Home National विभाजन: आज़ादी का वह ज़ख्म, जो आज भी ताज़ा है

विभाजन: आज़ादी का वह ज़ख्म, जो आज भी ताज़ा है

KKN ब्यूरो। 15 अगस्त 1947 — यह तारीख भारतीय इतिहास के स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। इस दिन भारत ने विदेशी हुकूमत की जंजीरें तोड़ दीं, लेकिन साथ ही यह दिन हमारे इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी लेकर आया — विभाजन।
आज़ादी का जश्न गगनभेदी नारों में डूबा था, लेकिन उसके पीछे लाखों चीखें, कराहें और खामोशियां भी थीं, जो कभी इतिहास के पन्नों पर पूरी तरह नहीं उतर सकीं।

आज़ादी के साथ आया बंटवारा

ब्रिटिश साम्राज्य से आज़ादी की घोषणा के साथ ही भारत का मानचित्र बदल गया। भारत और पाकिस्तान के रूप में दो नए देश अस्तित्व में आए।
विभाजन केवल भूगोल का बंटवारा नहीं था, यह धर्म, जाति और पहचान के आधार पर इंसानों के बीच खींची गई वह लकीर थी, जिसने सदियों से साथ जी रहे पड़ोसियों को पराया बना दिया।

करोड़ों लोग, बेघर और बेसहारा

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, विभाजन के दौरान लगभग 1.4 करोड़ लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए।

  • पंजाब, बंगाल और सिंध के गांव-गांव में घरों पर ताले पड़ गए।
  • सदियों से साथ जीते-जागते पड़ोसी एक रात में दुश्मन बन गए।
  • ट्रेनें लाशों से भरकर आतीं — जिन्हें “मौत की गाड़ियां” कहा जाने लगा।

खून से रंगी सरज़मीं

अमृतसर, लाहौर, कराची, ढाका, लुधियाना, दिल्ली— हर जगह दंगे, लूटपाट, आगज़नी और बलात्कार की खबरें थीं।

  • लाखों लोग मार दिए गए।
  • औरतों का अपहरण हुआ, उनका सामूहिक शोषण किया गया।
  • बच्चे अनाथ हुए, बूढ़े अपने अंतिम दिनों में भी शरण की तलाश में भटकते रहे।

टूटते रिश्तों की कहानियां

विभाजन की सबसे बड़ी चोट इंसानों के दिलों पर लगी।

  • बचपन के दोस्त, जो कल तक एक-दूसरे के घर का खाना खाते थे, अब सरहद के इस पार और उस पार हो गए।
  • हिंदू, मुस्लिम, सिख – सभी ने अपनों को खोया, और घाव केवल एक तरफ के नहीं थे।

सरहद के इस पार और उस पार

पाकिस्तान जाने वाले मुसलमान, भारत में रहने वाले हिंदू और सिख – सभी को यह यकीन था कि वे अपने “अपने देश” जा रहे हैं।
लेकिन असलियत में, वे सबने अपने घर, अपनी जमीन, अपनी जड़ें और अपनी पहचान खो दी।
वहां उन्हें मिला — अनजान माहौल, नई जंग, और बस जीने की मजबूरी।

विभाजन की विरासत

विभाजन ने केवल भारत और पाकिस्तान को अलग नहीं किया, उसने दोनों देशों के बीच संदेह, अविश्वास और दुश्मनी की नींव भी रख दी।
आज, लगभग 78 साल बाद भी, सरहद के दोनों ओर यह घाव पूरी तरह नहीं भर पाया।

गर्व और ग़म

15 अगस्त 1947, भारत के लिए गर्व और ग़म का मिला-जुला दिन था।
जहां एक ओर तिरंगा लहराता था, वहीं दूसरी ओर ट्रेन के डिब्बों में लाशें पड़ी थीं।
यह वह इतिहास है, जिसे हमें केवल याद नहीं रखना चाहिए, बल्कि समझना भी चाहिए — ताकि आने वाली पीढ़ियां कभी इंसानों को धर्म, जाति या सरहद के नाम पर फिर से न बांटें।

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