राजनितिक दल कही कालाधन का स्त्रोत तो नही 

राजकिशोर प्रसाद

आज के परिवेश में देश के सभी रजनीतिक दल कालाधन और भरष्टाचार पर कोहराम मचा रहें हैं। सभी कालेधन को बाहर करने और भ्रष्टाचार पर लगाम की खूब बखान करते हैं। किन्तु, इसके लिये सबसे पहले स्वयं को ठीक और सुधरने की जरूरत है। जब तक देश के करीब दो हजार राजनीतिक दले अपने आप में सुधार और पारदर्शिता नही लायेंगे तब तक यह सम्भव नही की कालाधन और भ्रष्टाचार पर लगाम लगे। इसके लिये सभी राजनीतिक दल अपने अपने दल को मिलने वाले चंदे व उपहार को सार्वजनिक पारदर्शिता के साथ करें।
चुनाव आयोग ने 20 हजार तक के चंदा देनेवाले धारको के नाम सार्वजनिक नही करने के छूट से नाजायज फायदा राजनितिक दल उठाते है। जो, कालाधन और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते है। राजनितिक दल अपने खातो में भारी भरकम राशि जमा करती है। जिसे वह बीस हजार से मिलने वाले चंदे को सामिल बताती है। जिससे कालाधन उनके खातो में जमा हो जाती है। जो भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है। इससे प्रतीत होता है कि कालाधन  खपाने की राजनीतिक दल एक मशीन बन गई।
अब यह कहने में कोई संकोच नही होंनी चाहिये की राजनीतिक दल कालाधन की स्त्रोत बन गई है। किन्तु, अब समय आ गया है कि राजनीतिक दल और नेता ईमानदार नागरिको की भावना व उसके गुस्से को समझे और उनका आदर करे। वरना, जनता धीरे धीरे सब समझ रही है। जब जनता के जेहन में समझदारी होगी तो एक आमूल परिवर्तन का वक्त आ जायेगा। इसके लिये दिसम्बर 2016 में पीएम नरेंद्र मोदी ने भी अपने भाषण के दौरान अपने मन की बात रखी थी।
चुनाव आयोग ने भी जनप्रतिनिधित्व कानून को सख्त बनाने की वकालत करते हुये इसमें सुधार की जरूत बताई है। इसके लिये चंदे की दो हजार राशि तक को सार्वजनिक करने की बात कही है। किन्तु, इसमें भी कालाधन खपाने की गुंजाइस है। सारे चंदे व उपहार जब तक पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक नही होंगे तब तक कालाधन और भ्रष्टाचार पर लगाम की बात करना जनता के साथ बेईमानी होगी। साथ ही देश में सभी चुनाव एक साथ हो। ताकि, कालेधन व भ्रष्टाचार पर नियंत्रण हो सके। कोई भी व्यक्ति, वर्ग, समूह या संस्था किसी राजनीतिक दल को चन्दा देने के पीछे कोई न कोई फायदे की मंशा रखती है। हालांकि प्रधनमंत्री ने चरणबद्ध तरीके से इसे खत्म करना चाहतें हैं और इसके लिए चुनाव आयोग भी खाका तैयार कर रही है।