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आइए जानते हैं, मुजफ्फरपुर का प्रमुख शक्तिपीठ चामुंडा स्थान का इतिहास, महत्व और अनुष्ठान

मुजफ्फरपुर जिले के कटरा गढ़ क्षेत्र में स्थित चामुंडा स्थान एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है, जहाँ देवी चामुंडा की पिंडनुमा मूर्ति स्थापित है। यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व भी अत्यधिक है। माना जाता है कि इसी स्थान पर देवी चामुंडा ने असुरों के दोनों भाई चंड और मुंड का वध किया था, जिसके कारण देवी का नाम चामुंडा पड़ा। इस मंदिर का धार्मिक महत्व बहुत गहरा है, और यह श्रद्धालुओं के लिए एक आस्था का केंद्र है।

चामुंडा स्थान का एतेहासिक महत्व

चामुंडा स्थान, कटरा प्रखंड मुख्यालय से लगभग 100 गज की दूरी पर स्थित है। यह मंदिर लगभग 80 एकड़ भूमि में फैला हुआ है और इस स्थान को कटरा गढ़ कहा जाता है। मंदिर परिसर के पश्चिमोत्तर भाग में एक टीले पर देवी चामुंडा का भव्य पिंडनुमा रूप स्थापित है, जिसे स्वयंप्रकट माना जाता है। इस स्थान पर देवी की पूजा का महत्व बहुत ज्यादा है, और यह जगह विभिन्न धार्मिक और आध्यात्मिक अनुभवों के लिए जानी जाती है।

मंदिर का संचालन बिहार धार्मिक न्यास बोर्ड द्वारा नियुक्त चामुंडा न्यास समिति करती है, जो मंदिर की देखभाल और विकास कार्यों का जिम्मा संभालती है। यह समिति मंदिर के हर पहलू को सही तरीके से चलाने के लिए समर्पित है, ताकि श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास कायम रह सके।

चामुंडा का नाम की महिमा

चामुंडा का नाम देवी की एक प्राचीन कथा से जुड़ा हुआ है, जो दुर्गा सप्तशती में वर्णित है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में शुम्भ और निशुम्भ नामक दो राक्षसों का आतंक था। वे दोनों देवताओं और मानवों को परेशान करते थे। इस संकट के समय देवता हिमालय में माता भगवती की पूजा करने पहुंचे। लेकिन, देवी का नाम लेकर कोई स्तुति नहीं की गई। फिर माता पार्वती वहां पहुंची और देवताओं से पूछा कि वे किसकी पूजा कर रहे हैं। देवता चुप रहे और तब पार्वती ने स्वयं से एक कन्या को प्रकट किया, जो शुम्भ और निशुम्भ का वध करने के लिए आई।

इस देवी कन्या ने शुम्भ और निशुम्भ का वध किया और उनके सहायक चंड और मुंड को भी समाप्त किया। इसी कारण देवी का नाम चामुंडा पड़ा। यह कथा धार्मिक ग्रंथों में विस्तार से वर्णित है और इसे मानते हुए इस मंदिर में देवी की पूजा की जाती है।

कटरा में स्थित चामुंडा स्थान

कटरा गढ़, जो मुजफ्फरपुर जिले के पूर्वोत्तर भाग में स्थित है, वहां चामुंडा स्थान एक प्रमुख धार्मिक स्थल बन चुका है। यह स्थान लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर जिला मुख्यालय से स्थित है। यहां देवी चामुंडा का पिंडनुमा स्वरूप प्रतिष्ठित है, जिसे स्वअंकुरित माना जाता है। यह मंदिर धार्मिक अनुष्ठानों, पूजाओं और दर्शन के लिए साल भर श्रद्धालुओं से भरा रहता है। खासकर विजयदशमी के दौरान यहां श्रद्धालुओं की संख्या और भी बढ़ जाती है।

यहां भक्तों का विश्वास है कि देवी चामुंडा की पूजा करने से वे अपने दुखों से मुक्त हो सकते हैं और उन्हें मानसिक शांति मिल सकती है। मंदिर में पूजा-अर्चना के अलावा, यहां हर साल विशेष धार्मिक आयोजन भी होते हैं।

मंदिर के संचालन और विशेष अनुष्ठान

चामुंडा स्थान मंदिर का संचालन चामुंडा न्यास समिति द्वारा किया जाता है, जिसकी अध्यक्षता रघुनाथ चौधरी करते हैं। सचिव कैलाश बिहारी सिंह और कोषाध्यक्ष तारकेश्वर सिंह मंदिर की आर्थिक और व्यवस्थापक गतिविधियों को संभालते हैं। इन लोगों के नेतृत्व में मंदिर लगातार विकास की ओर बढ़ रहा है।

मंदिर में हर रोज़ सुबह 6 बजे और शाम 8 बजे देवी चामुंडा की आरती होती है, जिसमें मंदिर के पुजारी और भक्तगण भाग लेते हैं। पूजा के बाद, श्रद्धालुओं को दर्शन का अवसर मिलता है। इसके अलावा, दोपहर के समय 12 से 1 बजे तक देवी के शयन के लिए मंदिर के पट बंद रहते हैं। मंदिर में फल और मिष्ठान्न चढ़ाने की परंपरा है, क्योंकि देवी का स्वरूप वैष्णवी है और यहाँ बलि नहीं दी जाती।

विशेष धार्मिक उत्सव और मेले

चामुंडा स्थान मंदिर में शारदीय नवरात्र के दौरान विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। इन नौ दिनों में श्रद्धालु दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं और विभिन्न पूजा विधियों में भाग लेते हैं। नवमी के दिन विशेष पूजा होती है और यह दिन विशेष रूप से अहम होता है।

दशहरा के अवसर पर भी इस मंदिर में विशाल मेला लगता है, जहां लोग देवी की पूजा करते हैं। इस दौरान आसपास के ग्रामीण भी पूजा में शामिल होते हैं और इस दिन विशेष रूप से श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है।

मंदिर की निरंतर प्रगति और विकास

चामुंडा न्यास समिति के अध्यक्ष रघुनाथ चौधरी का मानना है कि देवी चामुंडा की कृपा से ही मंदिर का विकास संभव हो पाया है। उनका कहना है कि श्रद्धालुओं का विश्वास और भक्ति ही मंदिर की सफलता का कारण है। चढ़ावे से प्राप्त धन का उपयोग मंदिर के विकास और व्यवस्थाओं को सुधारने में किया जाता है।

मंदिर का निर्माण और विकास इस बात का प्रतीक है कि चामुंडा माता अपनी आशीर्वाद से इस स्थान को निरंतर ऊंचाई पर ले जा रही हैं। श्रद्धालु मंदिर में आने के बाद हमेशा एक नई ऊर्जा और शांति महसूस करते हैं।

चामुंडा स्थान के महत्व को समझते हुए

चामुंडा स्थान, एक ऐसी जगह है जहां लोग न केवल धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, बल्कि आत्मिक शांति और मानसिक स्वास्थ्य भी प्राप्त करते हैं। यहाँ आने वाले भक्त अपने जीवन में सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। मंदिर का यह वातावरण लोगों को आध्यात्मिक रूप से एक मजबूत दिशा प्रदान करता है।

यह मंदिर और इसका महत्व समय के साथ बढ़ा है, और यह लोगों के विश्वास का प्रतीक बना हुआ है। सालों से यह स्थान एक श्रद्धा का केंद्र रहा है, जहां लोग अपनी मनोकामनाओं को देवी चामुंडा के चरणों में अर्पित करते हैं।

अंत में, चामुंडा स्थान मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक धरोहर भी है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु न केवल पूजा करते हैं, बल्कि यह स्थान उन्हें एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूति भी प्रदान करता है।

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