयी। इस संधि के हिसाब से हमारे देश में गुरुकुल और संस्कृति भाषा को कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जायेगा। इस संधि में एक और खास बात यह है कि यदि हमारे देश के अदालत में कोई ऐसा मुक़दमा आ जाये, जिसके फैसले के लिए कोई कानून न हो या उसके फैसले को लेकर संबिधान में भी कोई जानकारी न हो तो ऐसे में मुकदमे का फैसला अंग्रेजों के न्याय पद्धति के आदर्शों के आधार पर ही होगा।
विदेशी कंपनी को पोषण
इस संधि में ये भी है क़ि ईस्ट इंडिया कम्पनी तो जाएगी भारत से लेकिन बाकि 126 विदेशी कंपनियां भारत में रहेंगी और भारत सरकार उनको पूरा संरक्षण देगी। इसी का नतीजा है क़ि ब्रुकबॉड, लिप्टन, बाटा, हिंदुस्तान लीवर अब हिंदुस्तान यूनिलीवर जैसी 126 कंपनियां आज़ादी के बाद इस देश में बची रह गयी और हमें लुटती रही।
शाम में बजट पेश करने का राज
आप में से बहुत लोगों को याद होगा क़ि हमारे देश में आजादी के 50 साल बाद तक संसद में वार्षिक बजट शाम को 5 बजे में पेश किया जाता था। जानते है क्यों? क्योंकि जब हमारे देश में शाम के 5 बजते हैं तो लन्दन में सुबह के 11.30 बजता हैं और अंग्रेज अपनी सुविधा से उनको सुन सके, इसलिए…। आपको बतातें चलें कि 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ था और इसी के बाद अंग्रेजों ने भारत में राशन कार्ड का सिस्टम लागू किया था। क्योंकि, द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेजों को अनाज क़ि जरूरत थी और वह अनाज की पूर्ति भारत से चाहते थे। लिहाजा, उन्होंने यहां जनवितरण प्रणाली और राशन कार्ड क़ि शुरुआत क़ी। ताज्जुब की बात है कि वह प्रणाली आज भी भारत में लागू है और यहां के जन मानस इसे स्वीकार भी कर चुकें हैं।
कत्लखाना और वैश्यालय
गौरतलब है कि अंग्रेजों के आने के पहले इस देश में गायों को काटने का कोई कत्लखाना नहीं था। मुगलों के समय में यदि कोई गाय को काट दे तो उसका हाथ काट दिया जाता था। अंग्रेज  यहां आये तो उन्होंने पहली बार कलकत्ता में गाय काटने का कत्लखाना शुरू किया और पहला शराबखाना भी शुरू किया। इसी के साथ भारत में वैश्यालय चलाने का रिवाज शुरू किया। कहतें हैं कि इस देश में जहां अंग्रेजों की छावनी हुआ करती थी, वहीं वेश्याघर बनाये गए थे और शराबखाना खोला गया था। उस वक्त पूरे देश में 355 छावनियां थी और लगभग इतने ही वैश्यालय भी थे। अंग्रेजों के जाने के बाद ये सब ख़त्म हो जाना चाहिए था लेकिन नहीं हुआ। क्योंक़ि ये भी इसी 14 अगस्त की रात की गई संधि में शामिल है।
ध्यान बांटने की रचि साजिश
सोचिए, यह कितना गंभीर विषय है और हमारे देश में कभी भी इस पर कोई वहस या चर्चा नहीं हुई। जानतें हैं क्यों? क्योंकि, बड़ी ही चालकी से हमारे रहनुमाओं ने हमे जाति, धर्म और सम्प्रदाय में बांट कर घृणा की ऐसी बीजारोपण कर दिया कि हम सभी इसी में उलझ कर रह गये और देश की मूल समस्याओं के प्रति हमारी उदासीनता आज भी बरकरार है। कहतें हैं कि इसका लाभ विदेशी ताकतें उठा रही है और समय रहते हम सर्तक नहीं हुए तो हमें इसका और भी खामियाजा भुगतने को तैयार रहना पड़ेगा।

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