भारत के पहले चुनाव की सुबह
26 मार्च 1952 की वह ऐतिहासिक सुबह थी, जब आजाद भारत में आम आदमी पहली बार अपने जनप्रतिनिधि को चुनने के लिए कतार में खड़ा था। लोग मतदान केंद्र पर पहुंच कर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। किसी को भी अंदाजा नहीं था कि उस दिन का फैसला भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में मील का पत्थर साबित होगा।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लोकतंत्र को मजबूती देने के लिए स्पष्ट निर्देश जारी किये थे, लेकिन उन दिनों एक ऐसी घटना घटी, जिसने दिल्ली की सत्ता को सोचने पर मजबूर कर दिया। बिहार के धमदाहा विधानसभा क्षेत्र की कहानी बेहद रोचक है। चौंकाने वाली बात यह थी कि उस पहली चुनाव में धमदाहा से एक नहीं, बल्कि दो विधायक चुन लिए गए थे।
दिल्ली तक पहुँची धमदाहा की गूंज
स्थिति इतनी उलझ गई कि नेहरू जी बिहार दौरे पर आये और वहां उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “मैं किसी जाति के लोगों से मिलने नहीं आया हूँ, बल्कि मैं भारतीयों से मिलने आया हूँ।” उन दिनों बिहार कांग्रेस में गुटबाजी चरम पर थी और कई बड़े नेता पार्टी के ही उम्मीदवारों के खिलाफ बगावत पर उतर आये थे। मामला बढ़ता चला गया, इतना कि अब्दुल कलाम आजाद को पटना आना पड़ा।
यह घटनाक्रम राजनीति के लिए नया मोड़ था, जिसकी चर्चा लंबे समय तक हुई।
धमदाहा से कैसे जीते दो विधायक
धमदाहा विधानसभा में उस समय दोनों विजेता कांग्रेस पार्टी के थे: भोला पासवान शास्त्री और लक्ष्मी नारायण सुधांशू। दोनों को लगभग बराबर वोट प्राप्त हुए – शास्त्री को 26,588 वोट मिले और सुधांशू को 26,453 वोट। ऐसा मामला सिर्फ धमदाहा तक ही सीमित नहीं था, बल्कि बिहार की 50 अन्य सीटों पर भी दो प्रत्याशी एक साथ जीत जाते थे। तब का चुनाव सिस्टम ऐसा ही था और 1962 तक यही तरीका चला। बाद में इस प्रणाली को बंद कर दिया गया।
मतदान प्रक्रिया की अनोखी कहानी
आज़ादी के बाद, बिहार की 86.6 प्रतिशत आबादी निरक्षर थी। निर्वाचन आयोग ने इस चुनौती से निपटने के लिए हर प्रत्याशी के नाम पर अलग रंग का बैलेट बॉक्स बनवाया। मतदाता को गुलाबी रंग का बैलेट मिलता था – एक रुपये के नोट के साइज का। मतदाता उस पर मुहर लगाकर अपने पसंदीदा उम्मीदवार के बॉक्स में डाल देता था। बैलेट की गिनती से परिणाम निकलता था।
उस समय आयोग ने लगभग 20 लाख बैलेट बॉक्स बनवाये, जिसमें 8,200 टन स्टील का इस्तेमाल हुआ।
मतदान की पूजा और विस्मय
पहले मतदान के बाद जब बैलेट बॉक्स खोला गया, तो उसमें फूल, सिंदूर, देवी-देवताओं की तस्वीरें, सिक्के और नोट निकले। ग्रामीण मतदाताओं ने बैलेट बॉक्स को पूजा की वस्तु मानकर उसमें चढ़ावा चढ़ा दिया। गणना कर्मी हैरान रह गए, क्योंकि कुछ जगहों पर तो पूरा बॉक्स ही चढ़ावे से भर गया। बिहार में मतदाताओं का पहला अनुभव यही था, लेकिन आज वही बिहार तकनीकी रूप से ईवीएम से मतदान करता है।
चुनाव में भ्रष्ट्राचार की कहानी
1952 में, यानी आज़ादी के बाद पहले चुनाव में भी भ्रष्टाचार की बातें सुनने को मिलती थीं। सोशलिस्ट नेता रामबृक्ष बेनिपुरी ने अपनी डायरी में उस समय के चुनावी भ्रष्टाचार की झलक दी है। उस समय ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ का नारा बहुत प्रचलित था। बिहार में चुनाव के समय अफवाह फैलाने का काम भी शुरू हो गया था। उदाहरण के लिए, 1952 में नालंदा विश्वविद्यालय पर आगजनी की अफवाह फैलायी गयी। बिहार में चुनाव जीतने के लिए अफवाहें और जातीय समीकरणों का सहारा लेना अब नयी बात नहीं है।
राजनीति में जाति और अफवाह का प्रभाव
सालों बाद भी, बिहार में राजनीति का जातीय समीकरण बना हुआ है। अफवाहों के आधार पर चुनाव जीतने का फॉर्मूला और नफरत फैलाने का तरीका आज भी जारी है। नेताओं की सोच बस चुनाव जीतने तक ही सीमित होती जा रही है, चाहे इसके लिए समाज में दरार क्यों न आ जाए।
धमदाहा में आज के समीकरण
आज धमदाहा सीट पर लेशी सिंह लगातार जीत रही हैं। धमदाहा में जातीय राजनीति आज भी चुनावी फैसला का मुख्य आधार है। 2025 के चुनाव में समीकरण क्या होंगे, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन संभावना है कि पुराने जातीय समीकरण फिर कारगर हो सकते हैं। नेहरूजी की चेतावनी, इतने साल बाद भी, अधूरी ही लगती है।
