भारतीय जीवनशैली में संत परम्परा की अमिट छाप 

राजकिशोर प्रसाद
भारत। तथाकथित कुछ पाखंडी और अपराधी चरित्र के भगवाधारी संतो के गलत हरकत से हमारा संत परम्परा कलंकित हुआ है। किन्तु, हमारे देश के महान संतो ने विश्व में आध्यात्मिक गुरु की उपाधि से भारत को सुशोभित किया है। भारतीय संस्कृति और जीवन शैली में संतो की भूमिका से ओतप्रोत है। जिससे सदाचार, शिष्टाचार, विश्व बन्धुत्व, सर्व धर्म, समाजिक एकता, भारतीय अखण्डता व आध्यात्मिक वातावरण निर्माण की सीख मिलती है। इतना ही नई मन की शुद्धि, अन्तःकरण शुद्धि व सहज आनन्द की अनुभूति मिलती है। जो सुसज्जित व सभ्य समाज निर्माण में सहायक होती है।
सूबे के आरा के चंदवा में आयोजित धर्म सम्मेलन में उमड़ा जन सैलाब और लोगो की भारी आस्था ने यह जरूर साबित कर दिया है कि हमारे जीवन शैली में, संत एक अनिवार्य हिस्सा है। लोगो की आस्था अभी भी अमिट है। सनातन धर्म परम्परा के प्रति लोगो की अटूट आस्था है। यह सदैव जीवित रहेगा। चाहे कुछ पाखण्डी और चरित्रहीन लोग संतो की आड़ में लाख षड्यंत्र रच, कुकर्म कर ले। ऐसे पाखण्डी नकली संतो से सचेत रहने की जरूरत है। उसे चिन्हित कर कड़ी दण्ड देने की जरूरत है। जो, हमारे दधीचि, दंडयाण व अनगिनत महान संतो के देश भारत को बदनाम कर रहा है।
संत परम्परा को धूमिल कर रहा है। कुछ लोगो और संगठनो को ऊँगली उठाने की मौका दे रहा है। किन्तु यह कभी नही भूलना चाहिये की हमारे देश की भारतीय संस्कृति ऋषि मुनियो व संतो की कड़ी मेहनत से बनी है। इतना ही नही देश की आजादी में संतो की भूमिका भी सराहनीय रही है। हमारे देश की संत परम्परा शास्त्र और शस्त्रो के समन्वय पर आधारित रहा है। संत के कठिन प्रयास से ही स्वच्छता, चिकित्सा, गोरक्षा, धर्म रक्षा, जल संरक्षण, नारी सशक्तिकरण, पौधरोपण, दलित उत्थान, धार्मिक आजादी, संस्कार, भूमि रक्षा आदि में हम आज दुनिया में आगे है। जिसमें संतो की भूमिका व योगदान अतुलनीय है।